तकनीक अदालत तक पहुँच चुकी है, अब प्रश्न है—न्याय का भविष्य कैसा होगा?
लेखक : संदीप कुमार दुबे अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय, भारत
टेन न्यूज नेटवर्क
न्याय केवल किसी विवाद का अंत नहीं है। न्याय उस विश्वास का नाम है, जिसके आधार पर एक नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय के दरवाजे पर दस्तक देता है। जब कोई व्यक्ति अदालत पहुँचता है, तो वह केवल कानून की व्याख्या नहीं चाहता; वह निष्पक्षता, गरिमा, सुरक्षा और सत्य की उम्मीद लेकर आता है।
इक्कीसवीं सदी में जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता मनुष्य के जीवन के लगभग हर क्षेत्र में प्रवेश कर रही है, तब न्यायपालिका भी इस परिवर्तन से अछूती नहीं रह सकती।
आज हमारे सामने एक नया प्रश्न है—
क्या भविष्य में रोबो जज न्याय व्यवस्था का हिस्सा बनेगा?
मेरा उत्तर है—हाँ, लेकिन रोबो जज मानव न्यायाधीश का स्थान नहीं लेगा।
वह न्यायाधीश का सहयोगी होगा।
भविष्य की न्याय व्यवस्था का सबसे उचित सूत्र मेरे विचार में यही है—
“मानव न्यायाधीश + कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित न्यायिक सहायक।”
न्याय की गति और न्याय की गुणवत्ता
भारतीय न्याय व्यवस्था विशाल है। न्यायालयों में बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं। एक मुकदमे के साथ सैकड़ों और कभी-कभी हजारों पृष्ठों के दस्तावेज जुड़े होते हैं। अधिवक्ताओं को कानून की धाराओं के साथ-साथ अनेक पुराने न्यायिक निर्णयों का अध्ययन करना पड़ता है।
न्यायाधीश को प्रत्येक मामले में तथ्यों, साक्ष्यों, दस्तावेजों, कानून और पूर्व निर्णयों का गहन अध्ययन करना पड़ता है।
यह कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ समय लेने वाला भी है।
यहीं कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक बड़ी सहायता बन सकती है।
यदि कोई न्यायिक प्रणाली कुछ ही क्षणों में हजारों पृष्ठों के दस्तावेजों को व्यवस्थित करके यह बता सके कि—
– मामले के मुख्य तथ्य क्या हैं;
– कौन से तथ्य विवादित हैं;
– कौन से दस्तावेज महत्वपूर्ण हैं;
– कौन से कानून लागू हो सकते हैं;
– कौन से पुराने न्यायिक निर्णय प्रासंगिक हैं;
– दोनों पक्षों के मुख्य तर्क क्या हैं;
– किन प्रश्नों पर न्यायालय को निर्णय देना है—
तो न्यायाधीश के पास विचार और न्यायिक विवेक के लिए अधिक समय उपलब्ध होगा।
तकनीक न्याय को तेज कर सकती है, लेकिन न्याय का निर्णय मनुष्य को ही करना चाहिए।
रोबो जज का वास्तविक अर्थ
रोबो जज का अर्थ किसी धातु के बने हुए ऐसे रोबोट से नहीं है जो न्यायालय में बैठकर निर्णय सुनाए।
वास्तविक रोबो जज एक अत्याधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित न्यायिक सहायता प्रणाली हो सकती है।
यह प्रणाली न्यायाधीश को मामले को समझने में सहायता कर सकती है।
वह हजारों दस्तावेजों को पढ़कर आवश्यक सामग्री सामने रख सकती है। वह समान तथ्यों वाले पुराने मामलों की पहचान कर सकती है। वह कानूनी प्रश्नों को अलग कर सकती है। वह दस्तावेजों और साक्ष्यों के बीच संबंध स्थापित कर सकती है।
लेकिन उसका काम होगा—
“सहायता करना, निर्णय करना नहीं।”
न्यायाधीश का स्थान मशीन क्यों नहीं ले सकती?
कानून की किताब में तथ्य दिखाई देते हैं, लेकिन न्यायालय में उन तथ्यों के पीछे मनुष्य का जीवन दिखाई देता है।
एक आपराधिक मामले में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि अपराध हुआ या नहीं। न्यायालय को परिस्थितियों पर भी विचार करना पड़ता है।
एक पारिवारिक विवाद में केवल कानूनी अधिकार नहीं होते; भावनाएँ, बच्चे, परिवार और भविष्य भी जुड़े होते हैं।
एक संपत्ति विवाद में केवल दस्तावेज नहीं होते; कई बार पीढ़ियों का जीवन जुड़ा होता है।
एक संवैधानिक मामले में केवल कानून की भाषा नहीं होती; नागरिकों के मौलिक अधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रश्न होता है।
इन परिस्थितियों में मानवीय संवेदना, अनुभव और न्यायिक विवेक अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
इसीलिए मेरा मानना है—
«“मशीन तथ्यों का विश्लेषण कर सकती है, लेकिन न्याय की मानवीय पीड़ा को उसी अर्थ में अनुभव नहीं कर सकती।”»
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और संविधान
भारत में कोई भी न्यायिक तकनीक संविधान से ऊपर नहीं हो सकती।
भारत का संविधान समानता, स्वतंत्रता, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निष्पक्ष प्रक्रिया तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता जैसे मूल्यों की रक्षा करता है।
यदि भविष्य में न्यायिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता का व्यापक उपयोग होता है, तो उसके लिए स्पष्ट संवैधानिक सीमाएँ निर्धारित करनी होंगी।
किसी व्यक्ति के विरुद्ध केवल मशीन द्वारा दिए गए अनुमान के आधार पर निर्णय नहीं होना चाहिए।
किसी व्यक्ति को यह अधिकार होना चाहिए कि उसके मामले पर मानव न्यायाधीश स्वतंत्र रूप से विचार करे।
और यदि किसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली की सहायता से कोई महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आता है, तो उसकी स्वतंत्र जाँच संभव होनी चाहिए।
भारत में तकनीक संविधान के अधीन होगी, संविधान तकनीक के अधीन नहीं।
सबसे बड़ा खतरा—गलत जानकारी
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में एक गंभीर समस्या ऐसी जानकारी का उत्पन्न होना है जो देखने में सही लगे, लेकिन वास्तव में गलत हो।
कानून के क्षेत्र में यह खतरा और भी गंभीर है।
यदि कोई प्रणाली गलत न्यायिक निर्णय का संदर्भ दे दे, किसी वास्तविक निर्णय का गलत अर्थ निकाल दे या अस्तित्वहीन न्यायिक दृष्टांत प्रस्तुत कर दे, तो उसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं।
इसलिए न्यायिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए मेरा स्पष्ट सिद्धांत होना चाहिए—
«“मशीन द्वारा दिया गया प्रत्येक न्यायिक संदर्भ मूल निर्णय से सत्यापित किया जाना अनिवार्य हो।”»
न्यायालय में सुविधा से अधिक महत्वपूर्ण है सत्य।
न्यायिक गोपनीयता और नागरिक की निजता
न्यायालयों में अत्यंत संवेदनशील जानकारी होती है।
आपराधिक मामलों में व्यक्तिगत विवरण, पारिवारिक मामलों में निजी जानकारी, व्यावसायिक मामलों में व्यापारिक रहस्य और संवैधानिक मामलों में महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेज हो सकते हैं।
इसलिए न्यायिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली में अभिलेखों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
न्यायालय का अभिलेख केवल आँकड़ा नहीं है।
वह नागरिक के अधिकारों और उसके जीवन का हिस्सा है।
इसलिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ मजबूत सुरक्षा व्यवस्था, नियंत्रित पहुँच और स्पष्ट उत्तरदायित्व आवश्यक होगा।
भारतीय भाषाओं में न्याय की नई संभावना
भारत की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उसकी भाषाई विविधता है।
यदि भविष्य की न्यायिक तकनीक हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में प्रभावी रूप से काम कर सके, तो न्याय तक पहुँच का एक नया द्वार खुल सकता है।
एक नागरिक अपने मामले की जानकारी अपनी भाषा में समझ सके, न्यायिक निर्णय का अर्थ अपनी भाषा में पढ़ सके और न्यायालयीन प्रक्रिया को अधिक सरलता से समझ सके—यह न्याय को वास्तव में जनसुलभ बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम होगा।
न्याय तभी पूर्ण अर्थ में जन-न्याय बनेगा, जब आम नागरिक उसे समझ भी सके।
अधिवक्ता की भूमिका भी बदलेगी
रोबो जज के आने से केवल न्यायाधीश की कार्यप्रणाली नहीं बदलेगी।
अधिवक्ताओं की भूमिका भी बदलनी होगी।
भविष्य का अधिवक्ता केवल कानून की धाराएँ याद रखने वाला व्यक्ति नहीं होगा।
उसे कानून के साथ तकनीक को समझना होगा।
उसे यह जानना होगा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा प्रस्तुत जानकारी की जाँच कैसे की जाए। कौन-सा न्यायिक निर्णय वास्तव में प्रासंगिक है, कौन-सा तथ्य महत्वपूर्ण है और मशीन के निष्कर्ष में कहाँ त्रुटि हो सकती है—इन सबकी समझ आवश्यक होगी।
लेकिन इसके साथ एक बात नहीं बदलनी चाहिए—
अधिवक्ता का मूल धर्म न्यायालय के प्रति सत्य और न्याय के प्रति निष्ठा है।
वर्ष 2040 की अदालत : एक कल्पना
कल्पना कीजिए कि वर्ष 2040 में एक अदालत में एक जटिल मामला सुनवाई के लिए आता है।
न्यायाधीश के सामने हजारों पृष्ठों की फाइल है।
न्यायिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली कुछ क्षणों में मामले का संक्षिप्त चित्र प्रस्तुत करती है।
वह बताती है—
मामले के मुख्य तथ्य क्या हैं।
कौन से तथ्य विवादित हैं।
कौन से दस्तावेज निर्णायक हो सकते हैं।
कौन से कानून लागू हो सकते हैं।
कौन से पुराने न्यायिक निर्णय इस मामले से संबंधित हैं।
दोनों पक्षों के प्रमुख तर्क क्या हैं।
न्यायाधीश उस जानकारी को देखता है।
लेकिन वह मशीन के निष्कर्ष को अंतिम सत्य नहीं मानता।
वह अधिवक्ताओं को सुनता है।
गवाहों से प्रश्न करता है।
दस्तावेजों की जाँच करता है।
कानून और संविधान पर विचार करता है।
और अंत में अपना स्वतंत्र निर्णय देता है।
यही न्याय का भविष्य होना चाहिए।
भारत के लिए पाँच मूल सिद्धांत
यदि भारत रोबो जज जैसी न्यायिक प्रणाली विकसित करता है, तो मेरे विचार से पाँच सिद्धांत अनिवार्य होने चाहिए—
पहला — मानव सर्वोच्चता
अंतिम न्यायिक निर्णय मानव न्यायाधीश का हो।
दूसरा — संविधान सर्वोच्च
कृत्रिम बुद्धिमत्ता संविधान से ऊपर नहीं हो सकती।
तीसरा — पूर्ण पारदर्शिता
न्यायिक सहायता प्रणाली के कार्य करने की प्रक्रिया यथासंभव स्पष्ट और जाँच योग्य हो।
चौथा — स्वतंत्र परीक्षण
कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली का नियमित और स्वतंत्र परीक्षण किया जाए।
पाँचवाँ — मानवीय पुनरीक्षण
किसी व्यक्ति के अधिकार केवल मशीन के निष्कर्ष के आधार पर प्रभावित न हों।
भारत दुनिया को रास्ता दिखा सकता है
भारत केवल तकनीकी शक्ति बनने की क्षमता नहीं रखता; भारत के पास न्याय और संवैधानिक मूल्यों की एक गहरी परंपरा भी है।
यदि भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अपनी संवैधानिक व्यवस्था के साथ संतुलित रूप से जोड़ता है, तो वह दुनिया के सामने न्यायिक तकनीक का एक ऐसा मॉडल रख सकता है जिसमें आधुनिकता और मानवीय गरिमा दोनों सुरक्षित हों।
एक ऐसा मॉडल जिसमें—
तकनीक तेज हो,
न्याय निष्पक्ष हो,
प्रक्रिया पारदर्शी हो,
संविधान सर्वोच्च हो,
और
मानव गरिमा केंद्र में हो।
मेरा विश्वास : भविष्य मनुष्य बनाम मशीन का नहीं
मैं नहीं मानता कि भविष्य मनुष्य बनाम मशीन का होगा।
भविष्य मनुष्य और मशीन के सहयोग का होगा।
न्यायपालिका में भी यही होना चाहिए।
मशीन हजारों निर्णय खोज सकती है।
मशीन लाखों पृष्ठों का विश्लेषण कर सकती है।
मशीन तथ्यों को व्यवस्थित कर सकती है।
मशीन विरोधाभासों को पहचान सकती है।
लेकिन न्याय की अंतिम जिम्मेदारी उस मानव न्यायाधीश की होनी चाहिए जो संविधान की शपथ लेकर न्याय की कुर्सी पर बैठता है।
अंतिम शब्द
हो सकता है कि आने वाले वर्षों में अदालतों में कागज कम हो जाएँ और डिजिटल अभिलेख बढ़ जाएँ।
हो सकता है कि न्यायिक अनुसंधान पहले से कहीं अधिक तेज हो जाए।
हो सकता है कि हजारों निर्णय कुछ क्षणों में खोजे जा सकें।
हो सकता है कि भाषा की बाधाएँ बहुत कम हो जाएँ।
लेकिन न्याय की सबसे बड़ी शक्ति किसी मशीन में नहीं होगी।
वह शक्ति होगी—
न्यायाधीश का विवेक।
और न्याय व्यवस्था की सर्वोच्च शक्ति होगी—
भारत का संविधान।
इसीलिए मेरा स्पष्ट मत है—
«“रोबो जज न्याय का मालिक नहीं, न्याय का सहयोगी होगा।”»
«“मशीन तथ्य खोजेगी, कानून सामने रखेगी और न्यायिक प्रक्रिया को गति देगी; लेकिन न्याय का अंतिम निर्णय मानव विवेक, प्राकृतिक न्याय और संविधान की मर्यादा के भीतर ही होगा।”»
आज हमें रोबो जज से डरने की नहीं, बल्कि उसके लिए सही नैतिक, संवैधानिक और कानूनी ढाँचा तैयार करने की आवश्यकता है।
क्योंकि भविष्य की अदालत में मशीन अवश्य होगी—
लेकिन न्याय की कुर्सी पर संविधान की शपथ लेने वाला मानव ही बैठेगा।
— संदीप कुमार दुबे
अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय, भारत
टिप्पणियाँ बंद हैं।