‘दिमागी नक्सल’ मानसिकता मिटाना राष्ट्र निर्माण के लिए जरूरी

टेन न्यूज नेटवर्क

New Delhi News (15 अगस्त 2026): आज 15 अगस्त 2026 को भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “दिमागी नक्सल” जैसी मानसिकता के प्रति देश को आगाह किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हथियारबंद नक्सलवाद कमजोर पड़ रहा है, लेकिन युवाओं को भटकाने वाली विनाशकारी मानसिकता देश के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।

प्रधानमंत्री के इस विचार को हाल के जंतर-मंतर पर हुए युवा आंदोलनों और प्रदर्शनों के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। इन प्रदर्शनों में प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं और पेपर लीक जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए। प्रदर्शनकारियों की ओर से तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी सामने आई।

हालांकि, लोकतंत्र में अपनी जायज मांगों को उठाना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन किसी भी आंदोलन की मर्यादा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। हिंसा, अराजकता, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना अथवा पुलिस और सुरक्षा बलों के साथ दुर्व्यवहार किसी लोकतांत्रिक आंदोलन का हिस्सा नहीं होना चाहिए।

युवा शक्ति को सही दिशा देने की जरूरत

आज के भारत में केवल डिग्री रोजगार की गारंटी नहीं है। Education, Knowledge, Skill Development, Discipline, Work Ethics, Communication Skills और Will to Work जैसे गुण भी व्यक्ति की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

चाहे निजी क्षेत्र हो अथवा सरकारी क्षेत्र, संस्थाएं केवल शैक्षणिक योग्यता ही नहीं, बल्कि व्यक्ति की जिम्मेदारी, व्यवहार, अनुशासन, कार्यक्षमता और पेशेवर आचरण को भी महत्व देती हैं।

ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि युवाओं को केवल नौकरी मांगने वाला नहीं, बल्कि रोजगार-योग्य, आत्मनिर्भर और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान देने वाला नागरिक बनाया जाए।

‘दिमागी नक्सल’ को समझने की जरूरत

“दिमागी नक्सल” जैसे शब्द को किसी समुदाय, विचारधारा से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति अथवा हर प्रदर्शनकारी के लिए इस्तेमाल करना उचित नहीं होगा। इसे विनाशकारी, हिंसक और अराजक मानसिकता के रूपक के तौर पर समझना अधिक उचित है।

लोकतंत्र में असहमति के लिए स्थान है। सरकारों से सवाल पूछना, नीतियों की आलोचना करना और अपनी मांगों के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन जब असहमति हिंसा, तोड़फोड़ और अराजकता का रूप ले लेती है, तब वह लोकतांत्रिक संवाद की भावना को कमजोर करती है।

इस मानसिकता का मुकाबला केवल कठोरता से नहीं, बल्कि शिक्षा, संवाद, कौशल विकास, रोजगार के अवसर, संवैधानिक मूल्यों और सकारात्मक राष्ट्रवाद के माध्यम से किया जा सकता है।

विचारों से जीतना होगा

भारत आज विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में देश की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। यदि युवा ऊर्जा को शिक्षा, शोध, उद्यमिता, तकनीक, रोजगार और सामाजिक सेवा की दिशा मिले तो यही शक्ति भारत के विकास की सबसे बड़ी आधारशिला बन सकती है।

विकसित भारत के निर्माण के लिए हमें हथियारों से नहीं, विचारों से जीतना होगा। नकारात्मकता और विनाशकारी सोच के स्थान पर ज्ञान, कौशल, परिश्रम, अनुशासन और राष्ट्र निर्माण की भावना को मजबूत करना होगा।

स्वतंत्रता दिवस हमें केवल स्वतंत्रता प्राप्त करने का इतिहास याद नहीं दिलाता, बल्कि यह भी स्मरण कराता है कि स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। राष्ट्र निर्माण की इस यात्रा में सरकार के साथ समाज, शिक्षण संस्थानों, अभिभावकों और सबसे बढ़कर युवाओं की भूमिका निर्णायक है।

गजानन माली
स्वतंत्रता दिवस विशेष विचार लेख


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