कमांडर नानावटी हत्याकांड: प्यार, विश्वासघात और न्याय व्यवस्था को बदल देने वाला मामला

टेन न्यूज नेटवर्क

National News (22/01/2026): भारत के न्यायिक इतिहास में कमांडर कावस मानिकशाह नानावटी का मामला आज भी सबसे चर्चित मामलों में गिना जाता है। भारतीय नौसेना के जांबाज अधिकारी नानावटी को उनकी बहादुरी और अनुशासन के कारण “गोल्डन बॉय” कहा जाता था। उनकी पत्नी सिल्विया नानावटी ब्रिटिश मूल की थीं और दोनों की शादीशुदा जिंदगी शुरुआत में सामान्य मानी जाती थी।

लेकिन जब नानावटी देश की सेवा में अपने युद्धपोत INS मैसूर पर तैनात थे, उसी दौरान उनकी पत्नी सिल्विया का उनके करीबी दोस्त प्रेम आहूजा के साथ प्रेम संबंध बन गया। प्रेम आहूजा एक अमीर और रंगीन मिजाज व्यक्ति था।

27 अप्रैल 1959 को जब नानावटी घर लौटे, तो सिल्विया ने रोते हुए अपने रिश्ते की सच्चाई उन्हें बता दी। यह बात सुनकर नानावटी अंदर से टूट गए, लेकिन उन्होंने खुद पर नियंत्रण रखा। उन्होंने अपने बच्चों और पत्नी को फिल्म दिखाने भेज दिया और इसके बाद नेवल बेस जाकर अपनी सर्विस रिवॉल्वर ले ली।

इसके बाद नानावटी सीधे प्रेम आहूजा के घर पहुंचे। वहां उन्होंने प्रेम से पूछा कि क्या वह सिल्विया से शादी करेगा। प्रेम के जवाब ने नानावटी को और आहत कर दिया। उसने कहा कि वह हर उस महिला से शादी नहीं कर सकता, जिसके साथ उसका संबंध रहा हो। इसी बात पर गुस्से में आकर नानावटी ने प्रेम आहूजा पर तीन गोलियां चला दीं, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई।

घटना के बाद नानावटी ने खुद को पुलिस के हवाले कर दिया और मामला अदालत में पहुंचा। उस समय भारत में जूरी सिस्टम लागू था, जिसमें आम नागरिक फैसला सुनाते थे। जनता नानावटी को एक देशभक्त और सम्मानित अधिकारी मानती थी, इसलिए जूरी ने उन्हें निर्दोष घोषित कर दिया।

हालांकि, मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। यह केस बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा, जहां मशहूर वकील राम जेठमलानी ने दलील दी कि यह हत्या गुस्से में नहीं बल्कि सोच-समझकर की गई थी। अदालत ने जूरी के फैसले को खारिज करते हुए नानावटी को दोषी ठहराया।

इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। लेकिन जनता के दबाव और राजनीतिक परिस्थितियों के चलते वर्ष 1964 में राज्यपाल ने नानावटी को माफी दे दी।

जेल से रिहा होने के बाद नानावटी अपने परिवार के साथ कनाडा चले गए और वहीं अपना जीवन बिताया।

यह मामला, भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए भी एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। नानावटी केस के बाद सरकार ने जूरी सिस्टम को खत्म कर दिया और भारत में न्यायिक फैसले पूरी तरह न्यायाधीशों के हाथ में दे दिए गए।

कमांडर नानावटी का यह मामला आज भी प्यार, विश्वासघात, कानून और जनभावना के टकराव की एक मिसाल माना जाता है, जिसने भारतीय इतिहास में गहरी छाप छोड़ी है।

डिस्क्लेमर: यह लेख / न्यूज आर्टिकल सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध जानकारी और प्रतिष्ठित / विश्वस्त मीडिया स्रोतों से मिली जानकारी पर आधारित है।यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। पाठक कृपया स्वयं इस की जांच कर सूचनाओं का उपयोग करे ॥


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