वैश्विक तनाव के बीच OPEC+ ने साधा संतुलन, तेल उत्पादन में कोई बदलाव नहीं

टेन न्यूज नेटवर्क

National News (05/01/2026): दुनियाभर में बढ़ते युद्ध, कूटनीतिक तनाव और ऊर्जा बाजार में जारी अस्थिरता के बीच तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC+ ने एक अहम और दूरगामी असर वाला निर्णय लिया है। संगठन ने फिलहाल कच्चे तेल के उत्पादन में किसी भी तरह का बदलाव न करने का फैसला किया है। यानी आने वाले समय में तेल की आपूर्ति मौजूदा स्तर पर ही बनी रहेगी।

दरअसल, OPEC+ की पहले यह योजना थी कि वर्ष 2026 के शुरुआती तीन महीनों—जनवरी, फरवरी और मार्च—में तेल उत्पादन में क्रमिक बढ़ोतरी की जाए। लेकिन मौजूदा वैश्विक हालात को देखते हुए इस योजना को फिलहाल स्थगित कर दिया गया है। संगठन का मानना है कि उत्पादन बढ़ाने या घटाने, दोनों ही स्थितियों में अंतरराष्ट्रीय बाजार पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य-पूर्व में ईरान से जुड़ा तनाव और अमेरिका के साथ बढ़ती भू-राजनीतिक खींचतान के कारण वैश्विक तेल बाजार पहले से ही दबाव में है। ऐसे माहौल में तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर इस समय उत्पादन बढ़ाया जाता तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें और गिर सकती थीं, जो पहले ही लगभग 18 प्रतिशत तक कमजोर हो चुकी हैं। इससे तेल निर्यातक देशों की आय पर सीधा असर पड़ता।

वहीं, यदि उत्पादन में कटौती की जाती, तो बाजार में तेल की कमी हो सकती थी। इसका सीधा असर भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों पर पड़ता, जहां पेट्रोल और डीजल के दाम तेजी से बढ़ सकते थे और महंगाई को और हवा मिलती।

OPEC+ दुनिया के सबसे प्रभावशाली तेल उत्पादक देशों का गठजोड़ है। इसमें 12 OPEC सदस्य देशों के अलावा रूस, मैक्सिको जैसे 10 अन्य बड़े तेल उत्पादक देश शामिल हैं। कुल मिलाकर यह 22 देशों का समूह है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के बड़े हिस्से को नियंत्रित करता है।

इस संगठन का मूल उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखना है, ताकि कीमतें न तो जरूरत से ज्यादा गिरें और न ही अचानक बहुत बढ़ जाएं। OPEC+ के फैसले सीधे तौर पर वैश्विक अर्थव्यवस्था, महंगाई दर और ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करते हैं।

हालांकि OPEC+ में 22 देश शामिल हैं, लेकिन असली प्रभाव कुछ गिने-चुने देशों के पास ही है। सऊदी अरब, रूस और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे लगभग 8 देश मिलकर दुनिया के करीब 50 प्रतिशत कच्चे तेल का उत्पादन करते हैं। यही वजह है कि इन देशों के आपसी संबंध, मतभेद या सहमति वैश्विक तेल कीमतों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। हाल के महीनों में सऊदी अरब और यूएई के बीच उत्पादन को लेकर मतभेद की खबरें भी सामने आई थीं, जिनका असर OPEC+ की रणनीति पर साफ देखा गया।

तेल उत्पादन को न बढ़ाने और न घटाने का फैसला एक तरह से संतुलन की नीति माना जा रहा है। OPEC+ का उद्देश्य एक ओर तेल निर्यातक देशों की आय को सुरक्षित रखना है, तो दूसरी ओर वैश्विक अर्थव्यवस्था को किसी बड़े झटके से बचाना भी है।हालांकि, इस फैसले की आलोचना भी हो रही है। कुछ अर्थशास्त्रियों और विकासशील देशों का मानना है कि यदि उत्पादन बढ़ाया जाता तो तेल सस्ता होता और गरीब तथा आयात-निर्भर देशों को राहत मिलती। लेकिन OPEC+ का तर्क है कि मौजूदा अनिश्चित वैश्विक हालात में कीमतों को नियंत्रण में रखना ही सबसे व्यावहारिक कदम है।

अब आगे की तस्वीर इस बात पर निर्भर करेगी कि वैश्विक स्तर पर तेल की मांग किस रफ्तार से बढ़ती है और रूस-यूक्रेन युद्ध व मध्य-पूर्व के हालात किस दिशा में जाते हैं। OPEC+ ने संकेत दिए हैं कि वह बाजार की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और जरूरत पड़ने पर भविष्य में रणनीति में बदलाव किया जा सकता है।

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