कारगिल युद्ध के बाद ताबूत खरीद विवाद: आरोप और अदालत से बरी होने तक का पूरा घटनाक्रम
टेन न्यूज नेटवर्क
National News (17/03/2026): भारत के इतिहास में कई घोटाले सामने आए हैं, लेकिन 1999 के कारगिल युद्ध के बाद उभरा ताबूत खरीद विवाद लंबे समय तक चर्चा में रहा। यह मामला उन ताबूतों की खरीद से जुड़ा था, जिनका उपयोग शहीद सैनिकों के पार्थिव शरीर को उनके घर तक पहुंचाने के लिए किया गया।
युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में शहीद हुए सैनिकों के शवों को सुरक्षित रखने और सम्मानपूर्वक उनके घर भेजने के लिए रक्षा मंत्रालय ने आपातकालीन खरीद प्रक्रिया अपनाई। इस प्रक्रिया के तहत बिना लंबी निविदा प्रक्रिया के सीधे ताबूत खरीदे गए।
बाद में इस खरीद को लेकर गंभीर सवाल उठे। आरोप लगाया गया कि जिन ताबूतों की कीमत लगभग ₹7,000 होनी चाहिए थी, उन्हें ₹1.10 लाख से अधिक में खरीदा गया। यह भी कहा गया कि इस खरीद में अत्यधिक मुनाफा वसूला गया।
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में भी इस मुद्दे को उठाया गया। रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र समान ताबूत लगभग 172 डॉलर में खरीद रहा था, जबकि भारत ने इसके लिए करीब 2,500 डॉलर का भुगतान किया।
वहीं सरकार और सप्लायर की ओर से यह तर्क दिया गया कि दोनों ताबूतों की गुणवत्ता और विशेषताएं अलग थीं। भारत द्वारा खरीदे गए ताबूत एयरटाइट और पुनः उपयोग योग्य एल्युमिनियम से बने थे, जिनमें हवाई परिवहन की लागत भी शामिल थी।
ताबूतों की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल खड़े हुए। सेना की ओर से हल्के एल्युमिनियम ताबूतों की मांग की गई थी, लेकिन जो ताबूत सप्लाई हुए वे अपेक्षा से काफी भारी बताए गए। इसके अलावा उनकी बनावट और उपयोग में भी दिक्कतों की बात सामने आई।
साल 2001 में यह मामला सार्वजनिक होने के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया। विपक्ष ने तत्कालीन सरकार पर आरोप लगाए और इस मुद्दे को लेकर व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। उस समय के रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस पर भी दबाव बढ़ा और उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपी गई। लंबी जांच और सुनवाई के बाद 2013 में विशेष अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। इसके बाद 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ताबूतों की कीमत अधिक हो सकती है और खरीद प्रक्रिया में कुछ खामियां हो सकती हैं, लेकिन जांच एजेंसी यह साबित नहीं कर पाई कि इस मामले में रिश्वत ली गई या किसी प्रकार का आपराधिक षड्यंत्र हुआ।
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