गुरु पूर्णिमा विशेष: डॉ. मारकंडेय आहूजा का जीवन, गुरु की महिमा और नई पीढ़ी को संदेश

टेन न्यूज नेटवर्क

New Delhi News (10/07/2025): गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर गुरुग्राम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति, लेखक, गीताविद्, प्रखर वक्ता एवं अंतरराष्ट्रीय लाइफ कोच डॉ. मारकंडेय आहूजा (Dr Markanday Ahuja) ने Ten News से विशेष बातचीत में गुरु की परंपरा, शिक्षा की भूमिका और युवा पीढ़ी की दिशा पर गहन विचार साझा किए। उन्होंने बताया कि गुरु केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाने वाले पथप्रदर्शक होते हैं। गुरु का कार्य शिष्य के अंतर्मन में ज्ञान का दीप जलाना है। आहूजा के अनुसार, गुरु का महत्व आज का नहीं, बल्कि सृष्टि की उत्पत्ति जितना पुराना है। भारत में सदियों से गुरु-शिष्य परंपरा जीवंत रही है, जो ज्ञान, मूल्य और संस्कारों की नींव रखती है। इस अवसर पर उन्होंने अनेक ऐतिहासिक प्रसंगों को जोड़ते हुए गुरु की महिमा को रेखांकित किया।

डॉ. आहूजा ने भगवान राम और कृष्ण के उदाहरण देकर समझाया कि जब भगवान विष्णु ने धरती पर अवतार लिया, तब भी उन्हें गुरु की आवश्यकता पड़ी। राम ने गुरु वशिष्ठ और फिर विश्वामित्र से ज्ञान प्राप्त किया, तो कृष्ण ने संदीपनि ऋषि से शिक्षा ली। उन्होंने बताया कि राम-लक्ष्मण ने गुरु के लिए रातें बिना सोए और बिना खाए व्यतीत कीं ताकि उनके यज्ञ की रक्षा हो सके। यह उदाहरण दर्शाता है कि ईश्वर का भी मार्गदर्शन बिना गुरु के अधूरा है। उन्होंने कहा, अगर चाणक्य न होते तो चंद्रगुप्त, समर्थ रामदास न होते तो शिवाजी और राघवेंद्र न होते तो महाराणा प्रताप न बनते।

डॉ. आहूजा ने एकलव्य और कर्ण के उदाहरण देकर बताया कि गुरु की उपस्थिति शारीरिक न हो, तब भी श्रद्धा और समर्पण से ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। एकलव्य ने द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाकर धनुर्विद्या सीखी, वहीं कर्ण ने ब्राह्मण बनकर परशुराम से शिक्षा ली। उन्होंने कहा कि गुरु ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के समान पूज्य हैं क्योंकि वे व्यक्ति को पुनर्निर्मित करते हैं। गुरु का कार्य केवल विषय की शिक्षा देना नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देना है। इसीलिए गुरु का स्थान सर्वोच्च होता है और वह जीवन भर पूज्य बना रहता है।

उन्होंने आज की शिक्षा प्रणाली में सकारात्मक मानसिकता की आवश्यकता पर जोर दिया। आहूजा ने एक सर्वेक्षण का हवाला दिया जिसमें बताया गया कि 85% लोग सकारात्मक रवैये के कारण नियुक्त हुए और नकारात्मक सोच वाले हटाए गए। उन्होंने यह भी कहा कि हमारी परवरिश में बच्चों को बार-बार “मत कर” सुनाया जाता है, जिससे उनका आत्मविश्वास और जिज्ञासा खत्म होती है। ऐसे बच्चों को सकारात्मक सोच सिखाने के लिए चार गुना अधिक प्रयास करने पड़ते हैं। इसलिए पेरेंटिंग में बदलाव और सकारात्मक संवाद की आवश्यकता है।

गीता का उदाहरण देते हुए डॉ. आहूजा ने बताया कि कैसे कृष्ण ने निराश अर्जुन को प्रेरित कर युद्ध के लिए तैयार किया। उन्होंने कहा कि गीता एक ऐसा ग्रंथ है जो नकारात्मकता से बाहर निकाल कर व्यक्ति को निर्णय लेने की क्षमता देता है। कृष्ण ने अर्जुन को ना केवल युद्ध के लिए तैयार किया, बल्कि जीवन के दर्शन भी सिखाए। उन्होंने कहा कि गुरु भी वही करता है — भ्रम और मोह को समाप्त कर मार्गदर्शन देता है। इसीलिए उन्होंने गीता को “श्रेष्ठतम गुरु” कहा, जो हर युग में मार्गदर्शन देती रही है।

डॉ. आहूजा ने स्वास्थ्य और दिनचर्या पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि शरीर में ‘सर्केडियन रिद्म’ यानी प्राकृतिक घड़ी होती है, जो सूर्य के अनुसार हार्मोन्स नियंत्रित करती है। देर रात मोबाइल देखने और देर से सोने की आदत इस रिद्म को बिगाड़ देती है जिससे मानसिक और शारीरिक समस्याएं बढ़ती हैं। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी में अधीरता, चिड़चिड़ापन और असहिष्णुता बढ़ रही है जिसका मुख्य कारण असंतुलित जीवनशैली है। इसलिए दिनचर्या और जीवन में संतुलन अत्यंत आवश्यक है।

जीवन के चार स्तंभों—शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक संतुलन—की चर्चा करते हुए डॉ. आहूजा ने कहा कि संतुलित जीवन ही स्थायित्व देता है। उन्होंने कहा कि जिम बढ़ रहे हैं लेकिन शारीरिक श्रम कम हो रहा है, और सोशल मीडिया के कारण सामाजिक जुड़ाव कमजोर हो गया है। मानसिक शांति के लिए लोग पैसे खर्च कर “मेंटल पीस” खरीदने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन असली समाधान आत्मचिंतन और संतुलन में है। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक विकास के बिना सम्पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण संभव नहीं।

स्पिरिचुअलिटी यानी आध्यात्मिकता को समझने की आवश्यकता पर बल देते हुए आहूजा ने बताया कि कैसे स्वामी विवेकानंद को उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस ने दिशा दी। विवेकानंद को घर में रोटी तक नहीं मिलती थी, लेकिन परमहंस के सान्निध्य ने उन्हें ऐसा आत्मिक बल दिया कि वे दुनिया को भारत के दर्शन से परिचित करा सके। गुरु के आशीर्वाद से ही वे शिकागो में धर्म सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व कर सके। उन्होंने कहा कि सही गुरु मिल जाए तो साधारण व्यक्ति भी महान बन सकता है।

नई शिक्षा नीति NEP 2020 की सराहना करते हुए डॉ. आहूजा ने कहा कि यह पहली ऐसी नीति है जिसे आमजन की भागीदारी से तैयार किया गया। साढ़े चार लाख से अधिक सुझाव लेकर बनी यह नीति भारतीय परंपरा, वेद, संस्कृति और आधुनिक आवश्यकताओं को जोड़ती है। उन्होंने कहा कि यह नीति बच्चों की जिज्ञासा को बढ़ावा देती है और उन्हें सोचने की स्वतंत्रता देती है। पहली बार शिक्षा को केवल नौकरियों तक सीमित न रखकर जीवन निर्माण का माध्यम बनाया गया है।

डॉ. आहूजा ने बताया कि NEP 2020 में मल्टीपल एंट्री और एग्जिट की व्यवस्था से विद्यार्थी अब बिना साल खराब किए विषय बदल सकते हैं। यह लचीलापन उन्हें आत्मविश्लेषण का अवसर देगा और वे अपने लिए सही राह चुन सकेंगे। उन्होंने कहा कि शिक्षा अब केवल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम बननी चाहिए। जब सोच बदलेगी, तभी समाज बदलेगा और राष्ट्र प्रगति करेगा।

उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति केवल स्किल्स पर नहीं, बल्कि विल यानी इच्छा शक्ति और इरादों पर भी ध्यान देती है। उन्होंने बताया कि शिक्षा में अब तक हम केवल कंटेंट और स्किल डिवेलपमेंट पर केंद्रित रहे हैं, लेकिन अब समय आ गया है कि हम छात्रों की अंतःप्रेरणा और मूल्यों पर भी काम करें। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि व्यक्ति डॉक्टर, इंजीनियर या चार्टर्ड अकाउंटेंट बन सकता है, लेकिन जब तक वह अच्छा इंसान नहीं बनता, तब तक उसका विकास अधूरा है।

डॉ. आहूजा ने टेक्नोलॉजी के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं की चर्चा करते हुए कहा कि कंप्यूटर केवल हमारे लेफ्ट ब्रेन यानी तर्क की क्षमता को बढ़ा सकता है, लेकिन प्रेम, करुणा, दया जैसे गुण राइट ब्रेन से आते हैं जो तकनीक नहीं दे सकती। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रयोग सोच-समझकर करना होगा। बिना मस्तिष्क विकसित किए बच्चों को मोबाइल और सोशल मीडिया देना खतरनाक हो सकता है।

उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि अगर किसी बच्चे के पास महान तकनीक हो लेकिन मूल्य और विवेक न हो तो वह उसका दुरुपयोग कर सकता है। इसलिए हमें पहले व्यक्ति निर्माण पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि सुपात्र व्यक्ति जब तकनीक से जुड़ता है तो उसका सदुपयोग करता है। इसलिए शिक्षा को केवल जानकारी तक सीमित न रखकर समग्र विकास की ओर बढ़ना चाहिए।

डॉ. आहूजा ने बताया कि अब क्लासरूम का स्वरूप भी बदल गया है। शिक्षक का पहनावा, व्यवहार, भाषा, सब कुछ विद्यार्थियों को अवचेतन रूप में प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि उपनिषदों की परंपरा में गुरु के समीप बैठकर प्राप्त किया गया ज्ञान सबसे प्रभावशाली होता था। आज भी वन-टू-वन संबंध, भावनात्मक जुड़ाव और चरित्र निर्माण शिक्षा का आवश्यक हिस्सा हैं। केवल सूचना देना शिक्षा नहीं है, बल्कि संस्कार और दृष्टिकोण देना भी जरूरी है।

गुरु पूर्णिमा के दिन डॉ. आहूजा ने संदेश दिया कि इस शुभ अवसर पर हर व्यक्ति को संकल्प लेना चाहिए कि वह एक अच्छा इंसान बनेगा। उन्होंने कहा कि शिक्षा का अंतिम लक्ष्य अच्छा नागरिक, अच्छा मानव और अच्छा समाज बनाना होना चाहिए। डिग्री से केवल जीविका मिलती है, लेकिन गुरु से जीवन मिलता है। उन्होंने अंत में दोहराया कि सोच को बदलो, नजर को बदलो, रवैये को बदलो—इसी से राष्ट्र बदलेगा, समाज बदलेगा और हम सबका भविष्य उज्ज्वल होगा।


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