कैसे कोमा में पहुंचे हरीश राणा, जिन्हें इच्छा मृत्यु के बाद आज दी गई अंतिम विदाई
टेन न्यूज़ नेटवर्क
New Delhi News (25 March 2026): पंजाब यूनिवर्सिटी में बीटेक की पढ़ाई कर रहे हरीश राणा की जिंदगी साल 2013 में एक दर्दनाक हादसे के बाद पूरी तरह बदल गई। वह अपने हॉस्टल की चौथी मंजिल की बालकनी से अचानक नीचे गिर गए थे, जिससे उनके सिर पर गंभीर चोट आई। इस दुर्घटना ने उनके मस्तिष्क को गहरी क्षति पहुंचाई और वह कभी सामान्य अवस्था में वापस नहीं आ सके। हादसे के बाद से ही उनका जीवन अस्पतालों और बिस्तर तक सिमट कर रह गया। यह घटना एक होनहार छात्र के सपनों को अधूरा छोड़ गई। परिवार के लिए यह हादसा जीवनभर का दुख बन गया।
कोमा और ‘परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट’ की स्थिति
डॉक्टरों के अनुसार हरीश राणा ‘परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (PVS) में चले गए थे, जिसमें व्यक्ति की चेतना लगभग समाप्त हो जाती है। वह न तो किसी को पहचान सकते थे और न ही किसी तरह की प्रतिक्रिया दे पाते थे। पिछले 13 वर्षों तक वह इसी हालत में गाजियाबाद स्थित अपने घर में बिस्तर पर पड़े रहे। उन्हें नली के जरिए कृत्रिम पोषण दिया जाता था और जरूरत पड़ने पर ऑक्सीजन सपोर्ट भी दिया जाता था। यह स्थिति परिवार के लिए मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक रूप से बेहद कठिन थी। हर दिन उम्मीद और निराशा के बीच गुजरता रहा।
परिवार की लंबी लड़ाई और सुप्रीम कोर्ट का रुख
हरीश की हालत में कोई सुधार न होने पर उनके परिजनों ने आखिरकार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। परिवार ने मानवीय आधार पर उन्हें ‘इच्छामृत्यु’ की अनुमति देने की मांग की। यह मामला केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि कानून, नैतिकता और चिकित्सा के जटिल सवालों से जुड़ा हुआ था। अदालत ने सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया और मेडिकल रिपोर्ट्स का परीक्षण किया। यह मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया। आखिरकार अदालत ने इस संवेदनशील मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति और नई प्रक्रिया
11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के लिए ‘पैसिव यूथेनेशिया’ यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी। यह फैसला मानवीय गरिमा और पीड़ा से मुक्ति के अधिकार को ध्यान में रखते हुए लिया गया। इसके बाद 14 मार्च को उन्हें दिल्ली एम्स के डॉ. बी.आर. अंबेडकर कैंसर अस्पताल की पैलिएटिव केयर यूनिट में भर्ती कराया गया। यहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने उनकी अंतिम देखभाल की जिम्मेदारी संभाली। यह प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी निगरानी और मेडिकल प्रोटोकॉल के तहत की गई। देश में इस तरह का यह पहला मामला माना गया।
डॉक्टरों की निगरानी में अंतिम चरण की प्रक्रिया
एम्स में डॉक्टरों की टीम ने एक विशेष योजना के तहत धीरे-धीरे हरीश को दिया जा रहा कृत्रिम पोषण बंद कर दिया। इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि उन्हें किसी तरह का कष्ट न हो और उनकी मृत्यु गरिमा के साथ हो। डॉक्टरों ने लगातार उनकी स्थिति की निगरानी की और दर्द को कम करने के लिए आवश्यक उपाय किए। इस दौरान न्यूरोसर्जरी, एनेस्थीसिया और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की टीम शामिल रही। यह पूरा मेडिकल प्रबंधन एक संवेदनशील और संतुलित दृष्टिकोण के साथ किया गया। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि अंतिम समय में हरीश को शांति मिले।
13 साल के संघर्ष का अंत और निधन
करीब 10 दिन तक चलने वाली इस प्रक्रिया के बाद हरीश राणा ने 25 मार्च को शाम 4 बजकर 10 मिनट पर अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ ही 13 साल से चल रहा संघर्ष समाप्त हो गया। परिवार के लिए यह एक भावुक और भारी क्षण था, जिसमें दुख के साथ-साथ एक तरह की राहत भी थी। हरीश की कहानी ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों की भी कहानी है जो इसी तरह की परिस्थितियों से गुजरते हैं। उनके निधन के बाद हर किसी की आंखें नम थीं।।
ग्रीन पार्क श्मशान घाट में अंतिम संस्कार
ग्रीन पार्क क्रीमेशन ग्राउंड में हरीश राणा का अंतिम संस्कार पूरे विधि-विधान के साथ किया गया। उनके भाई और बहन ने उन्हें मुखाग्नि दी, जबकि परिवार और रिश्तेदार गमगीन माहौल में मौजूद रहे। माता-पिता की आंखों में बेटे को खोने का दर्द साफ नजर आ रहा था। इस दौरान समाज के कई लोग और परिचित भी उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे। माहौल पूरी तरह भावुक और शांत था। हर कोई इस लंबे संघर्ष के अंत को महसूस कर रहा था।
अंगदान से दी नई जिंदगी, बनी मिसाल
हरीश राणा के परिवार ने उनके निधन के बाद एक प्रेरणादायक निर्णय लेते हुए अंगदान की सहमति दी। उनके कॉर्निया और हार्ट वाल्व जैसे महत्वपूर्ण टिश्यू दान किए गए, जिससे कई लोगों को नई जिंदगी मिल सकेगी। यह कदम समाज के लिए एक बड़ी मिसाल बनकर सामने आया है। जहां एक ओर यह कहानी दर्द और संघर्ष की है, वहीं दूसरी ओर यह मानवता और त्याग का संदेश भी देती है। हरीश राणा भले ही इस दुनिया से चले गए, लेकिन उनका योगदान दूसरों के जीवन में रोशनी बनकर हमेशा जीवित रहेगा।
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