एसएलबीएस राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय पुरोहित सम्मेलन का भव्य आगाज़

टेन न्यूज नेटवर्क

New Delhi News (26/07/2026): भारतीय ज्ञान-परंपरा, वैदिक संस्कृति और पुरोहित शिक्षा को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने की दिशा में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (एसएलबीएस), नई दिल्ली एवं दिल्ली संस्कृत अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित अंतरराष्ट्रीय पुरोहित सम्मेलन का शनिवार को विश्वविद्यालय परिसर में भव्य शुभारंभ हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार, मंगलाचरण और आध्यात्मिक वातावरण के बीच प्रारंभ हुए उद्घाटन सत्र में देश और विदेश से आए विद्वानों, आचार्यों, पुरोहितों, शोधार्थियों तथा संस्कृत प्रेमियों ने भाग लिया।

सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य भारतीय पुरोहित परंपरा के शास्त्रीय, सांस्कृतिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक स्वरूप का अकादमिक अध्ययन कर उसकी समकालीन प्रासंगिकता तथा वैश्विक उपयोगिता को रेखांकित करना है। इस दौरान सामान्य पूजन, विशिष्ट पूजन, अनुष्ठानिक पूजन, यज्ञ-पूजन, पाठाधि-पूजन तथा वैदिक संस्कारों से जुड़े विभिन्न विषयों पर शोधपरक विमर्श किया गया।

सम्मेलन की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने कहा कि भारतीय पुरोहित परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की सनातन ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिक जीवन-दर्शन की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि वेद, उपनिषद, ब्राह्मण ग्रंथ, स्मृतियां और पुराण मानव जीवन को संस्कारित एवं अनुशासित बनाने का संदेश देते हैं और इन्हीं मूल्यों को समाज तक पहुंचाने का दायित्व पुरोहित समाज निभाता है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में पुरोहितों को केवल कर्मकांड तक सीमित रखने के बजाय उन्हें शास्त्रसम्मत ज्ञान, अनुसंधान, आधुनिक तकनीक, व्यवहारिक प्रशिक्षण और सामाजिक उत्तरदायित्व से भी जोड़ना आवश्यक है। यदि पुरोहित शिक्षा को आधुनिक शोध एवं वैश्विक संवाद के साथ जोड़ा जाए तो भारतीय ज्ञान-परंपरा का प्रभाव विश्व स्तर पर और अधिक सशक्त रूप से स्थापित किया जा सकता है।

प्रो. पाठक ने कहा कि विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान-परंपरा के संरक्षण और संवर्धन के लिए निरंतर कार्य कर रहा है तथा पुरोहित शिक्षा, वैदिक अध्ययन और संस्कृत के विविध आयामों को आधुनिक संदर्भों से जोड़ते हुए नई शैक्षणिक एवं शोधपरक संभावनाओं का विकास कर रहा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह सम्मेलन भारतीय पुरोहित परंपरा को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि पूज्या साध्वी श्री विभानंद गिरि जी महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति की आत्मा वैदिक परंपरा और सनातन संस्कारों में निहित है। उन्होंने युवाओं से संस्कृत, वेद और भारतीय जीवन मूल्यों को अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि पुरोहित समाज हमारी सांस्कृतिक विरासत का वास्तविक संरक्षक है।

मुख्य अतिथि एवं संस्कृत भारती के अखिल भारतीय संगठन मंत्री श्री जयप्रकाश ने कहा कि संस्कृत भाषा और पुरोहित परंपरा एक-दूसरे की पूरक हैं। उन्होंने कहा कि संस्कृत के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए विद्वान, प्रशिक्षित और संस्कारित पुरोहितों की नई पीढ़ी तैयार करना समय की आवश्यकता है। साथ ही उन्होंने वैदिक परंपरा के वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक पक्ष को समाज के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने पर बल दिया।

विशिष्ट अतिथि प्रो. देवी प्रसाद त्रिपाठी ने कहा कि पुरोहित केवल धार्मिक अनुष्ठानों का संचालन करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज का सांस्कृतिक मार्गदर्शक, नैतिक प्रेरक और आध्यात्मिक शिक्षक भी होता है। वहीं सारस्वत अतिथि प्रो. संतोष कुमार शुक्ला और प्रो. वृंदावन दास ने पुरोहित शिक्षा, वैदिक साहित्य और कर्मकांडीय परंपराओं के व्यवस्थित शोध एवं प्रलेखन की आवश्यकता पर अपने विचार रखे।

पुरोहित विभागाध्यक्ष एवं कार्यक्रम संयोजक प्रो. रामराज उपाध्याय ने सम्मेलन की विषय-वस्तु और उद्देश्यों की जानकारी देते हुए कहा कि इस आयोजन का लक्ष्य वैदिक संस्कारों और पूजन पद्धतियों का शोधपरक अध्ययन कर पुरोहित शिक्षा को समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करना है।

सम्मेलन के अंतरराष्ट्रीय सत्र में दक्षिण अफ्रीका के डरबन से श्री अमीचंद महाराज, अध्यक्ष, श्री सनातन धर्म युवक पुरोहित मंडल एवं हिंदू पृष्ठ संगठन, ने प्रवासी भारतीय समाज में वैदिक संस्कारों के संरक्षण में पुरोहितों की भूमिका पर अपने विचार साझा किए। वहीं अमेरिका से श्री शिवराम पोडेल ऑनलाइन माध्यम से जुड़े और भारतीय वैदिक संस्कृति की वैश्विक स्वीकार्यता के साथ प्रशिक्षित पुरोहितों की बढ़ती आवश्यकता पर प्रकाश डाला।

उद्घाटन सत्र के अंत में विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. पवन कुमार शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, विद्वानों, शोधार्थियों, प्रतिभागियों और आयोजन समिति का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय और दिल्ली संस्कृत अकादमी का यह संयुक्त प्रयास भारतीय पुरोहित परंपरा के संरक्षण, संवर्धन और अकादमिक सुदृढ़ीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

उन्होंने कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक के नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि उनके मार्गदर्शन में विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान-परंपरा, संस्कृत अध्ययन और पुरोहित शिक्षा के क्षेत्र में नए मानदंड स्थापित कर रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि सम्मेलन से प्राप्त निष्कर्ष भविष्य में शोध, प्रशिक्षण और वैश्विक सहयोग के नए अवसर प्रदान करेंगे।

सम्मेलन के सफल आयोजन में कार्यक्रम संयोजक प्रो. रामराज उपाध्याय, सह-संयोजक प्रो. वृंदावन दास, आयोजन सचिव डॉ. मधुसूदन शर्मा, समन्वयक डॉ. रविंद्र पांडा तथा सह-समन्वयक डॉ. नीतेश झा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उद्घाटन सत्र का संचालन प्रो. सुंदर नारायण झा ने किया।

सम्मेलन में उपस्थित विद्वानों ने एक स्वर में कहा कि भारतीय पुरोहित परंपरा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक समरसता और वैश्विक मानव कल्याण की महत्वपूर्ण आधारशिला है। उनका मानना था कि इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन से शोध, प्रशिक्षण और वैश्विक सहयोग के नए आयाम खुलेंगे, जिससे भारतीय वैदिक परंपरा को विश्व मंच पर और अधिक सशक्त पहचान मिलेगी।


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