बिहार (08 अप्रैल 2025):
नेताजी फिर से आए हैं,
बिहार की धरती को अपनाने आए हैं,
हाथ जोड़कर कह रहे, “हम तो यहीं के हैं”,
माइक पकड़कर अब ‘भइया’ बुलाने आए हैं।
बाढ़ में जब घर बहे थे, नेताजी कहाँ थे?
सुखाड़ में जब खेत सूखे, नेताजी कहाँ थे?
सड़कें जब दलदल बनी थीं,
अस्पतालों में बेड नहीं थे,
तब नेताजी के बयान भी कोमा में सो रहे थे।
अब चुनाव आया तो चप्पल छोड़, जूता पहन आए हैं,
बड़े-बड़े पोस्टरों में मुस्कान चिपकाए हैं,
“बिहार बदल देंगे”, ऐसा फिर से गा रहे हैं,
पिछली बार भी यही बोले थे, अब फिर से आ रहे हैं।
गांव में अब भी स्कूल का टीचर फरार है,
शहर में ट्रैफिक जाम स्थायी सरकार है,
नल से पानी नहीं, पर पोस्टर से विकास बहता है,
नेताजी का वादा आज भी चौपालों में कहता है।
“युवा हमारा भविष्य हैं”, भाषण में कहते हैं,
पर नौकरी के फॉर्म में उम्र सीमा घटाते रहते हैं।
“बेटी बचाओ” का नारा जपते हैं बार-बार,
लेकिन सड़कों पर बेटियाँ अब भी चलें डरी-डरी हर बार।
नेताजी फिर से आए हैं,
सपनों की दुकान सजाए हैं,
इस बार भी जुमलों का चूरन लाए हैं,
और जनता?
वो फिर से भीड़ बनकर ताली बजाने आए हैं…
नेता जी फिर से आए हैं…!!
~ रंजन अभिषेक (पत्रकार एवं लेखक)
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