E-20 पर फर्जी AI वीडियो मामले में गडकरी ने Meta, X और Google को कोर्ट में घसीटा

टेन न्यूज नेटवर्क

National News (28/07/2026): आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डीपफेक तकनीक के बढ़ते दुरुपयोग ने देश की कानूनी और राजनीतिक व्यवस्था में नई हलचल पैदा कर दी है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को सोशल मीडिया की दिग्गज कंपनियों Meta (Facebook और Instagram), X (पूर्व में Twitter) और Google LLC के खिलाफ सिविल मानहानि (Civil Defamation) का मुकदमा दायर करने की मंजूरी दे दी है। यह मामला सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे AI-जनरेटेड फर्जी वीडियो और भ्रामक डिजिटल कंटेंट से जुड़ा है, जिसमें केंद्रीय मंत्री को केंद्र सरकार के E20 (20% इथेनॉल मिश्रण) कार्यक्रम से जोड़कर गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

आरोप है कि सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर अज्ञात यूजर्स द्वारा बनाए और प्रसारित किए गए डीपफेक वीडियो और रील्स में दावा किया गया कि नितिन गडकरी देश की E20 नीति को लागू कराने के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार हैं। इन वायरल पोस्ट्स में यह भी आरोप लगाया गया कि इस नीति से गडकरी और उनके परिवार को अनुचित वित्तीय लाभ (Pecuniary Benefits) हुआ है। याचिका में कहा गया है कि ये पोस्ट्स पूरी तरह झूठी, दुर्भावनापूर्ण और उनकी छवि को धूमिल करने के उद्देश्य से तैयार की गई हैं। इनमें भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और पद के दुरुपयोग जैसे संकेत भी दिए गए हैं।

अदालत में दायर याचिका में नितिन गडकरी ने स्पष्ट किया कि वे वर्ष 2014 से सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री हैं, लेकिन इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम का नीतिगत संचालन उनके मंत्रालय के अधीन नहीं आता। यह नीति केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय (Ministry of Petroleum and Natural Gas) तथा केंद्रीय मंत्रिमंडल के अधिकार क्षेत्र में आती है।

गडकरी के वकील संदीप एस. लड्ढा ने अदालत को बताया कि इस मुकदमे का उद्देश्य नीतियों की निष्पक्ष आलोचना या स्वस्थ बहस को रोकना नहीं है। यह कार्रवाई केवल उन 24 विशिष्ट पोस्ट्स के खिलाफ है, जो पूरी तरह मनगढ़ंत, अपमानजनक हैं और गडकरी के व्यक्तित्व एवं प्रचार अधिकारों (Personality and Publicity Rights) का उल्लंघन करती हैं। प्रतिष्ठा को हुए नुकसान के लिए 11 करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग की गई है। साथ ही सोशल मीडिया कंपनियों से इन वीडियो को तत्काल हटाने और भविष्य में इनके दोबारा अपलोड पर स्थायी रोक लगाने की भी मांग की गई है।

बताया गया कि जिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और कंटेंट क्रिएटर्स के खिलाफ मामला दायर किया जाना है, वे बॉम्बे हाई कोर्ट के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। ऐसे में मुकदमा दायर करने से पहले अदालत से ‘लीव पिटीशन’ (Leave Petition) के माध्यम से अनुमति लेना कानूनी रूप से आवश्यक था। जस्टिस अभय आहूजा ने माना कि यह कंटेंट मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र में देखा जा रहा है और इससे मंत्री की छवि प्रभावित हो रही है। इसी आधार पर उन्होंने सिविल कार्यवाही शुरू करने की अनुमति दे दी। मामले में अंतरिम राहत (कंटेंट हटाने के तात्कालिक आदेश) पर अगली सुनवाई जस्टिस आरिफ डॉक्टर की अदालत में होगी।

यह मामला भारत में डिजिटल गवर्नेंस, प्लेटफॉर्म जवाबदेही (Platform Liability) और पर्सनैलिटी राइट्स के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। जब एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री को अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए वैश्विक टेक कंपनियों के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है, तो यह AI-जनरेटेड डीपफेक और फर्जी खबरों के बढ़ते खतरे को भी उजागर करता है। यह मुकदमा सोशल मीडिया कंपनियों के लिए एक स्पष्ट संदेश माना जा रहा है कि वे केवल ‘इंटरमीडियरी’ होने का हवाला देकर डीपफेक कंटेंट के प्रसार से अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह बच नहीं सकतीं और उन्हें कंटेंट मॉडरेशन को लेकर अधिक सतर्क रहना होगा।


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