क्या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) दिल्ली में विद्यालयों का समय प्रातः 11:00 बजे से सायं 5:00 बजे तक होना चाहिए?

सिंह संगीता, टेन न्यूज नेटवर्क

ग्रेटर नोएडा (02 जुलाई 2026): उत्तर भारत में घने कोहरे, कड़ाके की ठंड, भीषण गर्मी, लू और लगातार बारिश के कारण समय-समय पर स्कूलों की छुट्टियां घोषित करना या उनकी टाइमिंग बदलना अब आम बात बन गई है। हर वर्ष मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के चलते जिला प्रशासन और सरकारों को अचानक स्कूल बंद करने अथवा समय में बदलाव के आदेश जारी करने पड़ते हैं। इसका प्रभाव केवल विद्यार्थियों की पढ़ाई तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अभिभावकों, शिक्षकों और स्कूल प्रबंधन की दिनचर्या भी प्रभावित होती है।

इसी संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न चर्चा का विषय बना हुआ है—क्या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) दिल्ली में विद्यालयों का समय प्रातः 11:00 बजे से सायं 5:00 बजे तक होना चाहिए? क्या इससे विद्यार्थियों को पर्याप्त नींद, बेहतर एकाग्रता और मौसम संबंधी परेशानियों से राहत मिलेगी, या फिर इससे नई व्यावहारिक समस्याएं उत्पन्न होंगी?

इन्हीं प्रश्नों पर टेन न्यूज नेटवर्क ने ग्रेटर नोएडा के प्रमुख विद्यालयों के प्राचार्यों एवं शिक्षा विशेषज्ञों से विशेष बातचीत की।

दिल्ली वर्ल्ड पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल डॉ. हीमा शर्मा

डॉ. हीमा शर्मा ने 11 बजे से 5 बजे तक स्कूल संचालित करने के प्रस्ताव को पूरी तरह अव्यावहारिक बताया। उन्होंने कहा कि अधिकांश अभिभावक नौकरीपेशा हैं और उनके कार्यालयों का समय नहीं बदलेगा। यदि विद्यालय 11 बजे शुरू होंगे तो सुबह बच्चों की देखभाल करना परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगा।

उन्होंने कहा कि शाम 5 बजे छुट्टी होने के बाद लंबी दूरी तय कर घर पहुंचते-पहुंचते शाम 6:30 बजे या उससे अधिक समय हो जाएगा, जिससे बच्चों के खेलने, विश्राम करने और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों का समय प्रभावित होगा। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि मौसम के अनुसार बदलाव आवश्यक हो तो सुबह 8 बजे से दोपहर 1 बजे तक का समय अधिक उपयुक्त हो सकता है।

उर्सुलाइन कॉन्वेंट स्कूल की प्रिंसिपल सिस्टर रेखा

सिस्टर रेखा ने संतुलित दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि उत्तर भारत लंबे समय से सुबह स्कूल जाने की व्यवस्था का अभ्यस्त है, इसलिए अचानक बदलाव आसान नहीं होगा। उन्होंने बताया कि केरल सहित दक्षिण भारत के कई राज्यों में विद्यालय प्रायः सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक संचालित होते हैं, जबकि गुजरात और महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में भी दोपहर की शिफ्ट का मॉडल अपनाया जाता है।

उन्होंने कहा कि 11 बजे से 5 बजे तक की व्यवस्था के कुछ लाभ भी हैं। सर्दियों में कोहरे और अत्यधिक ठंड से राहत मिल सकती है, लेकिन गर्मियों में दोपहर की भीषण गर्मी बड़ी चुनौती होगी। उनका मानना है कि बार-बार स्कूल की टाइमिंग बदलने से विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होती है, इसलिए सरकार को सभी हितधारकों के साथ वैज्ञानिक आधार पर व्यापक चर्चा करनी चाहिए।

सेंट जोसेफ स्कूल के प्रिंसिपल रेव. फादर जिप्सन पलाट्टी

रेव. फादर जिप्सन पलाट्टी ने इस प्रस्ताव को उत्तर भारत की जलवायु के लिए अनुपयुक्त बताया। उन्होंने कहा कि यहां गर्मियों में तापमान 45 से 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, जबकि दक्षिण भारत का मौसम अपेक्षाकृत संतुलित रहता है। ऐसे में दोपहर 12 बजे से 3 बजे के बीच बच्चों का आवागमन स्वास्थ्य के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है। उन्होंने कहा कि विद्यालयों का संचालन सुबह जल्दी शुरू होकर दोपहर से पहले समाप्त होना अधिक सुरक्षित और व्यावहारिक व्यवस्था है।

प्रज्ञान स्कूल की प्रिंसिपल रुचिका शर्मा

रुचिका शर्मा ने भी 11 बजे से 5 बजे तक विद्यालय संचालित करने के प्रस्ताव का विरोध किया। उन्होंने बताया कि उनके विद्यालय के लगभग 80 प्रतिशत अभिभावक नौकरीपेशा हैं। ऐसे में विद्यालय की समय-सारिणी बदलने से परिवारों की दिनचर्या गंभीर रूप से प्रभावित होगी।

उन्होंने कहा कि आधुनिक विद्यालय मौसम की परिस्थितियों के अनुरूप अपनी व्यवस्थाएं करने में सक्षम हैं। इसलिए बार-बार समय बदलना या स्थायी रूप से 11 बजे से 5 बजे तक का मॉडल अपनाना उचित समाधान नहीं है।

शिक्षिका एवं लेखिका मोहिनी चतुर्वेदी

मोहिनी चतुर्वेदी ने इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि छोटे बच्चों को सुबह जल्दी उठने में कठिनाई होती है। यदि विद्यालय 11 बजे शुरू हों तो उन्हें पर्याप्त नींद मिलेगी और उनकी दिनचर्या अधिक संतुलित हो सकती है।

उन्होंने कहा कि पहले पूरे वर्ष विद्यालयों का समय लगभग स्थिर रहता था, जबकि अब मौसम के अनुसार लगातार बदलाव होने से विद्यार्थियों, अभिभावकों और विद्यालय प्रशासन सभी को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यदि कोई स्थायी, वैज्ञानिक और व्यावहारिक मॉडल तैयार किया जाए तो उस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

व्यापक चर्चा की आवश्यकता

विशेषज्ञों की राय से स्पष्ट है कि विद्यालयों की टाइमिंग बदलने का विषय केवल समय निर्धारण का मुद्दा नहीं है। यह विद्यार्थियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा की गुणवत्ता, अभिभावकों की सुविधा, शिक्षकों की कार्यप्रणाली और संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा हुआ विषय है।

जहां कुछ शिक्षा विशेषज्ञ 11 बजे से 5 बजे तक के मॉडल को भविष्य के लिए एक संभावित विकल्प मानते हैं, वहीं अधिकांश विद्यालय प्रबंधन उत्तर भारत की वर्तमान परिस्थितियों में इसे व्यावहारिक नहीं मानते।

अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या भारत में मौसम के अनुसार अलग-अलग स्थायी स्कूल टाइमिंग लागू की जानी चाहिए? क्या सर्दियों और गर्मियों के लिए अलग-अलग समय-सारिणी तय होनी चाहिए, अथवा वर्तमान व्यवस्था को अधिक वैज्ञानिक और सुव्यवस्थित बनाया जाना चाहिए? इस विषय पर सरकार, शिक्षा विभाग, विद्यालय प्रबंधन, अभिभावकों तथा शिक्षा विशेषज्ञों के बीच व्यापक विमर्श की आवश्यकता महसूस की जा रही है। आपकी क्या राय है? अपने सुझाव और विचार कमेंट के माध्यम से अवश्य साझा करें।


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