यूपीएससी के 100 साल पूरे: योग्यता-आधारित चयन से डिजिटल और समावेशी भर्ती तक तय किया लंबा सफर

टेन न्यूज़ नेटवर्क

National News (30 September 2026): संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी (UPSC) 1 अक्टूबर 2026 को अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे करने जा रहा है। आयोग की संस्थागत यात्रा 1 अक्टूबर 1926 को भारत के पहले लोक सेवा आयोग की स्थापना के साथ शुरू हुई थी। शुरुआती दौर में यह एक सलाहकारी संस्था थी, जिसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति लंदन में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट करते थे। समय के साथ इसके अधिकार, संरचना और जिम्मेदारियां लगातार बदलती गईं और स्वतंत्र भारत में यह संविधान के तहत एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के रूप में स्थापित हुआ। आज यूपीएससी देश में योग्यता-आधारित भर्ती, निष्पक्ष चयन और प्रशासनिक सेवाओं के लिए मानव संसाधन तैयार करने वाली प्रमुख संस्थाओं में शामिल है।

1855 से शुरू हुआ योग्यता आधारित भर्ती का विचार

सरकारी सेवाओं में भर्ती को सिफारिश या नामांकन के बजाय योग्यता से जोड़ने का औपचारिक प्रयास 1855 में हुआ, जब लंदन में इंडियन सिविल सर्विस की प्रतियोगी परीक्षा शुरू की गई। हालांकि उस समय भारतीयों के लिए इस परीक्षा में शामिल होना बेहद कठिन था। परीक्षा केवल लंदन में और अंग्रेजी माध्यम में होती थी तथा ग्रीक और लैटिन जैसे विषयों को भी इसमें स्थान दिया गया था। 21 वर्षीय सत्येंद्रनाथ टैगोर 1862 में इस परीक्षा में शामिल होने के लिए इंग्लैंड गए और 1863 में सफल हुए। 1864 में सेवा में शामिल होकर वे इस प्रतिष्ठित सेवा में प्रवेश करने वाले पहले भारतीय बने। इसके बाद सुरेंद्रनाथ बनर्जी, बिहारी लाल गुप्ता और रमेश चंद्र दत्त जैसे भारतीयों ने भी यह परीक्षा पास की। हालांकि, परीक्षा में भारतीय प्रतिनिधित्व लंबे समय तक बेहद सीमित रहा और 1919 तक 1,255 आईसीएस अधिकारियों में केवल 78 भारतीय थे।

1919 के बाद लोक सेवा आयोग की स्थापना का रास्ता खुला

राष्ट्रवादी नेताओं की लगातार मांग और संवैधानिक सुधारों के बाद लोक सेवा आयोग की स्थापना की दिशा में कदम बढ़े। गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1919 में लोक सेवा आयोग के गठन का प्रावधान किया गया। 1922 में आईसीएस परीक्षा पहली बार लंदन के साथ भारत के इलाहाबाद में भी आयोजित की गई और 1928 में भारतीय परीक्षा केंद्र दिल्ली स्थानांतरित हुआ। 1924 में आर्थर हैमिल्टन ली की अध्यक्षता वाले ली आयोग ने तत्काल एक वैधानिक लोक सेवा आयोग गठित करने की सिफारिश की। इसके बाद 1926 में लोक सेवा आयोग की स्थापना हुई। सर रॉस बार्कर इसके पहले अध्यक्ष बने और आयोग का कार्यालय दिल्ली के मेटकाफ हाउस में स्थापित किया गया। शुरुआत में इसकी शक्तियां सीमित थीं, लेकिन भारत में भर्ती से जुड़ी एक स्थायी संस्थागत व्यवस्था की शुरुआत यहीं से हुई।

1937 में संघीय लोक सेवा आयोग और आजादी के बाद बड़ा बदलाव

भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत लोक सेवा आयोग की भूमिका और व्यापक हुई। 1 अप्रैल 1937 को इसका नाम संघीय लोक सेवा आयोग कर दिया गया। आयोग से भर्ती, नियुक्ति, पदोन्नति, अनुशासनात्मक मामलों और सेवा नियमों से जुड़े विषयों पर परामर्श लेने की व्यवस्था विकसित हुई। 1938 में कई सेवाओं के लिए संयुक्त प्रतियोगी परीक्षाएं शुरू हुईं। 1940 तक आईसीएस में भारतीय अधिकारियों की संख्या यूरोपीय अधिकारियों से अधिक हो गई। 1947 में एच.के. कृपलानी आयोग के पहले भारतीय अध्यक्ष बने। स्वतंत्रता के बाद आईसीएस की जगह भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी IAS ने ली और दिसंबर 1947 में आजाद भारत की पहली परीक्षा आयोजित हुई। 1948 में संयुक्त परीक्षा के माध्यम से भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों का पहला बैच भी भर्ती किया गया।

1950 में संवैधानिक संस्था बना यूपीएससी

26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ संघीय लोक सेवा आयोग का नाम बदलकर संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) कर दिया गया। आर.एन. बनर्जी इसके पहले अध्यक्ष बने। संविधान के भाग XIV में अनुच्छेद 315 से 323 तक संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों से संबंधित प्रावधान किए गए। अनुच्छेद 315 संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोग की व्यवस्था करता है, जबकि अनुच्छेद 316 अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति से संबंधित है। अनुच्छेद 317 में सदस्यों को हटाने और निलंबित करने की प्रक्रिया, अनुच्छेद 320 में आयोग के प्रमुख कार्य और अनुच्छेद 322 में उसके खर्च को भारत की संचित निधि से पूरा करने का प्रावधान है। अनुच्छेद 323 के तहत आयोग को राष्ट्रपति को वार्षिक रिपोर्ट देनी होती है। इन संवैधानिक प्रावधानों का उद्देश्य भर्ती प्रक्रिया में निष्पक्षता बनाए रखना और भाई-भतीजावाद व पक्षपात की संभावना को कम करना था।

परीक्षाओं का दायरा लगातार बढ़ता गया

आज यूपीएससी केवल सिविल सेवा परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था नहीं है। इसके माध्यम से सिविल सेवा, भारतीय वन सेवा, इंजीनियरिंग सेवा, संयुक्त चिकित्सा सेवा, राष्ट्रीय रक्षा अकादमी एवं नौसेना अकादमी, संयुक्त रक्षा सेवा और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सहायक कमांडेंट) जैसी परीक्षाओं के जरिए भर्ती की जाती है। इसके अलावा मंत्रालयों और विभागों द्वारा प्रस्तावित विशेष पदों पर चयन के लिए भर्ती परीक्षण और साक्षात्कार भी आयोजित किए जाते हैं। आयोग भर्ती नियमों, विभागीय पदोन्नति समितियों, अखिल भारतीय सेवाओं में शामिल करने और अनुशासनात्मक मामलों पर सरकार को सलाह देता है। 2023-24 में आयोग ने पदोन्नति से जुड़े 24,581 अधिकारियों के रिकॉर्ड पर कार्रवाई की और 532 अधिकारियों को अखिल भारतीय सेवाओं में शामिल करने की प्रक्रिया में भूमिका निभाई। 2012-13 से सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह मामले में 2006 के निर्देश के अनुरूप आयोग राज्यों में पुलिस महानिदेशक या पुलिस बल के प्रमुख पद पर नियुक्ति के लिए वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों का पैनल तैयार करने की प्रक्रिया में भी शामिल है।

परीक्षा प्रणाली में 1970 और 1980 के दशक में बड़े बदलाव

यूपीएससी की परीक्षा व्यवस्था में समय के साथ कई महत्वपूर्ण सुधार हुए। 1966 में भारतीय वन सेवा को तीसरी अखिल भारतीय सेवा के रूप में बनाया गया और पहला चयन 1967 में हुआ। 1969 में सिविल सेवा परीक्षा के निबंध और सामान्य अध्ययन में आठवीं अनुसूची की भाषाओं को विकल्प के रूप में शामिल किया गया। 1976 में आयोग को आवेदनों की संख्या एक लाख से अधिक होने का अनुभव हुआ और डी.एस. कोठारी समिति ने तीन चरणों वाली परीक्षा की सिफारिश की। 1978 में आयोग ने रिकॉर्ड और उत्तर पुस्तिकाओं के प्रसंस्करण के लिए कंप्यूटर का इस्तेमाल शुरू किया। 1979 में प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार वाली तीन चरणों की सिविल सेवा परीक्षा प्रणाली शुरू हुई। इसी दौरान मुख्य परीक्षा में भारतीय भाषाओं को भी औपचारिक स्थान मिला और लंदन परीक्षा केंद्र बंद कर दिया गया।

1985 के बाद आधुनिकीकरण और ऑनलाइन आवेदन की शुरुआत

1985 में आयोग में अध्यक्ष और 10 सदस्यों की स्वीकृत संख्या तय की गई। 1988-89 में सतीश चंद्र समिति ने परीक्षा केंद्र बढ़ाने, निबंध को शामिल करने, प्रारंभिक परीक्षा में नकारात्मक अंकन और साक्षात्कार में अधिक अंक जैसे सुधार सुझाए। 1989 में OMR तकनीक शुरू की गई। 1992 में रोज मिलियन बाथेव खारबुली यूपीएससी की पहली महिला अध्यक्ष बनीं। 1993 में सिविल सेवा मुख्य परीक्षा में निबंध का पेपर शुरू हुआ और साक्षात्कार के अंक 250 से बढ़ाकर 300 किए गए। 2000 के आसपास ऑनलाइन रिक्रूटमेंट एप्लीकेशन यानी ORA व्यवस्था शुरू हुई और 2010 तक कई परीक्षाओं के आवेदन पूरी तरह ऑनलाइन हो गए। 2003 में केंद्रीय पुलिस बल सहायक कमांडेंट परीक्षा शुरू हुई और 2005 में आयोग सचिवालय का नया कार्यालय भवन शुरू हुआ।

2011 के बाद डिजिटल और पारदर्शी व्यवस्था पर जोर

2011 में सिविल सेवा अभिरुचि परीक्षा यानी CSAT शुरू हुई और सिंगल विंडो सिस्टम लागू किया गया। 2013 में सिविल सेवा मुख्य परीक्षा का नया ढांचा आया, जिसमें सामान्य अध्ययन के चार पेपर और एक वैकल्पिक विषय रखा गया। इसी वर्ष पहली बार कंप्यूटर आधारित भर्ती परीक्षाओं की शुरुआत हुई और सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के माध्यम से भारतीय वन सेवा के लिए स्क्रीनिंग शुरू हुई। 2015 में CSAT को 33 प्रतिशत अंकों वाला क्वालिफाइंग पेपर बनाया गया। 2017 में इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा तीन चरणों की हुई और प्रश्नों पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए ऑनलाइन विंडो शुरू हुई। 2018 में प्रश्न-आधारित मार्क्स इंफॉर्मेशन सिस्टम और 2019 में परीक्षाओं की सालभर निगरानी के लिए विशेष नियंत्रण कक्ष की व्यवस्था की गई।

महिलाओं, एससी-एसटी और दिव्यांग उम्मीदवारों की भागीदारी बढ़ी

यूपीएससी की 100 वर्ष की यात्रा में समावेशिता भी एक महत्वपूर्ण बदलाव रहा है। 1952 में सिविल सेवा परीक्षा में अनुशंसित 83 उम्मीदवारों में केवल 3 महिलाएं थीं, जबकि 2025 में 958 अनुशंसित उम्मीदवारों में 299 महिलाएं थीं। 1955 में 9 एससी उम्मीदवारों की अनुशंसा के मुकाबले 2025 में यह संख्या 158 रही, जबकि एसटी उम्मीदवारों की संख्या 1956-57 के 2 से बढ़कर 2025 में 73 हुई। PwBD उम्मीदवारों की अनुशंसित संख्या 2002 में 3 से बढ़कर 2025 में 42 हो गई। 2021 में NDA और NA परीक्षा में पहली बार महिलाओं को शामिल किया गया। दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए स्क्राइब, अतिरिक्त समय, पसंद का परीक्षा केंद्र और साक्षात्कार में फैसिलिटेटर जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। महिलाओं को परीक्षा शुल्क में छूट भी दी जाती है।

आवेदनों का आंकड़ा लाखों से बढ़कर 45 लाख के पार पहुंचा

यूपीएससी के काम के बढ़ते दायरे का अंदाजा आवेदन संख्या से लगाया जा सकता है। 1950-51 में परीक्षाओं और चयन के जरिए भर्ती के लिए कुल 42,727 आवेदन आए थे, जबकि 2022-23 में यह संख्या बढ़कर 45,10,044 के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई। उस वर्ष आयोग ने 15 परीक्षाएं आयोजित कीं, जिनमें 33,51,916 आवेदन प्राप्त हुए। चयन के जरिए भर्ती के तहत 4,411 पदों के लिए 233 अनुरोध प्राप्त हुए और 11,58,128 आवेदन आए। परीक्षा केंद्रों की संख्या भी 1950 के 8 से बढ़कर 2026 में 86 हो गई। 1956-57 में सभी परीक्षाओं में एससी आवेदकों की संख्या 1,713 थी, जो 2023-24 में बढ़कर 4,51,243 हो गई। इसी अवधि में एसटी आवेदकों की संख्या 82 से बढ़कर 1,47,106 हुई।

2025-26 में नई तकनीक, फेस ऑथेंटिकेशन और प्रतिभा सेतु

हाल के वर्षों में यूपीएससी ने परीक्षा सुरक्षा और डिजिटल सेवाओं को भी मजबूत किया है। सितंबर 2025 में NDA एवं NA और CDS परीक्षाओं के दौरान गुरुग्राम के कुछ केंद्रों पर AI आधारित फेस ऑथेंटिकेशन का पायलट किया गया। 24 मई 2026 की सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में इसे बड़े स्तर पर लागू किया गया, जिसमें करीब 5.50 लाख उम्मीदवारों का मोबाइल फोन के जरिए फेस ऑथेंटिकेशन किया गया। सीएसई 2026 से पहले पिछले 15 वर्षों के डेटा की जांच में अतिरिक्त प्रयास पाने के लिए गलत जानकारी देने वाले 569 आवेदकों की पहचान कर उनके आवेदन खारिज किए गए। मई 2025 में यूनिवर्सल रजिस्ट्रेशन नंबर की व्यवस्था लाई गई, जिससे उम्मीदवारों को विभिन्न परीक्षाओं के लिए स्थायी पहचान मिल सके। 2025 में इंटरव्यू बोर्ड का चयन रैंडम सॉफ्टवेयर प्रक्रिया से करने की शुरुआत हुई। 9 जून 2025 को ‘प्रतिभा सेतु’ नाम से सार्वजनिक प्रकटीकरण योजना को नए रूप में शुरू किया गया, जिसके माध्यम से अंतिम सूची में जगह न बना पाने वाले योग्य उम्मीदवारों को सत्यापित नियोक्ताओं से जोड़ने का प्रयास किया जाता है।

एक सदी में परीक्षा से आगे बढ़कर संस्थागत व्यवस्था बनी यूपीएससी

यूपीएससी की यात्रा केवल परीक्षाओं के आयोजन और उम्मीदवारों के चयन तक सीमित नहीं रही है। मेटकाफ हाउस से लेकर धौलपुर हाउस स्थित मुख्यालय और आधुनिक डिजिटल प्रणालियों तक आयोग ने समय के साथ अपनी कार्यप्रणाली बदली है। 1947 में सरदार वल्लभभाई पटेल ने मेटकाफ हाउस में सिविल सेवा प्रोबेशनर्स के पहले बैच को संबोधित किया था और सिविल सेवा को भारत का ‘स्टील फ्रेम’ कहा था। 1972 में किरण बेदी यूपीएससी के माध्यम से भारतीय पुलिस सेवा में चुनी जाने वाली पहली महिला बनीं। 1994 में दृष्टिबाधित उम्मीदवारों के लिए स्क्राइब की सुविधा शुरू हुई। आयोग का संग्रहालय 11 नवंबर 2016 को आम जनता के लिए खोला गया और यहां प्रवेश नि:शुल्क है। इस पूरी शताब्दी में यूपीएससी ने भर्ती प्रक्रिया को प्रतियोगी परीक्षा से आगे बढ़ाकर संवैधानिक स्वतंत्रता, तकनीकी सुरक्षा, पारदर्शिता, भाषाई विकल्प और समावेशी अवसरों से जोड़ने की दिशा में कई संस्थागत बदलाव किए हैं।


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