भारत का सुपरकंप्यूटिंग परितंत्र हुआ मजबूत, 40 सुपर कंप्यूटरों से 68 पेटाफ्लॉप्स की कंप्यूटिंग क्षमता हासिल

टेन न्यूज़ नेटवर्क

New Delhi News (04 October 2026): भारत ने सुपरकंप्यूटिंग के क्षेत्र में अपनी क्षमताओं को तेजी से मजबूत किया है। केंद्र सरकार के अनुसार, देश की सुपरकंप्यूटिंग यात्रा 1990 के दशक की शुरुआत में परम 8000 से शुरू हुई थी, जो अब राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन के तहत एक व्यापक स्वदेशी परितंत्र में बदल चुकी है। सितंबर 2026 तक भारत में 40 सुपर कंप्यूटर तैनात किए जा चुके हैं, जिनकी संयुक्त क्षमता 68 पेटाफ्लॉप्स है। इन उच्च क्षमता वाले कंप्यूटिंग सिस्टम का इस्तेमाल मौसम और जलवायु मॉडलिंग, आपदा प्रबंधन, कम्प्यूटेशनल बायोलॉजी, बिग डेटा एनालिटिक्स और खगोल भौतिकी जैसे क्षेत्रों में किया जा रहा है।

भारत में सुपरकंप्यूटिंग क्षमताओं के विस्तार के पीछे राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन यानी NSM की महत्वपूर्ण भूमिका है। केंद्र सरकार ने अप्रैल 2015 में करीब 4,500 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ इस मिशन की शुरुआत की थी। इसे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय संयुक्त रूप से संचालित करते हैं। मिशन का उद्देश्य सुपरकंप्यूटिंग के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के साथ-साथ देश में उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग की क्षमता विकसित करना है। सी-डैक पुणे और भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु इस मिशन को आगे बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।

सुपरकंप्यूटर की मदद से ऐसे काम संभव होते हैं, जिनके लिए सामान्य कंप्यूटरों को बहुत अधिक समय लग सकता है। भारत में इनका इस्तेमाल फसल पैदावार का अनुमान लगाने, बीमारी के प्रकोप पर नजर रखने, दवा की खोज, बाढ़ की भविष्यवाणी और जंगलों में आग फैलने के अनुमान जैसे कार्यों में किया जा रहा है। राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन के तहत विकसित बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली नदी घाटियों में दो दिन पहले तक बाढ़ की संभावना का अनुमान लगाने में मदद करती है। वहीं फॉरेस्ट फायर स्प्रेड मॉडल उपग्रह से प्राप्त जानकारी और कंप्यूटेशनल मॉडल का इस्तेमाल कर जंगल की आग के संभावित फैलाव का अनुमान लगाने में मदद करता है।

भारत ने सुपरकंप्यूटिंग के साथ-साथ इसके लिए जरूरी स्वदेशी तकनीक विकसित करने पर भी जोर दिया है। रुद्र सर्वर श्रृंखला सी-डैक द्वारा स्वदेशी रूप से डिजाइन और विकसित की गई है, जिसका इस्तेमाल परम रुद्र सुपर कंप्यूटरों में किया जा रहा है। इसके अलावा हाई-स्पीड इंटरकनेक्ट नेटवर्क, स्वदेशी कूलिंग तकनीक और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम सॉफ्टवेयर भी विकसित किए गए हैं। सितंबर 2026 तक परम रुद्र सुपर कंप्यूटरों में 6,000 रुद्र सर्वर तैनात किए जा चुके थे, जबकि 1,500 अन्य सर्वर निर्माणाधीन थे। सरकार का लक्ष्य देश में सुपरकंप्यूटिंग के लिए हार्डवेयर से लेकर सॉफ्टवेयर तक स्वदेशी क्षमता को लगातार बढ़ाना है।

राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन का असर केवल वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे देश में शोध और मानव संसाधन को भी बढ़ावा मिला है। मिशन के बुनियादी ढांचे से 400 से अधिक संस्थानों के 16 हजार से ज्यादा शोधकर्ताओं को मदद मिली है, जिनमें 2,900 से अधिक पीएचडी छात्र शामिल हैं। सितंबर 2026 तक इन प्रणालियों पर 1.5 करोड़ से ज्यादा कंप्यूट जॉब्स निष्पादित किए जा चुके हैं और 1,990 से अधिक शोध प्रकाशनों में इनका योगदान रहा है। इसके अलावा छात्रों, शोधकर्ताओं और शिक्षकों के लिए एचपीसी, डीप लर्निंग, एआई और मशीन लर्निंग से जुड़े प्रशिक्षण, हैकथॉन, बूटकैंप और कार्यशालाएं भी आयोजित की जा रही हैं।

सरकार के मुताबिक, राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन के तहत देशभर के शैक्षणिक और शोध संस्थानों में कुल 50 सुपर कंप्यूटर स्थापित करने की योजना है, जिनकी संचयी क्षमता 123 पेटाफ्लॉप्स से अधिक होगी। वर्तमान में तैनात 40 सुपर कंप्यूटरों में 13 हाई-एंड सिस्टम ऐसे हैं जिनकी क्षमता एक पेटाफ्लॉप से अधिक है, जबकि 12 सिस्टम 500 टेराफ्लॉप्स से एक पेटाफ्लॉप के बीच की क्षमता वाले हैं। राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क इन कंप्यूटिंग संसाधनों को विभिन्न संस्थानों से जोड़कर शोधकर्ताओं को सहयोग और संसाधनों की साझा पहुंच उपलब्ध कराने में मदद कर रहा है।

भारत अब सुपरकंप्यूटिंग को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उभरती तकनीकों के साथ जोड़कर आगे बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। सरकार का जोर तेज, ऊर्जा-कुशल और विश्वसनीय सुपरकंप्यूटिंग सिस्टम तैयार करने के साथ भारतीय हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर क्षमताओं को मजबूत करने पर है। इसी दिशा में ईएसटीआईसी-2026 का दूसरा संस्करण 27 से 29 अक्टूबर तक नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित किया जाएगा, जिसमें सुपरकंप्यूटिंग सहित उभरती विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर चर्चा होगी। सरकार का मानना है कि एआई और एचपीसी का एकीकरण मौसम, कृषि, स्वास्थ्य, ऊर्जा, दवा खोज, इंजीनियरिंग और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में जटिल समस्याओं के समाधान को गति दे सकता है और भारत के विकसित भारत 2047 के लक्ष्य तथा आत्मनिर्भर तकनीकी परितंत्र को मजबूत कर सकता है।


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