लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर परिवार की दखलंदाजी पर दिल्ली HC की दो टूक

टेन न्यूज नेटवर्क

New Delhi News (21 अगस्त 2026): दिल्ली हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि दो बालिग व्यक्ति अगर अपनी इच्छा और सहमति से साथ रह रहे हैं, तो उनके रिश्ते को विवाह जैसी प्रकृति वाला संबंध माना जा सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि माता-पिता, रिश्तेदार या दोस्त केवल अपनी असहमति के आधार पर उनके फैसले में दखल नहीं दे सकते।

जस्टिस सौरभ बनर्जी ने अपने हालिया आदेश में कहा कि प्रत्येक बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद का साथी चुनने और उसके साथ रहने की स्वतंत्रता है। परिवार या समाज की सोच के आधार पर इस व्यक्तिगत अधिकार को छीना नहीं जा सकता।

क्या है पूरा मामला?

करीब 30 साल के एक कपल ने सुरक्षा की मांग को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था। दोनों कुछ समय से साथ रह रहे हैं और उन्होंने अदालत को बताया कि भविष्य में शादी करने का भी उनका इरादा है।

याचिका के मुताबिक, महिला के पिता और भाई इस रिश्ते से नाराज थे। आरोप लगाया गया कि उन्होंने दोनों को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी थी। कपल ने स्थानीय पुलिस से भी शिकायत की, लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने पर उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

लिव-इन को शादी के बराबर नहीं माना

हाईकोर्ट ने यह साफ किया कि दोनों कानूनी रूप से विवाहित नहीं हैं। हालांकि, दोनों के बालिग होने और अपनी स्वतंत्र इच्छा से साथ रहने के कारण उनके रिश्ते को विवाह जैसी प्रकृति वाला संबंध माना जा सकता है।

कोर्ट ने साथ ही स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं है कि लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी विवाह के बराबर दर्जा मिल गया है।

अनुच्छेद 19 और 21 का दिया हवाला

अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 का हवाला देते हुए कहा कि हर व्यक्ति को अपनी पसंद का साथी चुनने और अपनी जिंदगी अपनी इच्छा के अनुसार जीने का अधिकार है।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें बालिग व्यक्तियों को अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने की स्वतंत्रता को मान्यता दी गई है।

परिवार नहीं डाल सकता दबाव

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि जब दो बालिग अपनी इच्छा से साथ रहने का फैसला करते हैं, तो माता-पिता, रिश्तेदार या दोस्तों को उनके निर्णय में बाधा डालने का अधिकार नहीं है। किसी भी व्यक्ति को उनके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए खतरा पैदा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

कपल को पुलिस सुरक्षा देने का आदेश

महिला के परिवार से कथित खतरे को देखते हुए हाईकोर्ट ने दोनों को पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि जरूरत पड़ने पर कपल विजय विहार थाने के एसएचओ या संबंधित बीट कांस्टेबल से मदद ले सकता है।

अगर दोनों किसी दूसरे थाना क्षेत्र में रहने के लिए जाते हैं, तो उन्हें तीन दिन के भीतर संबंधित नए थाना क्षेत्र के एसएचओ को अपने पते की जानकारी देनी होगी। इसके बाद संबंधित पुलिस उन्हें आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराएगी।

व्यक्तिगत आजादी पर हाईकोर्ट का जोर

इस आदेश के जरिए दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि दो बालिग व्यक्तियों का अपनी पसंद का साथी चुनना और अपनी इच्छा से साथ रहना उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। केवल परिवार या समाज की असहमति के आधार पर उनके इस अधिकार में दखल नहीं दिया जा सकता।


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