शिक्षा में बदलाव की नई तस्वीर: राष्ट्रीय शिक्षा नीति से डिजिटल लर्निंग तक, विकसित भारत की नींव रख रहे सुधार

प्रो. मुरलीमनोहर पाठक

New Delhi News (22/07/2026): शिक्षा किसी भी राष्ट्र के विकास की आधारशिला होती है। आर्थिक प्रगति, वैज्ञानिक अनुसंधान, सामाजिक समरसता और वैश्विक नेतृत्व जैसे सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों की सफलता एक मजबूत और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करती है। इसी सोच को केंद्र में रखते हुए भारत में शिक्षा क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों के दौरान व्यापक नीतिगत सुधार किए गए हैं। श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने कहा कि शिक्षा को राष्ट्रीय विकास की केंद्रीय धुरी बनाकर सरकार ने नीति, तकनीक, कौशल विकास और अनुसंधान के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण पहल की हैं, जिनका उद्देश्य भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में मजबूत आधार तैयार करना है।

प्रो. पाठक ने कहा कि, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी)-2020 भारतीय शिक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ा परिवर्तन लेकर आई है। लगभग तीन दशक बाद लागू हुई इस नीति ने पारंपरिक परीक्षा-केंद्रित शिक्षा प्रणाली से आगे बढ़कर विद्यार्थियों के समग्र विकास, कौशल, नवाचार, अनुसंधान और व्यक्तित्व निर्माण को प्राथमिकता दी है। नई नीति के तहत 5+3+3+4 शैक्षिक संरचना लागू की गई है, जिससे प्रारंभिक स्तर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बाल विकास को विशेष महत्व मिला है।

उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष मातृभाषा और भारतीय भाषाओं में शिक्षा को बढ़ावा देना है। इससे विद्यार्थियों की समझ, अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को मजबूती मिल रही है। साथ ही विषय चयन में लचीलापन और बहुविषयक शिक्षा की व्यवस्था ने विद्यार्थियों को अपनी रुचि और क्षमता के अनुरूप अध्ययन करने का अवसर प्रदान किया है।

प्रो. पाठक के अनुसार डिजिटल युग की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा को तकनीक से जोड़ने की दिशा में भी उल्लेखनीय कार्य हुए हैं। पीएम ई-विद्या, दीक्षा, स्वयं और स्वयं प्रभा जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से देश के दूरदराज क्षेत्रों तक गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री पहुंचाई जा रही है। उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान इन डिजिटल माध्यमों ने लाखों विद्यार्थियों की पढ़ाई को निर्बाध बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विद्यालयी शिक्षा में गुणवत्ता सुधार की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि निपुण भारत मिशन के माध्यम से बच्चों में प्रारंभिक स्तर पर बुनियादी साक्षरता और गणनात्मक दक्षता विकसित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। वहीं पीएम श्री विद्यालय योजना के तहत चयनित स्कूलों को स्मार्ट क्लास, आधुनिक प्रयोगशालाओं, डिजिटल संसाधनों और नवाचार आधारित शिक्षण व्यवस्था से सुसज्जित किया जा रहा है, ताकि वे उत्कृष्ट शिक्षण संस्थानों के रूप में विकसित हो सकें।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हुए सुधारों का उल्लेख करते हुए प्रो. पाठक ने कहा कि अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट (ABC), मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम तथा बहुविषयक विश्वविद्यालयों की अवधारणा ने भारतीय उच्च शिक्षा को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने की दिशा में नए अवसर उपलब्ध कराए हैं। उन्होंने कहा कि अनुसंधान, नवाचार और स्टार्टअप संस्कृति को प्रोत्साहित कर युवाओं को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था का सक्रिय भागीदार बनाया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय कौशल आधारित शिक्षा का है। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना सहित विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाया गया है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में व्यावसायिक शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण को बढ़ावा देकर युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। उनका मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि ऐसे सक्षम और नवाचारी नागरिक तैयार करना है जो वैश्विक स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर सकें।

समावेशी शिक्षा पर बल देते हुए प्रो. पाठक ने कहा कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, आवासीय सुविधाओं और शैक्षिक सहायता योजनाओं का विस्तार किया गया है। इसके साथ ही बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन देने और सभी वर्गों को समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए भी विभिन्न योजनाएं प्रभावी रूप से संचालित की जा रही हैं।

अपने संदेश के अंत में प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में किए गए सुधारों ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा और नई ऊर्जा प्रदान की है। उन्होंने कहा कि ज्ञान, कौशल, तकनीक, अनुसंधान और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के समन्वय पर आधारित शिक्षा प्रणाली विकसित भारत की मजबूत आधारशिला बन सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी नीति की सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन, राज्यों के सहयोग, शिक्षकों की सक्रिय भागीदारी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण के निरंतर मूल्यांकन पर निर्भर करती है।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यदि इन सुधारों को प्रभावी ढंग से लागू किया गया तो भारत न केवल शिक्षा के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को प्राप्त करेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर एक ज्ञान-आधारित और विकसित राष्ट्र के रूप में अपनी मजबूत पहचान भी स्थापित करेगा।


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