देश में बढ़ते यौन अपराध: हर 18 मिनट में एक लड़की शिकार

टेन न्यूज नेटवर्क

National News (06/02/2026): भारत में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराध लगातार गंभीर रूप लेते जा रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, देश में हर दिन औसतन 80 से अधिक बलात्कार के मामले सामने आते हैं। इसका मतलब है कि लगभग हर 18 मिनट में एक लड़की इस अपराध का शिकार होती है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, 90 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में आरोपी कोई अजनबी नहीं होता, बल्कि पीड़िता का जानकार होता है। इनमें दोस्त, रिश्तेदार, पड़ोसी या सहकर्मी शामिल रहते हैं। इससे यह साफ होता है कि महिलाओं के लिए खतरा अक्सर उनके आसपास के लोगों से ही होता है।

बच्चों के खिलाफ अपराध भी तेजी से बढ़े हैं। वर्ष, 2023 में बच्चों के खिलाफ कुल 1,77,335 मामले दर्ज किए गए, जिनमें से करीब 38 प्रतिशत मामले यौन उत्पीड़न से जुड़े थे। यानी हर तीन में से एक बच्चा किसी न किसी रूप में यौन अपराध का शिकार हुआ।

समाज और सिस्टम की, संवेदनहीनता भी इस समस्या को और गहरा बना रही है। जब ऐसे अपराध रोज की खबर बन जाते हैं, तो लोग धीरे-धीरे उन्हें सामान्य मानने लगते हैं। संवेदना की जगह आदत ले लेती है, जिससे पीड़ितों के दर्द को गंभीरता से नहीं लिया जाता।

पीड़िताओं को न्याय की जगह कई बार मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। थानों और अदालतों में उनसे ऐसे सवाल किए जाते हैं— “क्या पहना था?”, “कहां गई थी?”, “किसके साथ थी?”। इन सवालों से अपराधी पर नहीं, बल्कि पीड़िता पर ही शक किया जाता है।

इसी वजह से कई लड़कियां चुप रहना ही, बेहतर समझती हैं। उन्हें लगता है कि सिस्टम और समाज दोनों उनके खिलाफ खड़े हैं। अपराधी से जवाब मांगना मुश्किल होता है, लेकिन पीड़िता से सफाई मांगना आसान समझा जाता है।

इन मुद्दों को हाल ही में फिल्म ‘80’ के ट्रेलर के जरिए भी सामने लाया गया है। फिल्म में तापसी पन्नू मुख्य भूमिका में हैं। यह फिल्म दिखाती है कि भले ही कानून और नियम बदल गए हों, लेकिन पुलिस, अदालत और राजनीति की मानसिकता आज भी काफी हद तक पुरानी बनी हुई है।

अनुभव सिन्हा की फिल्मों का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की कमजोरियों और सड़न पर सवाल उठाना रहा है। उनकी फिल्मों में सामाजिक मुद्दों को खुलकर दिखाया जाता है और लोगों को सोचने पर मजबूर किया जाता है।

अंत में यह चेतावनी दी गई है कि, जब तक इन आंकड़ों को सिर्फ नंबर समझकर नजरअंदाज किया जाता रहेगा और तब तक इंतजार किया जाएगा जब तक यह समस्या हमारे घर तक न पहुंचे, तब तक अपराधी बेखौफ रहेंगे। समाज कानून से नहीं, बल्कि अपनी कमियों को स्वीकार कर उन्हें बदलने से ही बेहतर बन सकता है।

डिस्क्लेमर: यह लेख / न्यूज आर्टिकल सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध जानकारी और प्रतिष्ठित / विश्वस्त मीडिया स्रोतों से मिली जानकारी पर आधारित है।यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। पाठक कृपया स्वयं इस की जांच कर सूचनाओं का उपयोग करे ॥


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