क्या केवल शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से सुधर जाएगी शिक्षा एवं परीक्षा व्यवस्था?

प्रो. पी. बी. शर्मा

टेन न्यूज नेटवर्क

देश में जब भी कोई बड़ा पेपर लीक, भर्ती घोटाला या परीक्षा संबंधी अनियमितता सामने आती है, तब सबसे पहले शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग उठती है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है, क्योंकि मंत्री नैतिक रूप से अपने विभाग के लिए उत्तरदायी होते हैं। लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या केवल एक इस्तीफा शिक्षा व्यवस्था की गहरी समस्याओं का समाधान कर सकता है?

मेरा स्पष्ट मत है कि यदि किसी मंत्री की नैतिक जिम्मेदारी तय होती है तो उन्हें इस्तीफा देना चाहिए या सरकार को उनसे इस्तीफा लेना चाहिए। जवाबदेही लोकतंत्र की आधारशिला है। किंतु हमें यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि केवल चेहरे बदल देने से व्यवस्था बदल जाएगी।

आज देश की शिक्षा व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती “शिक्षा माफिया” का बढ़ता प्रभाव है। प्रवेश परीक्षाओं से लेकर भर्ती प्रक्रियाओं तक ऐसे संगठित नेटवर्क सक्रिय हैं जो प्रतिभा और परिश्रम के स्थान पर धन, प्रभाव और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं। यह केवल किसी एक मंत्री या सरकार की समस्या नहीं, बल्कि संस्थागत कमजोरी का परिणाम है।

यदि वास्तव में पेपर लीक रोकने हैं और शिक्षा में विश्वास बहाल करना है, तो हमें तीन मूलभूत सिद्धांतों को हर नियुक्ति और निर्णय प्रक्रिया का आधार बनाना होगा—

पहला, मेरिट (Merit): हर पद पर चयन केवल योग्यता और प्रदर्शन के आधार पर हो।

दूसरा, क्षमता (Competency): शिक्षा संस्थानों और परीक्षा एजेंसियों का नेतृत्व ऐसे लोगों के हाथ में हो जिनके पास प्रशासनिक दक्षता, तकनीकी समझ और संकट प्रबंधन की क्षमता हो।

तीसरा , ईमानदारी (Integrity): व्यक्तिगत और संस्थागत दोनों स्तरों पर नैतिकता से कोई समझौता न किया जाए। पारदर्शिता और जवाबदेही को अनिवार्य बनाया जाए।

जब तक इन तीनों मूल्यों को नियुक्तियों और प्रशासनिक संस्कृति में सर्वोच्च स्थान नहीं मिलेगा, तब तक कोई भी नया मंत्री आए या पुराना जाए, शिक्षा व्यवस्था बार-बार उन्हीं समस्याओं का सामना करती रहेगी। पेपर लीक की घटनाएं रुकने के बजाय नए रूपों में सामने आती रहेंगी और लाखों मेहनती छात्रों का भविष्य दांव पर लगता रहेगा।

समय की मांग केवल व्यक्तियों को बदलने की नहीं, बल्कि व्यवस्था को बदलने की है। शिक्षा राष्ट्र निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है और इसे किसी भी प्रकार के माफिया तंत्र से मुक्त कराना सरकार, संस्थाओं और समाज—सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

जवाबदेही आवश्यक है, लेकिन स्थायी सुधार केवल मेरिट, क्षमता और ईमानदारी पर आधारित संस्थागत व्यवस्था से ही संभव है।

(लेखक कुलपति, एमिटी यूनिवर्सिटी, गुरुग्राम, भारत के प्रख्यात शिक्षाविद्, DTU के संस्थापक कुलपति, IIT Delhi के पूर्व प्राध्यापक एवं भारतीय विश्वविद्यालय संघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। लेखक के यह निजी विचार है )

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