New Delhi News (30 October 2026): जामिया मिल्लिया इस्लामिया में करीब दो दशक बाद छात्रसंघ चुनाव बहाल कराने की मांग को लेकर चल रहा छात्रों का आंदोलन आखिरकार समाप्त हो गया है। लगातार 18 दिनों तक चले धरने और भूख हड़ताल के बाद छात्रों और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच सहमति बन गई है। छात्र संगठनों के मुताबिक, प्रशासन ने उनकी प्रमुख मांगों को स्वीकार कर लिया है, जिससे विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव की बहाली का रास्ता साफ होता दिखाई दे रहा है। इस आंदोलन के दौरान एबिन बेसिल और रेहान खान लगातार भूख हड़ताल पर बैठे रहे। वहीं, तीन दिनों तक चली बातचीत के बाद केरल से सांसद हरीस बीरन के हस्तक्षेप से गतिरोध समाप्त हुआ। छात्रों ने इसे अपनी एकजुटता और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लंबे संघर्ष की बड़ी जीत बताया है।
जामिया में छात्रसंघ चुनाव बहाल कराने की मांग को लेकर 12 अक्टूबर से आंदोलन शुरू हुआ था। छात्रों की मांग थी कि विश्वविद्यालय प्रशासन चुनाव कराने के लिए स्पष्ट समयसीमा घोषित करे, ताकि करीब 20 साल से बंद पड़ी छात्रसंघ व्यवस्था दोबारा शुरू हो सके। इसके लिए छात्रों ने अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया और बाद में एबिन बेसिल तथा रेहान खान भूख हड़ताल पर बैठ गए। आंदोलन के दौरान छात्रों ने प्रशासन पर प्रदर्शन रोकने के लिए कई तरह की पाबंदियां लगाने का आरोप लगाया। छात्रों का कहना था कि परिसर में विरोध के बावजूद वे अपनी मांगों से पीछे नहीं हटेंगे। लगातार 18 दिनों तक चले इस आंदोलन के बाद आखिरकार प्रशासन और छात्रों के बीच सहमति बन गई।
छात्रों और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच पिछले तीन दिनों से लगातार बातचीत चल रही थी, लेकिन कई दौर की चर्चा के बावजूद कोई ठोस समाधान नहीं निकल पा रहा था। इसके बाद केरल के सांसद हरीस बीरन ने मामले में हस्तक्षेप किया। AISA के मुताबिक, सांसद ने छात्रों की मांगों को कुलपति के सामने रखा और इसके बाद कुलपति, रजिस्ट्रार तथा छात्र प्रतिनिधियों के बीच बातचीत कराई। इस वार्ता में अलग-अलग छात्र संगठनों और स्वतंत्र छात्रों का सात सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल शामिल हुआ। इसमें एबिन बेसिल की ओर से NSUI के मोहियुद्दीन, रेहान खान की ओर से फरहान इसराइल, फ्रेटरनिटी से लुबैब, स्वतंत्र छात्रा उत्तरा, AISA से नेविल थॉमस, MSF से सहाद और हबीबा शामिल थीं। प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव बहाली के साथ आंदोलन के दौरान सामने आए मुद्दों को भी प्रशासन के सामने रखा। इसके बाद प्रशासन की ओर से छात्रों की प्रमुख मांगें स्वीकार किए जाने की जानकारी दी गई।
आंदोलन समाप्त होने के बाद छात्र संगठनों ने इसे ऐतिहासिक सफलता बताया है। NSUI के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने कहा कि हजारों छात्रों की एकजुटता और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष की यह बड़ी जीत है। उन्होंने आरोप लगाया कि आंदोलन को दबाने के लिए दिल्ली पुलिस और ITBP की तैनाती की गई, विश्वविद्यालय परिसर बंद किया गया और ऑनलाइन कक्षाएं शुरू की गईं, लेकिन छात्र अपनी मांग से पीछे नहीं हटे। वहीं, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) की दिल्ली राज्य कमेटी ने भी छात्रों को बधाई देते हुए इसे ऐतिहासिक जीत बताया। SFI के मुताबिक, संगठन आंदोलन की शुरुआत से ही छात्रों के साथ था। संगठन की इकाई समिति के सदस्य अबुजर ने भी छात्रसंघ बहाली की मांग को लेकर पिछले तीन दिनों से भूख हड़ताल की थी। SFI दिल्ली की अध्यक्ष नादिया और सचिव सूरज एलामोन ने कहा कि विश्वविद्यालय केवल शिक्षा के केंद्र नहीं, बल्कि लोकतंत्र, असहमति और छात्र भागीदारी के भी महत्वपूर्ण स्थान हैं।
जामिया के इस आंदोलन को छात्र संगठन देशभर के विश्वविद्यालयों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश मान रहे हैं। NSUI और SFI का कहना है कि छात्रसंघ चुनाव छात्रों को अपनी समस्याएं उठाने, प्रशासन के सामने अपनी बात रखने और विश्वविद्यालय से जुड़े फैसलों में भागीदारी का अवसर देते हैं। करीब दो दशक तक चुनाव नहीं होने के बावजूद छात्रों ने अपनी मांग को लेकर संघर्ष जारी रखा और आखिरकार प्रशासन के साथ सहमति बनाने में सफलता हासिल की। हालांकि, अब इस पूरे मामले में सबसे अहम पहलू छात्रसंघ चुनाव की वास्तविक बहाली और उसकी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना होगा। इससे पहले विश्वविद्यालय प्रशासन ने 26 अक्टूबर को जारी आदेश में कहा था कि छात्रसंघ चुनाव, छात्रसंघ के संविधान को मंजूरी मिलने की तारीख से 15 दिनों के भीतर कराए जाएंगे।
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