अखरोट के छिलकों से पानी शुद्ध करने का कमाल: DU के छात्र का अनोखा इनोवेशन

टेन न्यूज़ नेटवर्क

New Delhi News (22 April 2026): कचरे का बढ़ता ढेर और पानी का प्रदूषण आज के समय की ये दो बड़ी चुनौतियां हैं, लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज की छात्रा श्रीजा श्रीवास्तव ने इन दोनों समस्याओं का एक साथ समाधान खोजने की दिशा में अहम कदम उठाया है। उन्होंने अखरोट समेत विभिन्न फलों के छिलकों से ऐसा पदार्थ तैयार किया है, जो गंदे पानी को साफ करने में बेहद कारगर साबित हो सकता है। यह इनोवेशन न केवल वैज्ञानिक सोच को दर्शाता है, बल्कि “कचरे से संसाधन” की अवधारणा को भी मजबूती देता है।

दरअसल, श्रीजा ने जिन छिलकों को आमतौर पर बेकार समझकर फेंक दिया जाता है, उन्हें एक विशेष प्रक्रिया से गुजारकर “बायोचार” में बदल दिया। यह बायोचार एक कार्बन-समृद्ध पदार्थ होता है, जिसमें गंदगी और जहरीले तत्वों को सोखने की अद्भुत क्षमता होती है। छिलकों को पहले सुखाया जाता है और फिर कम ऑक्सीजन वाले वातावरण में गर्म किया जाता है, जिससे वे जलने के बजाय धीरे-धीरे बायोचार में परिवर्तित हो जाते हैं। इसके बाद एसिड या बेस से “एक्टिवेशन” प्रक्रिया कर इसकी सतह पर सूक्ष्म छिद्र बनाए जाते हैं, जो प्रदूषकों को पकड़ने में मदद करते हैं।

इस तकनीक की प्रभावशीलता प्रयोगों में भी साबित हुई है। श्रीजा के अनुसार, जब इस बायोचार को गंदे पानी में डाला जाता है, तो यह खासतौर पर औद्योगिक रंगों जैसे मेथिलीन ब्लू और मिथाइल ऑरेंज को तेजी से सोख लेता है। उनके प्रयोग में मात्र 20 मिलीग्राम बायोचार ने 40 मिनट के भीतर पानी में मौजूद गंदगी को लगभग पूरी तरह साफ कर दिया। यह नतीजा बताता है कि यह तकनीक जल शोधन के क्षेत्र में एक सशक्त विकल्प बन सकती है।

इस इनोवेशन की सबसे बड़ी खासियत इसकी सादगी और कम लागत है। इसमें महंगे उपकरणों या जटिल तकनीकों की जरूरत नहीं होती, जिससे इसे गांवों, छोटे शहरों और छोटे उद्योगों में भी आसानी से अपनाया जा सकता है। जहां बड़े वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाना संभव नहीं होता, वहां यह तरीका एक सस्ता और प्रभावी समाधान बन सकता है। साथ ही, यह स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों के उपयोग को भी बढ़ावा देता है।

पर्यावरणीय दृष्टि से भी यह तकनीक दोहरा लाभ देती है एक ओर यह जैविक कचरे को कम करती है और दूसरी ओर जल प्रदूषण को घटाती है। UGRE 2026 में प्रस्तुत यह प्रोजेक्ट भविष्य में बड़े स्तर पर लागू होने की संभावनाएं रखता है। यदि इस पर और शोध व निवेश किया जाए, तो यह तकनीक न केवल भारत बल्कि वैश्विक स्तर पर जल संकट और प्रदूषण से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।


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