‘संस्कृत मनुष्य निर्माण की भाषा, इसके संरक्षण से ही सशक्त भारत का निर्माण संभव’ : प्रो. मुरली मनोहर पाठक

टेन न्यूज नेटवर्क

Lucknow News (01/08/2026): संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा और मानवीय मूल्यों की आधारशिला है। यह व्यक्ति को केवल शिक्षित नहीं करती, बल्कि उसके व्यक्तित्व का निर्माण कर उसे संस्कारित, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनाती है। संस्कृत का संरक्षण और संवर्धन भारत की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय अस्मिता और ज्ञान-विरासत को सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यह विचार श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने गुरुपूर्णिमा के अवसर पर आयोजित ‘संस्कृत सेवाव्रती सम्मान’ समारोह में व्यक्त किए।

उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के अंतर्गत उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी द्वारा आयोजित इस समारोह में प्रदेशभर से आए सेवानिवृत्त संस्कृत शिक्षकों को भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा के संरक्षण, संवर्धन तथा शिक्षा के क्षेत्र में उनके दीर्घकालीन योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

अपने संबोधन में प्रो. पाठक ने कहा कि गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह समाज और राष्ट्र के चरित्र निर्माण का प्रमुख आधार होता है। उन्होंने कहा कि संस्कृत शिक्षकों ने वर्षों तक समर्पण, तप और त्याग के साथ भारतीय संस्कृति की अमूल्य परंपरा को नई पीढ़ियों तक पहुँचाने का कार्य किया है। ऐसे शिक्षकों का सम्मान वास्तव में भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों का सम्मान है।

उन्होंने कहा कि संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन, वैज्ञानिक और परिष्कृत भाषाओं में शामिल है। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भगवद्गीता, आयुर्वेद, योग, गणित, ज्योतिष, दर्शन और साहित्य जैसे भारतीय ज्ञान के विशाल भंडार का मूल आधार संस्कृत ही है। इसलिए संस्कृत का संरक्षण केवल भाषा की रक्षा नहीं, बल्कि भारत की हजारों वर्षों पुरानी बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने का दायित्व भी है।

प्रो. पाठक ने कहा कि आज पूरी दुनिया नैतिक मूल्यों के संकट, मानसिक तनाव और सामाजिक असंतुलन जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में संस्कृत साहित्य में निहित ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ और ‘लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु’ जैसे आदर्श वैश्विक समाज को शांति, समरसता और मानवता का मार्ग दिखाते हैं।

उन्होंने उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी की गतिविधियों की सराहना करते हुए कहा कि अकादमी संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार, शोध, प्रकाशन, विद्वानों के सम्मान, संगोष्ठियों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से उल्लेखनीय कार्य कर रही है। साथ ही कक्षा छह से लेकर स्नातकोत्तर स्तर तक अध्ययनरत विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति, पुरस्कार, प्रतियोगिताओं और विभिन्न प्रोत्साहन योजनाओं के जरिए संस्कृत अध्ययन के लिए प्रेरित किया जा रहा है। उन्होंने इसे संस्कृत के उज्ज्वल भविष्य में किया जा रहा महत्वपूर्ण निवेश बताया।

नई शिक्षा नीति का उल्लेख करते हुए प्रो. पाठक ने कहा कि वर्तमान समय संस्कृत के पुनर्जागरण का है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा व्यवस्था के केंद्र में स्थान दिया है, जिससे संस्कृत के विकास की नई संभावनाएं खुली हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि संस्कृत को आधुनिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), अनुसंधान और नवाचार से जोड़कर युवाओं के लिए नए अवसर तैयार किए जाने चाहिए। संस्कृत को केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य के ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में स्थापित करना समय की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि ‘संस्कृत सेवाव्रती सम्मान’ केवल सम्मान कार्यक्रम नहीं, बल्कि उन शिक्षकों के प्रति समाज की कृतज्ञता का प्रतीक है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन संस्कृत शिक्षा, भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय मूल्यों के संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया।

समारोह की अध्यक्षता केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, भोपाल परिसर के निदेशक प्रो. आजाद मिश्रा ने की। उन्होंने कहा कि संस्कृत शिक्षक भारतीय संस्कृति के वास्तविक संरक्षक हैं और उनके अथक प्रयासों ने भारतीय संस्कारों को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवंत बनाए रखा है।

वहीं, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, लखनऊ परिसर के निदेशक एवं सारस्वत अतिथि प्रो. सुरेंद्र पाठक ने कहा कि संस्कृत केवल अतीत की गौरवशाली विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं से जुड़ी भाषा भी है। उन्होंने संस्कृत को युवाओं की शिक्षा, शोध और नवाचार से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।

कार्यक्रम के दौरान उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए सेवानिवृत्त संस्कृत शिक्षकों को प्रशस्ति-पत्र, अंगवस्त्र और स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया। समारोह में बड़ी संख्या में विद्वान, शिक्षक, शोधार्थी और संस्कृत प्रेमी उपस्थित रहे।

समापन संबोधन में प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने कहा कि संस्कृत का पुनरुत्थान केवल भाषाई अभियान नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय पहचान और वैश्विक ज्ञान नेतृत्व को पुनर्स्थापित करने का एक व्यापक आंदोलन है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि जब तक संस्कृत जीवंत रहेगी, तब तक भारत की संस्कृति, सभ्यता और ज्ञान परंपरा भी विश्व पटल पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखेगी।


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