New Delhi News (04 November 2026): चुनाव आयोग (EC) ने मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया में बड़ा बदलाव करते हुए ऑनलाइन Form 6 से स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से संबंधित घोषणा को अलग कर दिया है। अब जिन राज्यों में SIR की प्रक्रिया चल रही है, वहां नए मतदाताओं को मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए ECINet पोर्टल पर Form 6 और SIR घोषणा के लिए अलग-अलग फॉर्म भरने होंगे। इससे पहले आयोग ने दोनों प्रक्रियाओं को एक ही फॉर्म में शामिल कर दिया था, जिसके तहत नए आवेदकों के लिए SIR से संबंधित घोषणा भरना अनिवार्य था। इस फैसले को लेकर चुनाव आयोग के भीतर ही असहमति सामने आई थी, जिसके बाद आयोग ने अपनी व्यवस्था में बदलाव किया है।
इस बदलाव के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या दो चुनाव आयुक्तों की आपत्ति के बाद चुनाव आयोग को अपना फैसला बदलना पड़ा है? दरअसल, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने Form 6 में SIR से संबंधित घोषणा शामिल करने के फैसले पर आपत्ति जताई थी। दोनों का मानना था कि निर्धारित फॉर्म में इस तरह का बदलाव करने के लिए कानूनी संशोधन जरूरी है। इसके बावजूद जुलाई में ऑनलाइन Form 6 में SIR घोषणा को शामिल कर दिया गया था। अब आयोग ने दोनों प्रक्रियाओं को अलग कर दिया है। यह पिछले छह हफ्तों में Form 6 को लेकर चुनाव आयोग का तीसरा फैसला बदलने का मामला है।
Form 6 में क्या बदलाव किया गया है?
अब तक ECINet पोर्टल पर नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए उपलब्ध Form 6 में सेक्शन J और K के बीच SIR से संबंधित घोषणा शामिल की गई थी। इसके तहत आवेदक को तीन विकल्पों में से किसी एक का चयन करना होता था। पहले विकल्प में यह बताना होता था कि क्या उसका नाम 2000 के शुरुआती वर्षों में हुई पिछली SIR के दौरान मतदाता सूची में शामिल था। दूसरे विकल्प में आवेदक को बताना होता था कि क्या उसके माता-पिता या दादा-दादी में से किसी का नाम उस समय की मतदाता सूची में दर्ज था। तीसरे विकल्प में यह घोषणा करनी होती थी कि न तो उसका और न ही उसके माता-पिता का नाम पिछली SIR वाली मतदाता सूची में शामिल था। इस घोषणा का जवाब दिए बिना आवेदक आगे की प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकता था। अब इसे Form 6 से अलग कर दिया गया है और SIR के लिए पोर्टल पर अलग फॉर्म उपलब्ध कराया गया है।
दो चुनाव आयुक्तों ने उठाए थे कानूनी सवाल
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 16 मई को Form 6 में SIR घोषणा शामिल करने के फैसले पर आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका कहना था कि मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित फॉर्म में बदलाव करने के लिए कानूनी संशोधन की आवश्यकता है। वहीं, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने 13 अगस्त को इस बदलाव को अनधिकृत और अवैध बताते हुए तत्काल हटाने की मांग की थी। इससे पहले 19 मई को भी उन्होंने इस मुद्दे पर अपनी सहमति जताई थी। दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद जुलाई में यह बदलाव लागू कर दिया गया था। द इंडियन एक्सप्रेस ने 12 जुलाई को पहली बार इस बदलाव की जानकारी दी थी, जबकि 23 सितंबर को प्रकाशित रिपोर्ट में दोनों आयुक्तों की आपत्तियों का खुलासा किया गया था। नियमों के अनुसार Form 6 में संशोधन करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है, ऐसे में आयोग के स्तर पर किए गए बदलाव को लेकर सवाल उठे थे।
सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे के बाद बदला फैसला
चुनाव आयोग ने 26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाबी हलफनामे में बताया कि उसकी इलेक्टोरल रोल (ER) डिवीजन ने 21 अक्टूबर को Form 6 और SIR घोषणा को अलग करने का फैसला किया था। आयोग के मुताबिक, शुरुआत में दोनों प्रक्रियाओं को एक ही फॉर्म में शामिल करने का उद्देश्य आवेदकों की सुविधा बढ़ाना था। अलग-अलग फॉर्म भरने पर आवेदकों को दो बार OTP और दो बार ई-सिग्नेचर की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता, जबकि एक ही फॉर्म में दोनों प्रक्रियाएं पूरी करने पर एक OTP और एक ई-सिग्नेचर से काम हो जाता था। हालांकि, आयोग ने माना कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर SIR घोषणा को Form 6 के भीतर प्रदर्शित करने से ऐसा लग सकता था कि निर्धारित फॉर्म में संशोधन कर दिया गया है। हलफनामे में यह भी स्पष्ट किया गया कि Form 6 में बदलाव करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। इसके बाद आयोग ने दोनों प्रक्रियाओं को अलग करने का निर्णय लिया।
पिछले पांच हफ्तों में कई फैसलों में बदलाव
Form 6 का मामला चुनाव आयोग के भीतर फैसलों को लेकर सामने आई असहमति का अकेला उदाहरण नहीं है। द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की जांच रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीने में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इन आपत्तियों में मतदाता सूची में नाम जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने के साथ-साथ चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर और प्रशासनिक कामकाज से जुड़े मुद्दे शामिल थे। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच हफ्तों में आयोग ने इन आपत्तियों से जुड़े कई मामलों में अपने फैसलों और प्रक्रियाओं में बदलाव किया है। इनमें आयोग की बैठकों से संबंधित नियम भी शामिल हैं। अब प्रत्येक बैठक से पहले एजेंडा साझा किया जाएगा और बैठक के बाद उसका विवरण जारी किया जाएगा। पहले दोनों आयुक्तों ने शिकायत की थी कि इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया जा रहा था। इसके अलावा अधिकारियों के विदेश दौरे के लिए अब आयोग की मंजूरी जरूरी होगी, जबकि पहले बिना आयोग की अनुमति के विदेश यात्राओं को लेकर आपत्ति जताई गई थी।
ECINet, IT सिस्टम और जमीनी अधिकारियों की शक्तियों में बदलाव
चुनाव आयोग ने नए IT सिस्टम और ECINet पोर्टल से जुड़े फैसलों में भी बदलाव किया है। महानिदेशक (IT) सीमा खन्ना के तहत विकसित किए जा रहे नए IT मॉड्यूल और पोर्टल को पहले अधिकारियों की समिति के सामने प्रस्तुत किया जाएगा और उसके बाद आयोग से मंजूरी ली जाएगी। वहीं, 14 अक्टूबर को जारी सर्कुलर के तहत ECINet की जांच के लिए एक समिति गठित की गई है। इसकी अध्यक्षता वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त करेंगे। समिति में अन्य वरिष्ठ अधिकारी और IIT बॉम्बे तथा IISc बेंगलुरु के दो स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल होंगे। इसके अलावा महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस चोकलिंगम की 24 सितंबर को सॉफ्टवेयर में बदलाव को लेकर की गई चार मांगों को भी लागू किया गया है। अब दस्तावेजों की कमी या तार्किक विसंगतियों के कारण नोटिस पाने वाले मतदाताओं की व्यक्तिगत सुनवाई अपवादस्वरूप होगी और बूथ लेवल अधिकारी (BLO) उनके घर जाकर दस्तावेज जुटाएंगे। मतदाता अब 13 निर्धारित श्रेणियों के अलावा अन्य दस्तावेज भी जमा कर सकेंगे। इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) तार्किक विसंगतियों से जुड़े मामलों पर खुद फैसला ले सकेंगे और ऐसे मामलों को जिला निर्वाचन अधिकारी के पास भेजना जरूरी नहीं होगा। साथ ही पिछली SIR की मतदाता सूची का अंश अपलोड करने की अनिवार्यता भी समाप्त कर दी गई है।
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