क्या राष्ट्रवादी विचारधारा की आवाज सिमट रही है?

विचार लेख | गजानन माली | टेन न्यूज़ नेटवर्क

New Delhi News (02 November 2026): दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर 2026 को INDIA ब्लॉक की महारैली और उसमें उठे राजनीतिक सवालों ने एक बार फिर देश में लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रवादी विचारधारा के स्वरूप को लेकर बहस तेज कर दी है। विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) में कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाया। इस दौरान विपक्ष ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं, जिससे पात्र नागरिकों के मताधिकार पर असर पड़ सकता है।

वहीं, चुनाव आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण का उद्देश्य डुप्लीकेट, मृत और अपात्र मतदाताओं से संबंधित प्रविष्टियों को हटाकर सूची को अधिक शुद्ध बनाना है। आयोग के अनुसार, जिन पात्र मतदाताओं के नाम सूची से हट गए हैं, उनके पुनः पंजीकरण की व्यवस्था भी उपलब्ध है। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए इस प्रदर्शन को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया। दिल्ली पुलिस ने भी निर्धारित शर्तों के साथ रामलीला मैदान में रैली की अनुमति दी थी।

इन राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच एक महत्वपूर्ण वैचारिक प्रश्न सामने आता है—क्या राष्ट्रवादी विचारधारा की आवाज सिमट रही है?

मेरी संपादकीय दृष्टि में समस्या राष्ट्रवाद के कमजोर होने से अधिक उसके विमर्श के सीमित राजनीतिक दायरे में सिमट जाने की है। राष्ट्रवाद को केवल सरकार के समर्थन के पर्याय के रूप में देखना उसकी व्यापकता और मूल भावना को सीमित करना है।

एक राष्ट्रवादी नागरिक यदि देश की सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय हितों की बात करता है, तो उसकी राष्ट्रवादी भावना स्वाभाविक है। लेकिन वही नागरिक यदि चुनाव आयोग की पारदर्शिता, संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही या सरकार के किसी निर्णय पर सवाल उठाता है, तो उसकी राष्ट्रभक्ति पर संदेह करना लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद की भावना के अनुरूप नहीं कहा जा सकता।

इसी तरह विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों को भी केवल इसलिए सही नहीं मान लिया जाना चाहिए कि वे सरकार के विरोध में हैं। लोकतंत्र में किसी भी आरोप की विश्वसनीयता राजनीतिक पक्षधरता से नहीं, बल्कि तथ्यों, प्रमाणों और निष्पक्ष जांच से तय होनी चाहिए। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की जवाबदेही लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है।

आज राष्ट्रवादी विचारधारा के सामने असली चुनौती विपक्ष की आवाज नहीं, बल्कि अपने भीतर वैचारिक व्यापकता बनाए रखने की है। सवाल यह है कि क्या राष्ट्रवाद में देशप्रेम के साथ असहमति, राष्ट्रीय हित के साथ जवाबदेही और मजबूत सरकार के साथ मजबूत संवैधानिक संस्थाओं की बात को भी समान स्थान दिया जा सकता है?

राष्ट्रवाद यदि केवल सत्ता के पक्ष में खड़ा दिखाई देगा, तो उसका वैचारिक दायरा सीमित हो जाएगा। लेकिन यदि वह राष्ट्र, संविधान और नागरिकों के अधिकारों को समान महत्व देगा, तो उसकी स्वीकार्यता और मजबूती स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी। देश के प्रति निष्ठा और सरकार के प्रति समर्थन, दोनों को एक ही अर्थ में देखना उचित नहीं है।

अंततः सवाल यह नहीं है कि कौन कितना जोर से बोल रहा है, बल्कि यह है कि लोकतंत्र में किसकी बात तथ्यों, तर्कों और संवैधानिक अधिकारों के आधार पर सुनी जा रही है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में राष्ट्रवाद और असहमति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक चेतना के दो महत्वपूर्ण पक्ष हो सकते हैं।


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