जनता की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझना ही कुशल प्रशासक की सबसे बड़ी पहचान है: Dr. NP Singh| Bharatiya Shiksha Board

टेन न्यूज नेटवर्क

Noida News (09/09/2026): सेवानिवृत्त भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी और भारतीय शिक्षा बोर्ड के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. एन.पी. सिंह का प्रशासनिक जीवन केवल सरकारी जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जनभागीदारी, सामाजिक सेवा, वंचित वर्गों की शिक्षा और भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने के प्रयासों से भी जुड़ा रहा है। टेन न्यूज नेटवर्क के विशेष कार्यक्रम ‘Ten Talks’ में बातचीत के दौरान डॉ. सिंह ने लोकसेवा की अपनी सोच साझा करते हुए कहा कि एक प्रशासक की वास्तविक सफलता उसके पद या अधिकार में नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं को समझने और उनके समाधान के लिए संवेदनशीलता के साथ काम करने में है।

डॉ. सिंह के अनुसार, प्रशासन में निर्णय लेने की क्षमता, पारदर्शिता और जनभागीदारी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इन सभी के केंद्र में संवेदना होनी चाहिए। उन्होंने कहा, अगर किसी प्रशासनिक अधिकारी के हृदय और विचार में संवेदना है और वह अपने अस्तित्व में पूरे समाज को देखता है, तो उसके भीतर लोकसेवा की भावना स्वतः विकसित होती है।

कलेक्टर की भूमिका देखकर IAS बनने की प्रेरणा मिली

अपने प्रशासनिक जीवन की प्रेरणा का उल्लेख करते हुए डॉ. सिंह ने बताया कि वाराणसी में विद्यार्थी जीवन के दौरान उन्होंने डीजल-पेट्रोल, सीमेंट और आवश्यक वस्तुओं की कमी का दौर देखा। उस समय उन्होंने महसूस किया कि जिला कलेक्टर ऐसी संस्था है, जिसके माध्यम से समाज कल्याण, सार्वजनिक वितरण, कानून-व्यवस्था और जनसमस्याओं के समाधान जैसे अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं।
उन्होंने कहा, तभी मेरे मन में आया कि ऐसी सेवा का चयन किया जाए, जिसके माध्यम से व्यवस्थित और संस्थागत रूप से लोगों की सेवा करने का अवसर मिले।

नैनी झील अभियान ने दिखाई जनभागीदारी की ताकत

नैनीताल में नैनी झील की सफाई के अपने अभियान को याद करते हुए डॉ. सिंह ने बताया कि उस समय झील के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा था और सफाई के लिए लगभग 34 करोड़ रुपये की योजना तैयार की गई थी, लेकिन तत्काल सरकारी धन उपलब्ध नहीं हो सका।

उन्होंने कहा, जब धन नहीं मिल रहा था तो सवाल यह था कि क्या हमें मौन हो जाना चाहिए?

इसके बाद उन्होंने स्वयं सुबह के समय फावड़ा और टोकरी लेकर सफाई शुरू की। धीरे-धीरे विद्यार्थी, शिक्षक, व्यापारी, उद्यमी, बैंकर्स, वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ अभियान से जुड़ते गए। लगभग छह महीने तक लोगों ने अपने स्तर पर ट्रैक्टर और मशीनें उपलब्ध कराईं और अभियान एक बड़े जनआंदोलन में बदल गया।

डॉ. सिंह ने कहा, जब जनता को यह विश्वास हो जाता है कि उसकी समस्या को संवेदनशीलता के साथ समझा जा रहा है, तो संसाधनों की कमी बाधा नहीं रहती। जनता स्वयं समाधान के लिए आगे आती है।

“अतुल्य भारत के साथ अदृश्य भारत को भी देखना होगा”

वंचित और आदिवासी युवाओं के साथ अपने सामाजिक कार्यों का जिक्र करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि समाज के उन वर्गों तक पहुंचना जरूरी है, जो लंबे समय से मुख्यधारा से दूर रहे हैं। उन्होंने कहा, हम अतुल्य भारत की तो वंदना करते हैं, लेकिन अदृश्य भारत की ओर नहीं झांकते। हमें उन लोगों को भी यह एहसास कराना होगा कि पूरा भारत उन्हें अपना परिवार मानता है।

उन्होंने आदिवासी और वनवासी समाज के ऐतिहासिक योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के विकास में इन समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने बताया कि विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़, मिर्जापुर-सोनभद्र और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में वंचित समुदायों के बच्चों की शिक्षा के लिए कार्य किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ में बालवाटिका से कक्षा 12 तक के बच्चों के लिए दो निःशुल्क विद्यालय शुरू करने की दिशा में भी काम चल रहा है।

युवाओं को भटका हुआ कहने से पहले पिछली पीढ़ियों को आत्ममंथन करना चाहिए

युवाओं के आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों को लेकर डॉ. सिंह ने कहा कि युवा प्रश्न पूछेगा और व्यवस्था से सवाल करना उसका अधिकार है। उन्होंने कहा, “नई पीढ़ी का पुरानी पीढ़ी से प्रश्न पूछना स्वाभाविक है। अगर हम युवाओं को भटका हुआ कहते हैं, तो हमें यह भी देखना चाहिए कि उनके निर्माण में पिछली पीढ़ियों की क्या भूमिका रही है।”

उन्होंने कहा कि युवाओं को केवल रोजगार तलाशने वाला नहीं, बल्कि उद्यमी और रोजगार सृजक बनाने की दिशा में काम होना चाहिए। इसके लिए आर्थिक गतिविधियों, उद्यमिता, सामाजिक समावेश और निर्णय प्रक्रिया में युवाओं की भागीदारी बढ़ानी होगी।उन्होंने कहा, युवा ऊर्जा को रोकने या आरोप-प्रत्यारोप करने के बजाय उनसे संवाद, कौशल विकास और रचनात्मक जुड़ाव जरूरी है। राज्य और समाज दोनों की जिम्मेदारी है कि युवा ऊर्जा को राष्ट्र निर्माण की दिशा दें।

आधुनिक तकनीक के साथ भारतीय जीवन-दर्शन जरूरी

शिक्षा व्यवस्था में सुधार पर डॉ. सिंह ने कहा कि 21वीं सदी में तकनीकी रूप से सक्षम और प्रतिस्पर्धी होना आवश्यक है। शिक्षा व्यवस्था को विद्यार्थियों में वैज्ञानिक सोच के साथ-साथ वैज्ञानिक, तकनीकी, औद्योगिक और उद्यमशील दृष्टिकोण विकसित करना चाहिए। हालांकि, उन्होंने तकनीक को केवल एक साधन बताते हुए कहा, टेक्नोलॉजी एक टूल है, लेकिन उसका उपयोग कैसे होगा, यह वैल्यूज तय करती हैं। वैल्यूज के लिए जीवन-दर्शन जरूरी है।

उन्होंने भारतीय वेदांत दर्शन को प्रकृति, समाज और व्यक्ति के बीच संतुलन स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि आधुनिक विज्ञान और तकनीक को भारतीय ज्ञान परंपरा से मिले मानवीय मूल्यों के साथ जोड़ना चाहिए। उनके मुताबिक AI जैसी तकनीकों का इस्तेमाल केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज, राष्ट्र, मानवता और प्रकृति के हित में होना चाहिए। भारतीय शिक्षा बोर्ड भी आधुनिक शिक्षा और भारतीय ज्ञान परंपरा के बीच इसी तरह के समन्वय पर जोर देता है।

युवाओं के लिए तीन सूत्र—प्रश्न, रणनीति और धैर्यपूर्ण पुरुषार्थ

कार्यक्रम के अंत में युवाओं को संदेश देते हुए डॉ. एन.पी. सिंह ने तीन महत्वपूर्ण सूत्र बताए—सार्थक प्रश्न पूछना, स्पष्ट रणनीति बनाना और धैर्यपूर्ण पुरुषार्थ करना।

उन्होंने कहा, युवाओं को प्रश्न पूछने की क्षमता विकसित करनी होगी। इसके बाद जीवन, समाज, राष्ट्र और प्रकृति के प्रति अपनी रणनीति तय करनी होगी और उस पर निरंतरता के साथ काम करना होगा। उन्होंने युवाओं से केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित न रहने और अपनी सोच में समाज, राष्ट्र, प्रकृति तथा पूरी मानवता को शामिल करने का आह्वान किया।

डॉ. एन.पी. सिंह की बातचीत का मूल संदेश प्रशासन से लेकर शिक्षा और युवा नेतृत्व तक एक ही विचार के इर्द-गिर्द दिखाई देता है—संवेदनशीलता के बिना विकास अधूरा है और मूल्यों के बिना तकनीकी प्रगति दिशाहीन हो सकती है। उनका मानना है कि लोकसेवा का अर्थ केवल पद पर रहते हुए जिम्मेदारी निभाना नहीं, बल्कि समाज की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझकर समाधान के लिए आगे बढ़ना है।

उनकी दृष्टि में भारत का भविष्य ऐसे युवाओं के हाथों में होना चाहिए, जो सवाल पूछें, समाधान की रणनीति बनाएं और धैर्य के साथ उस पर काम करें। आधुनिक विज्ञान और तकनीक को भारतीय ज्ञान परंपरा, मानवीय मूल्यों और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता से जोड़ने की उनकी सोच शिक्षा और राष्ट्र निर्माण के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। यही कारण है कि डॉ. सिंह के लिए पद से अधिक महत्वपूर्ण सोच, उपलब्धि से अधिक महत्वपूर्ण समाज के प्रति योगदान और विकास से अधिक महत्वपूर्ण मानवता का हित है।


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