31 साल पुरानी परंपरा का अंत: अब नहीं लगेगा दिल्ली पुस्तक मेला

टेन न्यूज़ नेटवर्क

New Delhi News (14 July 2026): राजधानी दिल्ली के किताब प्रेमियों और साहित्य जगत के लिए एक बड़ी और निराशाजनक खबर सामने आई है। करीब 31 वर्षों से आयोजित होने वाला प्रतिष्ठित दिल्ली पुस्तक मेला अब हमेशा के लिए बंद कर दिया गया है। प्रगति मैदान, जिसे अब भारत मंडपम के नाम से जाना जाता है, में हर साल आयोजित होने वाला यह मेला अब इतिहास का हिस्सा बन जाएगा। वर्ष 1995 में भारतीय व्यापार संवर्धन संगठन (आईटीपीओ) और भारतीय प्रकाशक संघ (एफआईपी) के संयुक्त तत्वावधान में शुरू हुई इस परंपरा का अंत दोनों संस्थाओं के बीच लंबे समय से चल रहे मतभेदों के कारण हो गया है।

एफआईपी के अध्यक्ष रमेश मित्तल ने बताया कि संगठन ने काफी पहले ही आईटीपीओ को लिखित रूप से सूचित कर दिया था कि वह अब दिल्ली पुस्तक मेले का सह-आयोजक नहीं रहेगा। उनका आरोप है कि आईटीपीओ की ओर से पर्याप्त सहयोग नहीं मिला, स्टॉल किराए में बार-बार बदलाव किए गए, मेले के प्रचार-प्रसार पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया और अन्य प्रकाशक संगठनों को जोड़ने के प्रयास भी नहीं हुए। इन कारणों से दोनों संस्थाओं के बीच विवाद लगातार बढ़ता गया और आखिरकार मेले को बंद करने की नौबत आ गई।

वहीं, आईटीपीओ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भी पुष्टि की है कि अब दिल्ली पुस्तक मेले का आयोजन नहीं किया जाएगा। हालांकि उन्होंने एफआईपी के साथ विवाद पर कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन कहा कि राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एनबीटी) के सहयोग से आयोजित होने वाला नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला अब हर वर्ष आयोजित किया जा रहा है। ऐसे में अलग से दिल्ली पुस्तक मेले की आवश्यकता महसूस नहीं की जा रही है और इसी कारण इस आयोजन को आगे जारी रखने का निर्णय नहीं लिया गया।

दिल्ली पुस्तक मेले के बंद होने के पीछे कई व्यावहारिक कारण भी सामने आए हैं। वर्ष 2013 से विश्व पुस्तक मेला हर साल आयोजित होने लगा, जिससे दिल्ली पुस्तक मेले में प्रकाशकों की भागीदारी लगातार घटने लगी। विश्व पुस्तक मेले में भारतीय भाषाओं के प्रकाशकों को स्टॉल किराए में 33 से 50 प्रतिशत तक की छूट मिलती है, जबकि दिल्ली पुस्तक मेले में ऐसी कोई सुविधा नहीं थी। कोरोना महामारी के बाद आर्थिक चुनौतियों के कारण प्रकाशकों की संख्या और कम हुई तथा मेले की अवधि भी नौ दिनों से घटाकर केवल पांच दिन रह गई। इसके अलावा प्रचार-प्रसार की कमी से पाठकों की संख्या भी लगातार घटती चली गई।

दिल्ली पुस्तक मेले का बंद होना राजधानी की सांस्कृतिक विरासत के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। यह मेला वर्षों तक लेखकों, प्रकाशकों, विद्यार्थियों और पुस्तक प्रेमियों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच रहा, जहां नई किताबों का विमोचन, साहित्यिक चर्चाएं और सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित होती थीं। अब इस परंपरा के समाप्त होने से साहित्य प्रेमियों में निराशा है। हालांकि विश्व पुस्तक मेला आगे भी हर वर्ष आयोजित होता रहेगा, लेकिन दिल्ली पुस्तक मेले की अपनी अलग पहचान और विरासत थी, जिसका अध्याय अब हमेशा के लिए समाप्त हो गया है।


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