हाई कोर्ट के किस आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय पहुंची डीएम मेधा रूपम

टेन न्यूज नेटवर्क

Greater Noida News (14/09/2026): दिल्ली विश्वविद्यालय की कानून की छात्रा आकृति चौधरी की NSA हिरासत से जुड़ा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक पहुंच गया है। गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें आकृति चौधरी को अवैध रूप से हिरासत में रखने के मामले में 5 लाख रुपये का मुआवजा देने और इसकी भरपाई जिम्मेदार अधिकारियों की निजी सैलरी से करने का निर्देश दिया गया था।

डीएम की ओर से यह चुनौती रविवार को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई। हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक मुआवजे का बोझ सरकारी खजाने पर डालने के बजाय उन अधिकारियों से रकम वसूलने की बात कही गई थी, जिनकी भूमिका आकृति की निरोधात्मक हिरासत की प्रक्रिया में सामने आई थी। इस सूची में जिला प्रशासन और पुलिस के संबंधित अधिकारी शामिल हैं।

मजदूरों के प्रदर्शन से जुड़ा था पूरा मामला

मामला नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों के वेतन और अन्य मांगों को लेकर हुए विरोध-प्रदर्शन से संबंधित है। इसी घटनाक्रम के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी को पुलिस ने हिरासत में लिया था। बाद में उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कार्रवाई की गई।
आकृति की हिरासत को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस और जिला प्रशासन द्वारा पेश किए गए घटनाक्रम तथा हिरासत के आधार की बारीकी से समीक्षा की।

हाई कोर्ट ने पुलिस की कहानी पर उठाए थे गंभीर सवाल

अप्रैल 2026 में इलाहाबाद हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने आकृति चौधरी की NSA हिरासत को कानून के अनुरूप नहीं माना। अदालत के सामने यह तथ्य आया कि आकृति को 11 अप्रैल को ही पुलिस हिरासत में लिया जा चुका था, जबकि जिस हिंसा, आगजनी और उपद्रव को उनके खिलाफ कार्रवाई का आधार बनाया गया, वह 13 अप्रैल को हुआ था।

यही समय-क्रम हाई कोर्ट के फैसले में महत्वपूर्ण आधार बना। अदालत ने सवाल उठाया कि जब संबंधित व्यक्ति कथित हिंसक घटनाओं से पहले ही पुलिस के कब्जे में था, तो बाद में हुई हिंसा के लिए उसे जिम्मेदार ठहराने का आधार क्या था। सुनवाई के दौरान पुलिस और प्रशासन की ओर से लगाए गए गंभीर आरोपों के समर्थन में पर्याप्त ठोस सामग्री पेश नहीं किए जाने पर भी अदालत ने आपत्ति जताई। हाई कोर्ट के मुताबिक आरोपों को पुष्ट करने के लिए अपेक्षित साक्ष्य और वीडियो फुटेज उपलब्ध नहीं कराए जा सके।

गिरफ्तारी के बाद जारी नोटिस पर भी सवाल

मामले की सुनवाई के दौरान BNSS की धारा 130 के तहत जारी किए गए नोटिस की प्रक्रिया भी अदालत की जांच के दायरे में आई। हाई कोर्ट ने पाया कि नोटिस गिरफ्तारी के बाद तैयार किया गया था। अदालत ने इस प्रक्रिया को महज औपचारिकता के तौर पर देखे जाने पर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने प्रशासनिक कार्रवाई के तरीके को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया और माना कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में अधिकारियों को कानून और स्थापित प्रक्रिया का पूरी गंभीरता से पालन करना चाहिए।

‘NSA का इस्तेमाल जमानत के अधिकार को खत्म करने के लिए नहीं’

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में निरोधात्मक हिरासत के प्रावधानों के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि NSA जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को सामान्य आपराधिक मामले में मिलने वाले जमानत के अधिकार से दूर रखने के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा को भी रेखांकित किया। कोर्ट का संदेश था कि केवल आशंका, अनुमान या प्रशासनिक राय के आधार पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने की कार्रवाई को न्यायिक जांच से बाहर नहीं रखा जा सकता।

सरकारी खजाने से नहीं, अधिकारियों की सैलरी से मुआवजे का निर्देश

हाई कोर्ट के आदेश का सबसे अहम हिस्सा 5 लाख रुपये के मुआवजे से संबंधित था। अदालत ने राज्य सरकार को आकृति चौधरी को 5 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि इसकी अंतिम आर्थिक जिम्मेदारी सरकारी खजाने पर नहीं डाली जाएगी। अदालत ने संबंधित अधिकारियों की भूमिका को देखते हुए मुआवजे की रकम उनकी निजी सैलरी से वसूलने का निर्देश दिया। इसमें जिलाधिकारी सहित वे अधिकारी शामिल किए गए, जिनके फैसलों और कार्रवाई को अदालत ने मामले में जिम्मेदार माना। शुरुआती रिपोर्ट तैयार करने वाले थाना प्रभारी (SHO) और प्रकरण की कार्रवाई से जुड़े अन्य पुलिस अधिकारियों की भूमिका भी आदेश के दायरे में आई।

अब सुप्रीम कोर्ट में होगी हाई कोर्ट के आदेश की समीक्षा

डीएम मेधा रूपम के सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद अब इस मामले में हाई कोर्ट के निष्कर्षों और अधिकारियों की व्यक्तिगत वित्तीय जवाबदेही का मुद्दा शीर्ष अदालत के सामने होगा। मामला केवल एक छात्रा की हिरासत तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह बड़ा सवाल भी है कि यदि किसी नागरिक को निरोधात्मक कानून के तहत हिरासत में लेने की प्रक्रिया में प्रशासनिक या कानूनी चूक सामने आती है, तो उसकी जिम्मेदारी किस स्तर तक तय की जानी चाहिए और क्या ऐसी स्थिति में संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत सैलरी से मुआवजा वसूला जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के बाद इस विवाद का अगला कानूनी चरण अब हाई कोर्ट के आदेश की वैधता और उसमें तय की गई व्यक्तिगत जवाबदेही के इर्द-गिर्द केंद्रित रहेगा।


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