कागज और कलम से देश की सबसे बड़ी ठगी: ताजमहल से संसद तक ‘बेचने’ वाला नटवरलाल

टेन न्यूज नेटवर्क

National News (04/02/2026): भारत के सबसे चर्चित ठगों में शामिल नटवरलाल की कहानी आज भी लोगों को हैरान करती है। दावा किया जाता है कि उसने फर्जी दस्तावेजों के जरिए ताजमहल, लाल किला, राष्ट्रपति भवन और संसद भवन जैसी ऐतिहासिक और सरकारी संपत्तियों को कई बार बेच दिया। उस पर 113 साल की सजा सुनाई गई थी, लेकिन वह हर बार पुलिस को चकमा देकर फरार हो जाता था। उसका असली नाम मिथिलेश कुमार था और वह अपनी तेज दिमागी क्षमता और लिखावट की नकल के लिए जाना जाता था।

नटवरलाल का जन्म बिहार के सिवान जिले के जीरादेही गांव में हुआ था। वह कानून की पढ़ाई कर रहा था, लेकिन उसकी असली पहचान हस्ताक्षर की नकल करने की कला से बनी। वह इतनी सफाई से साइन करता था कि असली और नकली में फर्क कर पाना मुश्किल हो जाता था। उसकी पहली ठगी पड़ोसी के चेक पर फर्जी हस्ताक्षर करके ₹1000 निकालने से शुरू हुई थी।

धीरे-धीरे उसने सरकारी सिस्टम की, कमजोरियों को समझ लिया। वह सरकारी गेस्ट हाउस में रुकता, सरकारी गाड़ियों का इस्तेमाल करता और बड़े अधिकारियों व मंत्रियों के नाम पर फर्जी सिफारिशी पत्र बनाता था। उस समय कागजी कार्रवाई पर ज्यादा भरोसा किया जाता था, जिसका फायदा उठाकर वह लोगों को आसानी से ठग लेता था।

नटवरलाल केवल हस्ताक्षर ही नहीं, बल्कि पुराने दस्तावेजों जैसी दिखने वाली फाइलें और मुहरें तैयार करने में भी माहिर था। वह कागजों को पुराना दिखाने की तकनीक जानता था। वह विदेशी पर्यटकों और व्यापारियों को यह विश्वास दिलाता था कि सरकार गुपचुप तरीके से संपत्तियां लीज पर दे रही है। उसने बड़े उद्योगपतियों के नाम का इस्तेमाल कर भी कई लोगों को ठगा।

1996 में उसकी रहस्यमयी फरारी सबसे चर्चित घटना रही। उस समय उसकी उम्र 84 साल थी और वह व्हीलचेयर पर था। पुलिस उसे कानपुर जेल से इलाज के लिए दिल्ली के एम्स ले जा रही थी। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की भीड़ में वह अचानक गायब हो गया और फिर कभी नहीं मिला।

नटवरलाल की मौत को लेकर भी भ्रम बना रहा। उसके वकील के अनुसार उसकी मौत 25 जुलाई 2009 को हुई थी, जबकि उसके भाई का दावा था कि 1996 में ही उसका अंतिम संस्कार हो चुका था। इस तरह उसकी जिंदगी की तरह उसकी मौत भी रहस्य बनी रही।

उसके गांव के लोग, आज भी उसे अपराधी के बजाय एक अलग नजरिए से देखते हैं। गांव वालों के अनुसार, वह गरीबों को नुकसान नहीं पहुंचाता था और ठगी से मिले पैसों का एक हिस्सा गांव की जरूरतों और शादियों में खर्च करता था। इसी वजह से कई लोग उसे ‘रॉबिन हुड’ जैसा मानते थे।

नटवरलाल की कहानी यह दिखाती है कि, कैसे उसने कागज और कलम के जरिए बड़े-बड़े घोटालों को अंजाम दिया। आज के डिजिटल दौर में इसी तरह की ठगी ऑनलाइन माध्यमों से हो रही है। उसकी कहानी लालच और लापरवाही से होने वाले नुकसान की एक बड़ी मिसाल मानी जाती है।

डिस्क्लेमर: यह लेख / न्यूज आर्टिकल सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध जानकारी और प्रतिष्ठित / विश्वस्त मीडिया स्रोतों से मिली जानकारी पर आधारित है।यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। पाठक कृपया स्वयं इस की जांच कर सूचनाओं का उपयोग करे ॥


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