गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय में ‘प्रेरणा विमर्श 2026’: स्वांत रंजन ने ‘स्व-बोध’ और भारतीय तंत्र पर दिया जोर
टेन न्यूज नेटवर्क
Greater Noida News (20 सितंबर 2026): गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय में आयोजित ‘प्रेरणा विमर्श 2026’ के समापन समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वांत रंजन ने मुख्य वक्तव्य दिया। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, अनिल त्यागी, बृजेंद्र कुमार गुप्त, प्रीति दादू, मोनिका चौहान तथा गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर राणा प्रताप सिंह सहित कई गणमान्य अतिथि और बड़ी संख्या में श्रोता उपस्थित रहे।
अपने संबोधन में स्वांत रंजन ने भारत के गौरवशाली इतिहास, ‘स्व-बोध’, आर्थिक समृद्धि, शिक्षा व्यवस्था तथा स्वतंत्रता के बाद विकसित तंत्र से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखे। उन्होंने युवाओं से देश के इतिहास, संस्कृति और उपलब्धियों को समझने तथा भविष्य के लिए नए सपने गढ़ने का आह्वान किया।
महर्षि अरविंद के चिंतन का किया उल्लेख
स्वांत रंजन ने महर्षि अरविंद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि जो समाज अपने भूतकाल के गौरव, वर्तमान की पीड़ा और भविष्य के सपनों को लेकर चिंतन करता है, वही आगे बढ़ने की दिशा में मजबूत कदम उठा सकता है।
उन्होंने भूतकाल के गौरव को देश के इतिहास, संस्कृति, धर्म तथा उन पूर्वजों के संघर्ष और बलिदान से जोड़ते हुए कहा कि अपनी जड़ों की जानकारी समाज को मजबूती प्रदान करती है। उन्होंने वृक्ष का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस वृक्ष की जड़ें गहरी होती हैं, वह आंधी-तूफान के बीच भी मजबूती से खड़ा रहता है।
इतिहास और शिक्षा व्यवस्था पर रखे विचार
अपने संबोधन में उन्होंने भारत के इतिहास को लेकर प्रचलित कुछ औपनिवेशिक दृष्टिकोणों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने विलियम जोन्स और स्मिथ जैसे यूरोपीय इतिहासकारों का उल्लेख करते हुए कहा कि औपनिवेशिक दौर में भारत के इतिहास और शिक्षा व्यवस्था को लेकर ऐसी धारणाएं प्रस्तुत की गईं, जिनसे भारत की वास्तविक उपलब्धियां और परंपराएं पर्याप्त रूप से सामने नहीं आ सकीं।
उन्होंने आचार्य धर्मपाल की पुस्तक ‘The Beautiful Tree’ का उल्लेख करते हुए भारत की पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था से जुड़े दस्तावेजों की चर्चा की और युवाओं से इतिहास को विभिन्न स्रोतों के आधार पर समझने की अपील की।
भारत की आर्थिक समृद्धि और औपनिवेशिक दौर की चर्चा
स्वांत रंजन ने भारत की ऐतिहासिक आर्थिक स्थिति पर चर्चा करते हुए प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एंगस मैडिसन के आंकड़ों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक शासन से पहले वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी थी और भारत को लंबे समय तक आर्थिक रूप से समृद्ध देश के रूप में जाना जाता था।
उन्होंने औपनिवेशिक शासन के दौरान भारत से संसाधनों के बाहर जाने और ब्रिटेन की औद्योगिक प्रगति से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख किया। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे भारत की आर्थिक और सामाजिक स्थिति के इतिहास को समझें और देश के विकास में अपनी भूमिका तय करें।

RSS के शताब्दी वर्ष और ‘पंच परिवर्तन’ में ‘स्व-बोध’ पर जोर
स्वांत रंजन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष का उल्लेख करते हुए ‘पंच परिवर्तन’ के तहत ‘स्व-बोध’ को महत्वपूर्ण विषय बताया। उन्होंने कहा कि समाज को अपने देश, संस्कृति, परंपराओं और उपलब्धियों के बारे में जानकारी होनी चाहिए।
उन्होंने युवाओं को अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने तथा देश के भविष्य को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने की बात कही।
‘स्वाधीनता’ के साथ ‘स्व-तंत्र’ की अवधारणा पर जोर
स्वांत रंजन ने कहा कि वर्ष 1947 में भारत राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हुआ, लेकिन उनके अनुसार स्वतंत्रता के साथ जिस ‘स्व-तंत्र’ की स्थापना की अपेक्षा थी, उस दिशा में अभी और काम किए जाने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि देश की व्यवस्थाओं और तंत्र को भारतीय विचारों एवं आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने के लिए निरंतर प्रयास जरूरी हैं। उन्होंने इस प्रक्रिया में युवाओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियों से किया संबोधन का समापन
अपने संबोधन के अंत में स्वांत रंजन ने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्ध पंक्तियों का उल्लेख किया—
“हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी,
आओ विचारें आज मिलकर यह समस्याएं सभी।”
इसके बाद उन्होंने—
“रक्खो हिंदू-पन का गर्व, यही ऐक्य भारत का सर्व।
हिंदू निज संस्कृति का त्राण, करो भले ही दे दो प्राण।”
पंक्तियों के साथ अपने संबोधन का समापन किया। उन्होंने मंच पर उपस्थित अतिथियों और कार्यक्रम में शामिल सभी श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।
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