“भारत की न्यायपालिका में महिलाओं का यौन उत्पीड़न काला रहस्य” : इंदिरा जयसिंह
टेन न्यूज़ नेटवर्क
New Delhi News (01 September 2026): सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने न्यायपालिका में महिला जजों के कथित यौन उत्पीड़न को लेकर गंभीर चिंता जताई है। 29वें डीएस बोरकर मेमोरियल लेक्चर में ‘माय विजन ऑफ इंडिया: 2047 एडी’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने दावा किया कि उन्हें कई महिला जजों से पुरुष न्यायाधीशों द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायतें मिली हैं। जयसिंह ने इसे भारतीय न्यायपालिका का ‘डर्टी सीक्रेट’ बताते हुए कहा कि इस मुद्दे पर खुलकर बात करने से लोग बचते हैं। उनके अनुसार न्यायिक व्यवस्था में मौजूद पदानुक्रम और शक्ति का असंतुलन ऐसी घटनाओं के लिए एक बड़ी वजह बन सकता है।
इंदिरा जयसिंह ने अपने अनुभव का जिक्र करते हुए एक महिला जज से जुड़ी घटना भी सुनाई। उनके मुताबिक, उन्होंने ऐसी महिला जज का प्रतिनिधित्व किया था जिसने कथित तौर पर एक पुरुष जज की अनुचित मांग का विरोध किया। जयसिंह के अनुसार, संबंधित महिला जज ने उन्हें बताया कि उच्च न्यायपालिका में कुछ ऐसी परंपराएं भी मौजूद हैं, जिनमें जिला अदालतों की महिला जजों से वरिष्ठ पुरुष न्यायाधीशों के प्रति अत्यधिक औपचारिक व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। उन्होंने दावा किया कि इसी महिला जज ने यौन उत्पीड़न की शिकायत की थी और एक कथित अनुचित मांग का विरोध करने के बाद उसकी नौकरी चली गई। इन दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि की जानकारी सामने नहीं आई है।
जयसिंह ने कहा कि न्यायपालिका में मौजूद कथित ‘हायरार्की’ का असर विशेष रूप से महिला जजों पर पड़ सकता है। उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर के विचारों से भी सहमति जताई, जिन्होंने अपने संबोधन में न्याय व्यवस्था में कथित पदानुक्रम और महिला जजों को झेलने वाले यौन संकेतों तथा उत्पीड़न की घटनाओं पर चिंता जताई थी। जयसिंह ने उम्मीद जताई कि 2047 तक न्यायपालिका में ऐसी शर्मनाक और भेदभावपूर्ण परिस्थितियों में बदलाव आएगा तथा महिला न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षित और सम्मानजनक कार्य वातावरण मिल सकेगा।
अपने संबोधन में इंदिरा जयसिंह ने न्यायपालिका के कामकाज और आम लोगों से जुड़े मुकदमों को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि न्यायालयों का सीमित समय बड़े कॉरपोरेट और आर्थिक रूप से प्रभावशाली पक्षों से जुड़े मामलों में अधिक खर्च होने की चिंता भी जताई। उनके मुताबिक आम नागरिकों को समय पर न्याय उपलब्ध कराना न्याय व्यवस्था की प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने न्यायपालिका में देरी, पदानुक्रम और संस्थागत जवाबदेही जैसे मुद्दों पर व्यापक सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया।
जयसिंह ने अपने भाषण के दौरान संविधान को लेकर भी अपनी चिंता और उम्मीद व्यक्त की। उन्होंने कहा कि संविधान ही उन्हें यह भरोसा देता है कि देश में संस्थागत बदलावों और सरकार के फैसलों को चुनौती देने का लोकतांत्रिक रास्ता बना रहेगा। उन्होंने परिसीमन को महिला आरक्षण से जोड़ने, ‘एक देश-एक चुनाव’ और राजनीतिक दलों के बागी गुटों को चुनाव चिह्न आवंटित किए जाने जैसे मुद्दों पर भी अपनी राय रखी। हालांकि उनके भाषण का प्रमुख केंद्र न्यायपालिका में महिलाओं की सुरक्षा और कथित यौन उत्पीड़न रहा, जिस पर उनके बयानों ने न्यायिक संस्थानों में कार्यस्थल सुरक्षा, शिकायत निवारण और जवाबदेही की व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
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