सीवर कर्मियों की अनकही पीड़ा और अधूरी मोहब्बत की मार्मिक दास्तान है फिल्म ‘पारो–पिनाकी’

टेन न्यूज नेटवर्क

नई दिल्ली,(06 फरवरी 2026): फिल्म पारो–पिनाकी की प्रेम कहानी दर्शकों के दिल को भीतर तक झकझोर देने वाली है। यह फिल्म न सिर्फ एक प्रेम कथा है, बल्कि समाज के उस वर्ग की सच्चाई को सामने लाती है, जिसे अक्सर हम देखते हुए भी अनदेखा कर देते हैं। सीवर कर्मियों की अमानवीय परिस्थितियां और एक गरीब सब्जी बेचने वाली लड़की की अधूरी मोहब्बत को बेहद सादगी और ईमानदारी के साथ पर्दे पर उतारा गया है।

फिल्म देखने के बाद दर्शक लीड एक्ट्रेस और निर्माता इशिता सिंह की जमकर सराहना करेंगे। उन्होंने अपनी पूरी जमापूंजी लगाकर इस फिल्म को बनाया, जहां बॉक्स ऑफिस या मुनाफे का लालच कहीं नजर नहीं आता। यह फिल्म एक सामाजिक जिम्मेदारी के साथ बनाई गई सिनेमा की मिसाल है। इशिता सिंह ने जिस संजीदगी से इस विषय को चुना और रिसर्च टीम के साथ इस पर काम किया, वह काबिल-ए-तारीफ है।

अक्सर अखबारों के अंदरूनी पन्नों पर सीवर की सफाई के दौरान जहरीली गैस से मरने वाले सीवर कर्मियों की खबरें छपती हैं, जिन्हें हम पलट कर आगे बढ़ जाते हैं। यही उदासीनता सिस्टम और सत्ता से जुड़े लोगों में भी देखने को मिलती है। लेकिन आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह की बेटी इशिता सिंह ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और एक बेहद साधारण लेकिन प्रभावशाली प्रेम कहानी के जरिए इस सच्चाई को सामने रखा।

फिल्म की कहानी मुंबई की एक स्लम बस्ती से शुरू होती है, जहां मरियम उर्फ पारो (इशिता सिंह) अपने परिवार के साथ रहती है और अपने अब्बा के साथ बाजार में सब्जी बेचती है। पारो को पास की कॉलोनी में रहने वाले पिनाकी (संजय बिश्नोई) से सच्चा प्यार हो जाता है, जो सीवर की सफाई का काम करता है। पारो अपने प्यार के लिए घर से खाना लेकर पिनाकी से मिलने जाती है। हालांकि, पारो के अब्बा को यह रिश्ता मंजूर नहीं होता और वह अपनी बेटी को मानव तस्करी करने वाले गिरोह को बेच देता है। इसके बाद पारो अपने सच्चे प्यार से दूर घुट-घुट कर जीने को मजबूर हो जाती है, जबकि पिनाकी उसे ढूंढने के लिए सब कुछ भूलकर भटकता रहता है। क्या पिनाकी को उसका प्यार मिलता है या यह प्रेम कहानी अधूरी रह जाती है—यह जानने के लिए फिल्म देखनी होगी।

फिल्म के ओवरऑल प्रभाव की बात करें तो इशिता सिंह ने अपने किरदार को बिना मेकअप पूरी सच्चाई और ईमानदारी के साथ निभाया है। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि यह फिल्म सिर्फ एक लव स्टोरी नहीं, बल्कि समाज के उन तबकों की सच्चाई दिखाने की कोशिश है, जिनकी बात हम कभी नहीं करते। पिनाकी के किरदार में संजय बिश्नोई कुछ दृश्यों में कमजोर जरूर नजर आते हैं, लेकिन अपने रोल के साथ उन्होंने पूरी ईमानदारी बरती है।

लेखक और निर्देशक रुद्र जादौन की भी सराहना की जानी चाहिए, जिन्होंने सीमित बजट के बावजूद कहानी की मांग के अनुसार पूरी फिल्म को आउटडोर लोकेशंस पर शूट किया। फिल्म एक बेहद गंभीर और संवेदनशील मुद्दा उठाती है, यही वजह है कि इसकी छोटी-मोटी खामियों को नजरअंदाज किया जा सकता है। यदि आप सच्चाई से जुड़ी, समाज को आईना दिखाने वाली फिल्में पसंद करते हैं, तो पारो–पिनाकी आपके लिए जरूर देखने लायक है।।


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