नालंदा का ‘धर्मगंज’ पुस्तकालय: जहां लाखों किताबें महीनों तक जलती रहीं
टेन न्यूज नेटवर्क
National News (11/02/2026): दुनिया के प्राचीनतम शिक्षा केंद्रों में शामिल नालंदा विश्वविद्यालय अपने विशाल पुस्तकालय ‘धर्मगंज’ के लिए प्रसिद्ध था। कहा जाता है कि यहां मौजूद पुस्तकों की संख्या इतनी अधिक थी कि जब उन्हें आग लगाई गई, तो वे हफ्तों और महीनों तक जलती रहीं। इस पुस्तकालय को प्राचीन भारत के सबसे बड़े ज्ञान भंडारों में गिना जाता है।
नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना लगभग 1600 वर्ष पहले गुप्त साम्राज्य के दौरान राजा कुमारगुप्त प्रथम ने की थी। यह संस्थान केवल सरकारी सहायता पर निर्भर नहीं था, बल्कि 100 से अधिक गांवों के दान और लगान से संचालित होता था। यहां प्रवेश पाना आसान नहीं था। द्वारपालों द्वारा पूछे गए कठिन प्रश्नों के उत्तर देने के बाद ही छात्रों को अंदर जाने की अनुमति मिलती थी। दस में से केवल दो या तीन छात्र ही इस परीक्षा में सफल हो पाते थे।
विश्वविद्यालय का परिसर लाल ईंटों से बनी भव्य इमारतों से सुसज्जित था। इसमें 11 बड़े छात्रावास, मंदिर और सात तालाब थे, जिनमें नीले कमल खिलते थे। छात्रों के लिए अलग-अलग कमरे, पर्याप्त रोशनी और ताजी हवा की व्यवस्था थी। शिक्षा और रहने की सुविधा पूरी तरह नि:शुल्क थी। प्रतिदिन सुबह शंख बजने के साथ अध्ययन की शुरुआत होती थी।
नालंदा का मुख्य पुस्तकालय ‘धर्मगंज’ तीन इमारतों में विभाजित था—रत्नसागर, रत्नोदधी और रत्नरंजक। इनमें से रत्नोदधी नौ मंजिला इमारत थी, जिसमें लाखों हस्तलिखित ग्रंथ सुरक्षित रखे गए थे। यहां चिकित्सा विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान, दर्शन और तर्कशास्त्र से जुड़ी किताबों का विशाल संग्रह मौजूद था।
नालंदा में लगभग, 10,000 छात्र और 2,000 से अधिक शिक्षक अध्ययन और अध्यापन से जुड़े थे। यहां पढ़ाई का मुख्य तरीका शास्त्रार्थ और वाद-विवाद था, न कि केवल रटने पर आधारित शिक्षा।
12वीं सदी के, अंत में तुर्क सेनापति बख्तियार खिलजी ने नालंदा पर हमला किया। हमले के दौरान विश्वविद्यालय और उसके पुस्तकालय को आग के हवाले कर दिया गया। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, पुस्तकालय में लगी आग इतनी भयानक थी कि वह तीन से छह महीने तक जलती रही। इस आग में हजारों वर्षों का संचित ज्ञान नष्ट हो गया।
कई सदियों तक, नालंदा के अवशेष मिट्टी में दबे रहे। 19वीं सदी में इसकी खुदाई शुरू हुई, जिसके बाद इसके ऐतिहासिक महत्व को दोबारा पहचाना गया। वर्तमान में नालंदा महाविहार यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है।
नालंदा विश्वविद्यालय और उसके धर्मगंज पुस्तकालय को प्राचीन भारत के शिक्षा और ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।
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