‘प्रयास ही सफलता का वास्तविक आधार है’ : गजानन माली | गुरु पूर्णिमा विशेष
रंजन अभिषेक, टेन न्यूज नेटवर्क
New Delhi News ( 29 जुलाई 2026):
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”
भारतीय संस्कृति में गुरु केवल शिक्षा प्रदान करने वाला व्यक्ति नहीं, अपितु वह दिव्य शक्ति है जो मनुष्य के व्यक्तित्व को संस्कारित कर उसे उसके वास्तविक स्वरूप से परिचित कराती है। गुरु वह दीप हैं जो अज्ञान के अंधकार को चीरकर ज्ञान, विवेक, संयम और आत्मविश्वास का आलोक फैलाते हैं। गुरु पूर्णिमा का यह पावन पर्व उसी सनातन गुरु-परंपरा के प्रति श्रद्धा, समर्पण और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है।
आज इस पुण्य अवसर पर मैं (रंजन अभिषेक) अपने जीवन के उस गुरु को सादर प्रणाम करना चाहता हूँ, जिन्होंने केवल पत्रकारिता ही नहीं सिखाई, बल्कि जीवन को देखने, समझने और जीने का दृष्टिकोण प्रदान किया। वे हैं श्रद्धेय गजानन माली।

एक संघर्षरत युवक से आत्मविश्वासी पत्रकार बनने तक की यात्रा
वर्ष 2021। मैं बिहार के एक सुदूर गाँव से निकलकर दिल्ली में अपने सपनों को आकार देने का प्रयास कर रहा था। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, असफलताओं की पीड़ा, भविष्य की अनिश्चितता और पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों से अनभिज्ञ एक साधारण युवक—यही मेरी पहचान थी।
इसी बीच 20 जनवरी 2021 को टेन न्यूज नेटवर्क के कार्यालय में संवाददाता एवं कंटेंट राइटर के पद हेतु साक्षात्कार देने पहुँचा। पहली बार गजानन माली से भेंट हुई।
वह साक्षात्कार केवल नौकरी पाने का माध्यम नहीं था; वह मेरे जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। बातचीत वेतन, पद अथवा कार्यालय तक सीमित नहीं रही। वह संवाद जीवन, सकारात्मकता, कर्म, अनुशासन और आत्मविश्वास का संवाद था। उस दिन पहली बार अनुभव हुआ कि सच्चा गुरु केवल रोजगार नहीं देता, वह जीवन का मार्ग प्रशस्त करता है।
पत्रकारिता के साथ जीवन-दर्शन का भी मिला पाठ
समय के साथ पत्रकारिता के प्रत्येक आयाम को मैंने उनसे सीखा। समाचार कैसे लिखा जाए, किसी घटना के विविध पक्ष कैसे देखे जाएँ, तथ्य और संवेदना के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए—इन सबका ज्ञान उन्होंने दिया।
किन्तु इन सबसे अधिक महत्वपूर्ण वह शिक्षा थी जो किसी पाठ्यपुस्तक में नहीं मिलती-
•सदैव सकारात्मक रहना।
•जिज्ञासु बने रहना।
•निरंतर सीखते रहना।
•और परिस्थितियाँ कैसी भी हों, प्रयास कभी न छोड़ना।

माली सर प्रायः कहते हैं, “तुम्हारे अधिकार में केवल प्रयास है, परिणाम नहीं। इसलिए अपना सम्पूर्ण ध्यान प्रयास पर केंद्रित करो; श्रेष्ठ प्रयास ही श्रेष्ठ परिणाम का आधार बनता है।”
यह वाक्य केवल उपदेश नहीं, उनके जीवन का व्यवहारिक दर्शन है।
संतोष जीवन में, किन्तु कर्म में कभी नहीं
गजानन माली भारत सरकार में अनुसंधान अधिकारी जैसे प्रतिष्ठित पद से सेवानिवृत्त हुए। सामान्यतः सेवा-निवृत्ति के पश्चात लोग विश्राम का जीवन चुनते हैं, किन्तु उन्होंने विश्राम नहीं, बल्कि नए संकल्प का मार्ग चुना।
उन्होंने नई ऊर्जा के साथ Ten News Network को केवल एक समाचार संस्थान नहीं बनाया, बल्कि उसे सामाजिक जागरूकता, जनभागीदारी और युवा प्रेरणा का मंच बनाया।
विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और विविध मंचों पर जाकर युवाओं को प्रेरित करना, समाज को सकारात्मक दिशा देना, संगीत के माध्यम से जीवन-मूल्यों का संदेश देना—ये उनके व्यक्तित्व के ऐसे आयाम हैं जिन्होंने मुझे गहराई से प्रभावित किया।
मैंने अपने गुरु में कर्मयोग को साकार देखा है
पिछले पाँच वर्षों से उनके साथ कार्य करते हुए मैंने उन्हें प्रातः से रात्रि तक निरंतर कर्मरत देखा है।
•न अवकाश का मोह, न सप्ताहांत की प्रतीक्षा।
•केवल कर्म, अनुशासन और समाज के प्रति उत्तरदायित्व।
उन्होंने मुझे सिखाया कि किसी भी कार्य में पूर्ण तल्लीनता ही उत्कृष्टता का मार्ग है। व्यक्ति की पहचान उसके पद से नहीं, बल्कि उसके कर्म और चरित्र से होती है।

गुरु का अनुशासन और वात्सल्य—दोनों साथ
संत कबीरदास का प्रसिद्ध दोहा आज भी उतना ही प्रासंगिक है— “गुरु कुम्हार शिष्य कुम्भ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।
अंतर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट॥”
मैंने इस दोहे को गजानन माली के व्यक्तित्व में साकार रूप में देखा है।
जहाँ आवश्यकता हुई वहाँ उन्होंने कठोरता दिखाई, अनुशासन का आग्रह किया; किन्तु उसी कठोरता के पीछे सदैव एक अभिभावक का स्नेह, एक शिक्षक की करुणा और एक गुरु का वात्सल्य विद्यमान रहा।
नाम के अनुरूप व्यक्तित्व
‘गजानन’—जो बुद्धि, विवेक, मंगल और विघ्न-विनाश के प्रतीक हैं।
‘माली’—जो एक नन्हे पौधे को सींचकर विशाल वटवृक्ष बनने योग्य बनाता है।
मुझे सदैव प्रतीत होता है कि गजानन माली अपने नाम को सार्थक करते हैं। उन्होंने न जाने कितने युवाओं को आत्मविश्वास, ज्ञान और संस्कार का जल देकर जीवन के विशाल वृक्ष के रूप में विकसित होने की प्रेरणा दी है।
आज गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर मैं अपने श्रद्धेय गुरु गजानन माली को कोटिशः प्रणाम करता हूँ।
यदि मेरे व्यक्तित्व, मेरे लेखन, मेरे विचार और मेरे जीवन में सकारात्मकता का कोई अंश दिखाई देता है, तो उसमें मेरे गुरु का अमूल्य योगदान है।
मेरे भाव
“गुरु केवल शिक्षा नहीं देते, वे जीवन को सही दिशा देते हैं।”
— रंजन अभिषेक
“गुरु के चरणों में मिलता है ज्ञान का अमृत-संसार,
उनके आशीष से प्रकाशित होता जीवन का प्रत्येक द्वार।
जो अज्ञान-तम को पलभर में कर दें दूर अपार,
ऐसे पूज्य गुरुवर को मेरा शत-शत नमन बारंबार।”
— रंजन अभिषेक
समर्पण
“गजानन माली सर, आपने मुझे केवल पत्रकार बनना नहीं सिखाया, बल्कि मनुष्य बनकर जीवन जीने की कला भी सिखाई। गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर आपको मेरा सादर प्रणाम। ईश्वर से प्रार्थना है कि आपका स्नेह, मार्गदर्शन और आशीर्वाद हम सभी शिष्यों पर सदैव बना रहे।”
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