गाँव भारत की असली शक्ति है, युवाओं को अपनी कहानी खुद लिखनी चाहिए: डॉ. सविता | Ten Talks
टेन न्यूज नेटवर्क
New Delhi News (12/03/2026): अग्रणी डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म “टेन न्यूज़ नेटवर्क” द्वारा जनहित और राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों को सकारात्मक और निष्पक्ष रूप से सामने लाने की अपनी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मंगलवार, 10 मार्च को दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में गलगोटियास यूनिवर्सिटी के सहयोग से एक विशेष ज्ञानवर्धक टॉक शो “टेन टॉक्स” का भव्य आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में राजनीति, शिक्षा, कानून, समाज सेवा और अध्यात्म जैसे विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों ने हिस्सा लेकर अपने अनुभव और विचार साझा किए।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में राज्यसभा सांसद पी. संतोष कुमार, अयोध्या से समाजवादी पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद और राज्यसभा सांसद पी. विल्सन उपस्थित रहे। सभी मुख्य अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया। इस अवसर पर मंच से देश के विकास, लोकतांत्रिक मूल्यों और समाज में सकारात्मक योगदान देने वाले विभिन्न क्षेत्रों की भूमिका पर व्यापक चर्चा की गई।
डॉ. सविता, प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय, लेखक एवं चिंतक; ने अपने संबोधन में कहा कि उनका जीवन और सोच आज भी गाँव से गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने बताया कि वे एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से आई हैं और आज भी उनका मन, प्राण और आत्मा गाँव में ही बसते हैं। उन्होंने कहा कि भारत को “गाँवों का देश” कहा जाता है, लेकिन समाज में कई बार गाँव और ‘गंवईपन’ को गलत तरीके से देखा जाता है। उनके अनुसार अगर किसी व्यक्ति में गाँव की सादगी और मूल भावना बची हुई है तो वही वास्तविक समृद्धि है, अन्यथा जीवन खोखला हो जाता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय कई तरह के संकटों का दौर है और ऐसे समय में गाँव की सादगी और जीवन दृष्टि समाज को संभालने की क्षमता रखती है। अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि वे बिहार के मधुबनी से आती हैं और शिक्षा के प्रति गहरी रुचि के कारण उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में अध्ययन किया। उनका लक्ष्य शुरू से ही शिक्षण के क्षेत्र में काम करना रहा। उन्होंने कहा कि एक शिक्षक के लिए किसी विशेष मंच की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि जहाँ भी विद्यार्थी मिलते हैं, वहीं से शिक्षा की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
डॉ. सविता ने बताया कि उनके कई कार्य एक प्रकार के वैचारिक विद्रोह के रूप में शुरू हुए। उन्होंने मैथिली भाषा और साहित्य के सम्मान के लिए काम किया और इस विचार को आगे बढ़ाया कि मातृभाषा में लिखे गए साहित्य को भी सम्मान के साथ खरीदा और पढ़ा जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से उन्होंने “मैथिली मचान” के माध्यम से एक अभियान शुरू किया, जिसका उद्देश्य मैथिली साहित्य को उचित सम्मान दिलाना था।

उन्होंने आगे बताया कि इसी सोच के साथ उन्होंने “मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल” की शुरुआत की। साहित्य उत्सव को शहरों तक सीमित रखने के बजाय गाँव में आयोजित करने का उद्देश्य यह था कि लोग अपनी जड़ों से जुड़ सकें और गाँव की संस्कृति तथा भाषा के बीच संवाद स्थापित हो सके। उन्होंने आमंत्रित लोगों से स्पष्ट कहा कि गाँव में सुविधाओं की अपेक्षा करने के बजाय वहाँ के जीवन और संस्कृति को समझने के लिए आना चाहिए।
डॉ. सविता ने कहा कि गाँव को शहर की तरह बनाने की कोशिश करने के बजाय उसकी मूल संरचना और सांस्कृतिक स्वरूप को सुरक्षित रखना जरूरी है। उनके अनुसार गाँवों में ही देश की असली सांस्कृतिक और सामाजिक शक्ति मौजूद है। उन्होंने यह भी कहा कि वैकल्पिक सांस्कृतिक मंचों की आवश्यकता इसलिए होती है ताकि वे विषय और विचार भी सामने आ सकें जिन्हें मुख्यधारा में स्थान नहीं मिल पाता।
इतिहास के विषय पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में इतिहास को लेकर कई तरह की गलत धारणाएँ फैल रही हैं और यह विषय सोशल मीडिया के प्रभाव से प्रभावित हो रहा है। उनका मूल विषय इतिहास रहा है, लेकिन उनके कई सामाजिक और सांस्कृतिक कार्य अकादमिक मूल्यांकन या पदोन्नति से जुड़े नहीं हैं, फिर भी वे उन्हें जारी रखती हैं क्योंकि उनसे उन्हें संतोष मिलता है।
युवाओं को संबोधित करते हुए डॉ. सविता ने कहा कि नई पीढ़ी को अपनी कहानी स्वयं लिखनी चाहिए, इसके लिए आत्मविश्वास, समर्पण और त्याग की आवश्यकता होती है। व्यक्ति को अपने विचारों पर अडिग रहते हुए समाज और संस्कृति के लिए काम करना चाहिए।
उन्होंने मिथिला क्षेत्र की कला का उल्लेख करते हुए कहा कि वहाँ की महिलाओं ने सीमित संसाधनों में भी अद्भुत कला और रचनात्मकता को जीवित रखा है। उन्होंने अपने शोध कार्य के दौरान बिहार की महिलाओं की शिक्षा पर काम करने का अनुभव साझा किया और कहा कि ग्रामीण महिलाओं को अक्सर अनपढ़ कहा जाता है, जबकि वे जीवन की व्यावहारिक समझ, संसाधन प्रबंधन और सतत विकास की गहरी समझ रखती हैं।
डॉ. सविता ने यह भी बताया कि उन्होंने “वैदेही” विषय पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई प्रदर्शनियाँ आयोजित कीं, जिनका उद्देश्य सीता के उस चित्रण को बदलना था जिसमें उन्हें केवल एक कमजोर और पीड़ित महिला के रूप में देखा जाता है। उन्होंने सीता के त्याग, धैर्य और आंतरिक शक्ति को सामने लाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि गाँव केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि एक विचार और संस्कृति का प्रतीक है। युवाओं से उन्होंने आग्रह किया कि वे अपनी जड़ों, भाषा और संस्कृति को समझते हुए आगे बढ़ें और अपनी कहानी के स्वयं रचनाकार बनें।
इस विशेष कार्यक्रम में प्रोफेसर रूबी मिश्रा (प्राचार्य, भगिनी निवेदिता कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय), एडवोकेट डॉ. ए.पी. सिंह (वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय), डॉ. आदिश सी अग्रवाला (वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय), डॉ. खुशबू सिंह (हस्तशिल्प निर्यातक एवं निदेशक, आर्य फैशन), आनंदिता बासु (क्विज मास्टर), सुश्री रुचिका आर. शर्मा (प्रसिद्ध ज्योतिषी), डॉ. प्रो. वंदना शर्मा ‘दिया'(प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय एवं अद्वैत वेदांत दर्शन की विद्वान), प्रोफेसर सविता झा (प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय एवं सामाजिक कार्यकर्ता), ज्योतिष रत्न गुरुजी गौतम ऋषि (संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय गुरुकुल एवं गौशाला अनुसंधान संस्थान), मेजर डॉ. प्राची गर्ग (एमसी एवं कारगिल योद्धा), पुरुषोत्तम बिहारी (चिंतक व लेखक) तथा आलोक द्विवेदी (वरिष्ठ पत्रकार एवं अध्यक्ष, नोएडा मीडिया क्लब) सहित कई गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के दौरान सभी वक्ताओं ने अपने-अपने क्षेत्र में प्राप्त अनुभवों, संघर्षों और सफलता की प्रेरक यात्राओं को साझा किया। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि शिक्षा, कानून, मीडिया, संस्कृति और अध्यात्म जैसे विभिन्न क्षेत्र किस प्रकार विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।।
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