विद्यार्थी सिर्फ ज्ञान ग्रहण न करें, शिक्षक भी केवल ज्ञान न दें, संवाद से निकलेगा समाधान: डॉ. एन. पी. सिंह

संगीता सिंह, टेन न्यूज नेटवर्क

Greater Noida (05 सितंबर 2026): शिक्षक दिवस के अवसर पर देशभर में शिक्षकों के योगदान, गुरु-शिष्य परंपरा और शिक्षा के बदलते स्वरूप पर चर्चा हो रही है। इसी कड़ी में टेन न्यूज नेटवर्क से विशेष बातचीत में सेवानिवृत्त भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी एवं भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त भारतीय शिक्षा बोर्ड के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. एन. पी. सिंह ने शिक्षक-विद्यार्थी संबंध, भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा व्यवस्था को लेकर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को जानकारी देना या उन्हें चीजें याद करवाना नहीं होना चाहिए, बल्कि उनकी सोचने, सवाल करने और समस्याओं का समाधान खोजने की क्षमता विकसित करना होना चाहिए।

गुरु-शिष्य परंपरा में संवाद और सहयोग जरूरी

डॉ. एन. पी. सिंह ने शिक्षक दिवस पर शिक्षकों को संदेश देते हुए भारतीय शिक्षा परंपरा की विशेषता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि तैत्तिरीय उपनिषद में गुरु और शिष्य के बीच सहयोग, संवाद और साथ मिलकर आगे बढ़ने की भावना दिखाई देती है।

उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा के संदर्भ में “सह नाववतु, सह नौ भुनक्तु, सह वीर्यं करवावहै” और “तेजस्वि नावधीतमस्तु, मा विद्विषावहै” जैसे मंत्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था में गुरु और शिष्य के बीच ऐसी बॉन्डिंग होनी चाहिए, जिसमें दोनों साथ सीखें, साथ आगे बढ़ें और आपसी कटुता से दूर रहते हुए ज्ञान एवं प्रज्ञा का विकास करें।

शिक्षक और विद्यार्थी दोनों एक-दूसरे से सीखते हैं

डॉ. एन. पी. सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में यह अवधारणा नहीं रही कि केवल शिक्षक ही विद्यार्थी को शिक्षा देता है। इसके विपरीत, शिक्षक और विद्यार्थी दोनों एक-दूसरे से सीखते हैं। उन्होंने “सुभाषितानि बालकात्” का उल्लेख करते हुए कहा कि बच्चों से भी सीखने की आवश्यकता होती है।

उन्होंने शिक्षकों को अहंकार से बचने की सलाह देते हुए कहा कि “मैं शिक्षक हूं, मैं जो कहूंगा वही विद्यार्थी सुनें और उसका पालन करें” जैसी सोच शिक्षा और समाज, दोनों के लिए उचित नहीं है। शिक्षक का काम केवल अपनी बात विद्यार्थियों पर थोपना नहीं, बल्कि उनके साथ संवाद स्थापित करना और उनकी सोच को विकसित करना है।

“बच्चों को तोते की तरह Memorize मत कराइए”

आधुनिक शिक्षा व्यवस्था पर बात करते हुए डॉ. एन. पी. सिंह ने कहा कि शिक्षकों को विद्यार्थियों में केवल रटने की आदत विकसित नहीं करनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “बच्चों की दृष्टि को विकसित करो, बच्चों को तोते की तरह Memorize मत कराओ।”

उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों के भीतर Critical Examination, Cross Examination और Cross Validation की क्षमता विकसित करना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही उन्हें सामाजिक विश्लेषण, राजनीतिक संरचना को समझने और समकालीन चुनौतियों पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

उनके मुताबिक, आज की शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करवाना नहीं होना चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों को वास्तविक जीवन की चुनौतियों का सामना करने और उनके समाधान खोजने के लिए सक्षम बनाना होना चाहिए।

“किसी एक व्यक्ति के पास हर समस्या का समाधान नहीं होता”

डॉ. एन. पी. सिंह ने कहा कि किसी एक व्यक्ति के पास हर समस्या का समाधान नहीं हो सकता। न तो केवल शिक्षक के पास हर समस्या का समाधान है और न ही केवल विद्यार्थी के पास। लेकिन जब दोनों के बीच चर्चा, संवाद और विचार-विमर्श होता है, तो इसी प्रक्रिया से नए और बेहतर समाधान सामने आते हैं।

उन्होंने कहा कि “जब हम चर्चा करते हैं, Dialogue करते हैं, Discourse करते हैं, तो उसके गर्भ से कोई न कोई महान समाधान निकलता है।”

उनके अनुसार, संवाद और विचार-विमर्श की इसी प्रक्रिया से नई तकनीक, नए विचार और नई दार्शनिक अवधारणाएं जन्म लेती हैं।

शिक्षा व्यवस्था में Collaborative Learning पर जोर

शिक्षकों से अपील करते हुए डॉ. एन. पी. सिंह ने कहा कि विद्यार्थी को केवल Receiver और शिक्षक को केवल Sender मानने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को Mutual, Collaborative और Discourse-based बनाने पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि शिक्षक और विद्यार्थी के बीच निरंतर संवाद होना चाहिए, ताकि विद्यार्थी स्वतंत्र रूप से प्रश्न पूछ सकें, अपनी राय रख सकें और किसी विषय को अलग-अलग दृष्टिकोण से समझ सकें। उन्होंने इसे न केवल वर्तमान समय की आवश्यकता बताया, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल भावना भी करार दिया।

शिक्षक दिवस पर शिक्षा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण संदेश

डॉ. एन. पी. सिंह का यह संदेश शिक्षक दिवस के अवसर पर शिक्षा व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण सामने रखता है। उनके अनुसार, एक बेहतर शिक्षक वही है जो विद्यार्थियों को केवल ज्ञान उपलब्ध नहीं कराता, बल्कि उन्हें सोचने, सवाल करने, विश्लेषण करने, संवाद करने और समाधान खोजने के लिए तैयार करता है।

शिक्षक दिवस केवल शिक्षकों को सम्मान देने का अवसर नहीं, बल्कि शिक्षा के उद्देश्य और गुरु-शिष्य संबंध की भूमिका पर पुनर्विचार करने का भी दिन है। डॉ. एन. पी. सिंह के विचार शिक्षा को अधिक संवादात्मक, सहयोगात्मक और विचार-आधारित बनाने की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।

टेन न्यूज नेटवर्क से बातचीत में डॉ. एन. पी. सिंह ने शिक्षक दिवस पर शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच मजबूत संवाद, आपसी सीख और स्वतंत्र चिंतन को भविष्य की प्रभावी शिक्षा व्यवस्था की आधारशिला बताया।


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