चिंतक ही नहीं, साहित्यकार भी थे पं. दीनदयाल उपाध्याय, साहित्यिक यात्रा में ‘सम्राट चंद्रगुप्त’ और ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ पर हुई चर्चा

टेन न्यूज नेटवर्क

New Delhi News (27 सितंबर 2026): पंडित दीनदयाल उपाध्याय केवल एक चिंतक और विचारक ही नहीं, बल्कि एक कुशल साहित्यकार भी थे। उनके साहित्यिक योगदान, लेखन शैली और भारतीय इतिहास एवं संस्कृति से जुड़े विचारों को समझने के उद्देश्य से अखिल भारतीय साहित्य परिषद, दिल्ली द्वारा एक विशेष साहित्यिक यात्रा का आयोजन किया गया। इस यात्रा के अंतर्गत साहित्यकारों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने द्वारका (दिल्ली) से दीनदयाल धाम, फरह तक की यात्रा की। इस दौरान पं. दीनदयाल उपाध्याय की रचनाओं ‘सम्राट चंद्रगुप्त’ और ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ पर विशेष परिचर्चा आयोजित की गई।

दीनदयाल धाम पहुंचने पर साहित्यिक यात्रा में शामिल सभी सदस्यों ने स्मृति भवन में पं. दीनदयाल उपाध्याय की अष्टधातु से निर्मित प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलित कर पुष्पांजलि अर्पित की। इसके पश्चात सभी ने स्मृति भवन में लगी चित्र प्रदर्शनी का अवलोकन किया और उनके जीवन से जुड़े विभिन्न प्रसंगों को जाना। प्रदर्शनी में उनके पैतृक घर से संबंधित चित्र भी प्रदर्शित किए गए थे।

यात्रा के दौरान प्रतिभागियों ने पं. दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय के विचारों को व्यवहार में उतारने के उद्देश्य से संचालित विभिन्न प्रकल्पों का भी भ्रमण किया। इनमें पर्यटक केंद्र, मांगलिक भवन, पुस्तकालय, राधाकृष्ण मंदिर, आरोग्य केंद्र, उद्यमिता प्रशिक्षण केंद्र, बिक्री केंद्र और सरस्वती विद्यालय प्रमुख रहे। इस अवसर पर धाम के निदेशक एवं सामाजिक कार्यकर्ता सोन पाल ने पं. दीनदयाल उपाध्याय के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंगों की जानकारी दी।

साहित्यिक यात्रा के दौरान प्रतिभागियों ने धाम में संचालित ग्रामीण विकास, महिला कौशल विकास एवं रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और जनसेवा से जुड़ी गतिविधियों के बारे में भी जानकारी प्राप्त की। पुस्तकालय और स्मृति स्थलों के माध्यम से उन्हें पं. दीनदयाल उपाध्याय के जीवन, विचारों और साहित्यिक योगदान को करीब से जानने का अवसर मिला।

‘सम्राट चंद्रगुप्त’ और ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ पर हुई विशेष परिचर्चा

इस साहित्यिक यात्रा का प्रमुख उद्देश्य पं. दीनदयाल उपाध्याय की साहित्यिक कृतियों का अध्ययन और उनके लेखन के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करना था। इसी क्रम में उनकी रचनाओं ‘सम्राट चंद्रगुप्त’ और ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ के विषय चयन, भाषा-शैली और उनमें निहित विचारों पर विशेष परिचर्चा आयोजित की गई। इसमें मनीष कुमार, प्रो. पूनम राठी और छात्रा चांदनी ने अपने विचार साझा किए।

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के अखिल भारतीय संगठन मंत्री मनोज कुमार ने परिचर्चा के दौरान बताया कि पं. दीनदयाल उपाध्याय ने बाल पाठकों को ध्यान में रखते हुए सरल भाषा में ‘सम्राट चंद्रगुप्त’ की रचना की, जबकि युवाओं के लिए ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ उपन्यास लिखा। इन दोनों कृतियों के माध्यम से उन्होंने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक चरित्रों के जरिए अपने विचारों एवं संदेशों को सहज भाषा में समाज तक पहुंचाने का प्रयास किया।

उन्होंने कहा कि इन रचनाओं के अध्ययन से भारतीय इतिहास, संस्कृति और दर्शन के विभिन्न पहलुओं को समझने का अवसर मिलता है। परिचर्चा में दोनों पुस्तकों की विषयवस्तु, साहित्यिक विशेषताओं और उनमें अभिव्यक्त विचारों पर विस्तार से विमर्श किया गया।

मनोज कुमार ने सभी प्रतिभागियों से पं. दीनदयाल उपाध्याय के जीवन के पत्रकारिता, लेखन और साहित्यिक पक्ष का गहन अध्ययन करने का आह्वान किया। साथ ही उन्होंने इस साहित्यिक यात्रा से जुड़े अनुभवों और संस्मरणों को लिखने की भी अपील की, ताकि उनके साहित्यिक योगदान को व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचाया जा सके।

इस अवसर पर ‘साहित्य परिक्रमा’ की प्रबंध संपादक डॉ. रजनी मान, दिल्ली भाजपा ओबीसी मोर्चा के उपाध्यक्ष अमित यादव, शोधार्थी मनीष कुमार, प्रधानाचार्य अमित, व्याख्याता जयबीर सिंह तथा पत्रकारिता की छात्राएं वंशिका, कशिश, सौम्या और चांदनी सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।।


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