New Delhi News (16 मई 2026): “राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में सुशासन” की अवधारणा, उसकी चुनौतियों तथा संभावनाओं पर व्यापक विमर्श को केंद्र में रखते हुए टेन न्यूज नेटवर्क (Ten News Network) द्वारा नई दिल्ली स्थित कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ़ इंडिया (Constitution Club of India) में एक विचारोत्तेजक एवं बहुआयामी संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस गरिमामयी अवसर पर राजधानी के विभिन्न क्षेत्रों से पधारे आरडब्ल्यूए प्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पर्यावरणविदों, शिक्षाविदों, विधिवेत्ताओं, प्रशासनिक अधिकारियों तथा जनप्रतिनिधियों ने सहभागिता कर दिल्ली के समक्ष उपस्थित विविध समस्याओं, चुनौतियों एवं उनके व्यावहारिक समाधानों पर गंभीर मंथन किया।
कार्यक्रम में प्रदूषण, अपराध नियंत्रण, लोक प्रशासन, एनडीएमसी एवं एमसीडी में सुशासन, नागरिक सहभागिता तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में आरडब्ल्यूए की भूमिका जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों पर सारगर्भित चर्चा की गई। संवाद के दौरान वक्ताओं ने न केवल समस्याओं का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया, अपितु सुशासन की स्थापना हेतु दूरदर्शी, व्यवहारिक एवं जनकल्याणकारी उपायों का भी उल्लेख किया, जिससे यह कार्यक्रम दिल्ली के भविष्य के लिए एक सार्थक वैचारिक पहल सिद्ध हुआ।
विशिष्ट वक्ता के रूप में दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व जज जस्टिस एम.एल. मेहता ने गुड गवर्नेंस पर बोलते हुए ने कहा कि मैं जितना समझा हूं, एक आम आदमी जो दिल्ली का नागरिक है, दिल्ली एक डायनेमिक शहर है, वाइब्रेंट शहर है, हमारे देश की राजधानी है। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग व संस्थान यहां हैं। तो जब हम दिल्ली में गुड गवर्नेंस की बात करते हैं, तो हम देश के अलग-अलग हिस्सों की गुड गवर्नेंस की बात करते हैं।
समस्याओं पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि समस्याएं कभी खत्म नहीं होने वाली हैं और यही किसी समाज के विकास की पहल है। यह बात सही है कि भारत में विकसित होने की ऊर्जा है और जैसा कि हमारे प्रधानमंत्री Narendra Modi का सपना है, लेकिन यह केवल सरकार के लिए नहीं है या सरकार के किसी एक विभाग, एमसीडी या किसी अन्य विभाग के लिए नहीं है। सरकार के सभी विभागों को एक साथ मिलकर काम करना होगा।
उन्होंने अपने बारे में बात करते हुए बताया कि जब वह रिटायर हुए, तो उन्हें पता नहीं था कि सिस्टम में काम कैसे होता है, क्योंकि वह उसी सिस्टम का हिस्सा थे। बतौर जज जब वह अपने सचिव से कहते थे कि यह काम करना है, तो उनका काम सुचारू रूप से हो जाता था। उन्हें कभी भी रिपेयर का काम, बिजली का काम या अन्य सुविधाओं की जरूरत महसूस नहीं हुई, क्योंकि वह सरकारी मकान और सरकारी सुविधाओं में थे। अब रिटायरमेंट के बाद उन्हें असल स्थिति का पता चल रहा है।
उदाहरण पेश करते हुए उन्होंने कहा कि जैसे अगर हम अतिक्रमण की बात करें, तो अतिक्रमण हटाया जाता है, लेकिन हटाने के तुरंत बाद दो दिन में फिर वही स्थिति हो जाती है। उन्होंने रेहड़ी-पटरी वालों का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरीके से रेहड़ी-पटरी वालों को पता चल जाता है कि एमसीडी आने वाली है, एमसीडी के अधिकारी आने वाले हैं, तो वे अतिक्रमण दो दिनों के लिए हटा देते हैं, लेकिन ठीक दो दिन बाद फिर वहीं पहुंच जाते हैं। 15 दिन बाद फिर हट जाते हैं और अधिकारियों के जाने के बाद दोबारा वहीं आ जाते हैं। उन्होंने बताया कि सरकार के अधिकारी व विभागीय अधिकारी कोई न कोई बहाना ढूंढते रहते हैं कि जनता को कैसे परेशान किया जाए और यह हमारी कार्य संस्कृति बन गई है।
तो गुड गवर्नेंस तभी हो सकेगा जब सरकार के सभी विभाग समाज कल्याण और वेलफेयर ऑफ सोसाइटी के लिए काम करेंगे। सभी विभागों की अलग-अलग भूमिका है, सभी को जिम्मेदारियां दी गई हैं कि वे अपना-अपना काम करें, लेकिन एक कल्चर बन गया है, हरासमेंट का कल्चर और इसे बदलना होगा, तभी हम सुशासन की तरफ बढ़ सकेंगे।
अधिकारियों को अपनी मानसिकता बदलनी होगी और उन्हें सोचना होगा कि वे लोगों की मदद कैसे कर सकते हैं। ईश्वर ने उन्हें वह पोजीशन दी है ताकि वे समाज की मदद कर सकें। सभी विभागों को अपनी जिम्मेदारियों को समझना होगा और एकजुटता व कर्तव्यनिष्ठा के साथ कार्य करना होगा, तभी हम सुशासन की तरफ बढ़ सकेंगे। जस्टिस एमएल मेहता ने आगे कहा कि इसके लिए हम पब्लिक भी जिम्मेदार हैं। गुड गवर्नेंस केवल सरकार का काम नहीं है, बल्कि यह आम लोगों यानी जनता का भी काम है। पब्लिक के रूप में हमारा भी उसमें रोल है।
उन्होंने कहा कि हमारा एक कल्चर बन गया है, जो ईगो और डिफरेंस को बढ़ावा देता है। हम छोटे-छोटे मतभेदों में उलझ जाते हैं। जैसे हमारा किसी से मतभेद होता है, तो हम उसे डिसएग्रीमेंट बना देते हैं, फिर वह डिस्प्यूट बन जाता है और धीरे-धीरे विवाद बढ़ते-बढ़ते पुलिस और कोर्ट तक पहुंच जाता है। यह हमारा कल्चर बन गया है। कुल मिलाकर जस्टिस एमएल मेहता ने अपने वक्तव्य में कहा कि सुशासन केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह समाज, सरकार, सरकारी अधिकारी और विभाग — सभी की एकजुट जिम्मेदारी है। तभी हम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में सुशासन की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे।
उल्लेखनीय है कि इस सकारात्मक एवं अत्यंत सारगर्भित विमर्श में दिल्ली नगर निगम की डिप्टी मेयर मोनिका पंत, दिल्ली नगर निगम स्टैंडिंग कमिटी की चेयरमैन सत्या शर्मा, दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व जज न्यायमूर्ति एम. एल. मेहता, स्वच्छ भारत मिशन के ब्रांड एंबेसडर एवं स्वच्छ भारत मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवोम मिश्रा, सीबीआई के पूर्व संयुक्त निदेशक एवं उपराज्यपाल दिल्ली के पूर्व ओएसडी शांतनु सेन, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ आदिश सी अग्रवाला, वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ ए.पी. सिंह, एसपी चेतना के अध्यक्ष अनिल सूद, एमिटी यूनिवर्सिटी की Addl Pro VC तनु जिंदल, सेव आवर सिटी से राजीव काकरिया, पूर्वी दिल्ली आरडब्ल्यूए फेडरेशन से बी. एस. वोहरा, HHEWA के अध्यक्ष सीपी शर्मा, संयुक्त आरडब्ल्यूए फोरम के महासचिव पंकज अग्रवाल, CORWA के एन पी सिंह, समाजसेवी नेहा पुरी सहित अनेक विशिष्ट विद्वान, समाजसेवी, विधिवेत्ता, शिक्षाविद् एवं प्रबुद्ध अतिथिगण उपस्थित रहे।
कार्यक्रम की विशेष महत्ता इस तथ्य से भी परिलक्षित हुई कि इसमें राजधानी दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों से पधारे सैकड़ों जागरूक एवं चिंतनशील नागरिकों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता कर संवाद को और अधिक सारगर्भित, जनोन्मुख एवं उद्देश्यपूर्ण बनाया। चर्चा के दौरान उपस्थित वक्ताओं एवं नागरिकों ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के समक्ष विद्यमान समस्याओं एवं चुनौतियों पर गंभीर विमर्श करते हुए सुशासन, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व एवं जनसहभागिता आधारित समाधान की दिशा में अपने बहुमूल्य विचार एवं सुझाव प्रस्तुत किए। यह संवाद निःसंदेह दिल्ली के सर्वांगीण, संतुलित एवं जनकल्याणकारी विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण वैचारिक पहल सिद्ध हुआ।।
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