जीवन की सबसे बड़ी पूंजी

विचार लेख | गजानन माली

“जिस थाली में खाओ, उसी में छेद मत करो”—यह केवल कहावत नहीं, बल्कि निष्ठा, कृतज्ञता, विश्वास और सत्यनिष्ठा का जीवन-संदेश है।

भारत सरकार की 34 वर्षों की सेवा तथा Parichowk.com और TEN NEWS NETWORK के लगभग 20 वर्षों के सफर में मुझे अनेक लोगों के साथ काम करने और जीवन के विभिन्न उतार-चढ़ाव देखने का अवसर मिला। इस यात्रा में अनेक ऐसे लोग मिले, जिन्होंने कठिन समय में साथ दिया और विश्वास को मजबूत किया। उनके प्रति आज भी मेरे मन में सम्मान और कृतज्ञता है।

इसके साथ कुछ अनुभव ऐसे भी रहे, जिन्होंने मुझे जीवन को और गहराई से समझने का अवसर दिया। विशेषकर कोरोना काल के दौरान TEN NEWS NETWORK में मिले अनुभवों ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और कर्मों से होती है।

मीठा ज़हर

कुछ लोग जीवन में ज़हर की तरह नहीं, मिठास की तरह प्रवेश करते हैं। उनकी बातें मधुर होती हैं, व्यवहार आत्मीय होता है और विश्वास सहज रूप से बन जाता है। लेकिन समय के साथ कभी-कभी समझ आता है कि हर मिठास अमृत नहीं होती।

सामने का विरोध हमें सावधान करता है, लेकिन विश्वास के पीछे से आया वार भीतर तक सोचने पर मजबूर करता है।

ऐसे अनुभव निश्चित रूप से पीड़ा देते हैं, लेकिन उन्हें कड़वाहट में बदलना उचित नहीं। मैं दूसरों को दोष देने से पहले स्वयं से भी प्रश्न करता हूं—क्या मैंने पर्याप्त सावधानी बरती? क्या मैंने विश्वास के साथ विवेक भी रखा?

यदि कहीं मेरी ओर से अधिक विश्वास रहा, तो उसे स्वीकार करना भी आत्ममंथन का हिस्सा है। जीवन की यही सीख है कि विश्वास कीजिए, लेकिन आंखें और विवेक खुले रखिए।

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कृतज्ञता—एक संस्कार

मेरे लिए कृतज्ञता जीवन का महत्वपूर्ण मूल्य रही है।

सेवानिवृत्ति के बाद आयोजित मेरे कृतज्ञता भोज में मैंने अपने पहले नियोक्ता और पहले मकान मालिक को भी आमंत्रित किया था—सिर्फ इसलिए कि जीवन के एक पड़ाव पर उन्होंने मुझे अवसर और सहारा दिया था।

हम जहां आज हैं, वहां तक पहुंचने में अनेक लोगों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष योगदान होता है। इसलिए सफलता के साथ उन लोगों को याद रखना, जिन्होंने कभी हमारा साथ दिया, हमारे संस्कार का हिस्सा होना चाहिए।

आचरण ही असली आध्यात्मिकता

पूजा, प्रार्थना, ध्यान और जप व्यक्ति को भीतर से बेहतर बनाने के माध्यम हो सकते हैं। लेकिन उनकी सार्थकता हमारे आचरण में दिखाई देती है।

यदि हमारे व्यवहार में सत्य, करुणा, निष्ठा, संयम और कृतज्ञता है, तभी आध्यात्मिक साधना का वास्तविक प्रभाव दिखाई देता है।ईश्वर का नाम लेना सरल है, लेकिन उसके मूल्यों के अनुसार जीवन जीना अधिक कठिन है।

हर व्यक्ति सफलता चाहता है, लेकिन सफलता के साथ एक प्रश्न भी महत्वपूर्ण है—

हमने उसे प्राप्त करने के लिए कौन-सा रास्ता चुना?

धन, पद और प्रतिष्ठा जीवन का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन यदि उन्हें पाने की कीमत हमारे मूल्य और संबंध बन जाएं, तो हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि हमने वास्तव में क्या हासिल किया।

भारतीय दर्शन का कर्म सिद्धांत हमें यही समझाता है कि हमारे कर्म हमारे व्यक्तित्व और भविष्य को प्रभावित करते हैं। परिणाम तुरंत दिखाई दें, यह आवश्यक नहीं; लेकिन कर्म हमारी पहचान अवश्य बनाते हैं।

आगे बढ़ते रहिए

जीवन में कुछ लोग लंबे समय तक साथ चलते हैं, कुछ थोड़ी दूर तक और कुछ रास्ते में अलग हो जाते हैं। हर संबंध और हर अनुभव से कुछ सीखकर आगे बढ़ना ही जीवन की खूबसूरती है।

विश्वास टूटे तो विश्वास करना बंद मत कीजिए—बस उसमें विवेक जोड़ दीजिए।

संबंध निभाइए, लेकिन अपने मूल्यों की कीमत पर नहीं। दूसरों का सम्मान कीजिए, लेकिन अपने आत्मसम्मान को भी महत्व दीजिए।

अंततः व्यक्ति की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि उसने जीवन में क्या पाया, बल्कि इस बात से होती है कि उसे पाने के लिए उसने कौन-सा रास्ता चुना।

धन कमाया जा सकता है, पद प्राप्त किया जा सकता है और प्रतिष्ठा बनाई जा सकती है। लेकिन विश्वास, चरित्र और सत्यनिष्ठा वर्षों में बनते हैं।

यही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है।

The Show Must Go On.

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