26 जून 2026 | टेन न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। भारत वर्ष 2047 तक “विकसित भारत” बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय, सार्वजनिक उपक्रम, निजी क्षेत्र, स्वयंसेवी संस्थाएँ तथा देश का प्रत्येक नागरिक इस राष्ट्रीय संकल्प का भागीदार है। लेकिन इस यात्रा के बीच एक महत्वपूर्ण प्रश्न बार-बार सामने आता है—क्या हमारा शहरी विकास वास्तव में योजनाबद्ध है, या हम अनजाने में “स्मार्ट सिटी” की बजाय “अर्बन जंगल” तैयार कर रहे हैं?
आज़ादी के लगभग आठ दशक बाद भी उन शहरी गाँवों (Urban Villages) के पुनर्विकास के लिए कोई व्यापक राष्ट्रीय नीति दिखाई नहीं देती, जिनकी कृषि भूमि को शहरों में शामिल कर लिया गया। परिणामस्वरूप देश के अनेक महानगरों में अनियोजित निर्माण, संकरी गलियाँ, अवैध बहुमंजिला इमारतें, पार्किंग संकट, जल निकासी की बदहाल व्यवस्था, हरित क्षेत्रों में कमी तथा अग्नि सुरक्षा जैसी गंभीर समस्याएँ तेजी से बढ़ी हैं।
दिल्ली के चिराग दिल्ली, मुनिरका, जामिया नगर, बाबरपुर सहित अनेक पुराने शहरी गाँवों में प्रवेश करते ही महसूस होता है कि राजधानी के भीतर ही बिना समुचित नियोजन के विशाल “कंक्रीट जंगल” विकसित हो चुके हैं। यही स्थिति अब नोएडा, ग्रेटर नोएडा, ग्रेटर नोएडा वेस्ट और यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र के अनेक शहरी गाँवों में भी दिखाई देने लगी है। यदि समय रहते वैज्ञानिक और समग्र शहरी नियोजन नहीं किया गया, तो भविष्य में भूकंप, जलभराव, आग तथा अन्य शहरी आपदाओं का जोखिम और बढ़ सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न जवाबदेही का है। क्या इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है, विकास प्राधिकरणों की, नगर निगमों की या जिला प्रशासन की? दिल्ली में DDA, MCD, NDMC और Cantonment Board जैसी अनेक एजेंसियाँ कार्यरत हैं, लेकिन क्या इनके बीच प्रभावी समन्वय और साझा दृष्टिकोण है?
भारतीय संविधान में जिला योजना समिति (District Planning Committee) का प्रावधान इसलिए किया गया था कि ग्रामीण और शहरी विकास योजनाओं का समन्वय सुनिश्चित हो। लेकिन क्या अधिकांश राज्यों में ये समितियाँ प्रभावी ढंग से कार्य कर रही हैं? क्या वे बढ़ती आबादी, यातायात, जलापूर्ति, सीवरेज, पार्किंग, हरित क्षेत्र, जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक विकास योजनाएँ तैयार कर रही हैं?
एक समय पंचवर्षीय योजनाएँ राष्ट्रीय विकास की दिशा निर्धारित करती थीं। आज विकास का बड़ा हिस्सा बजटीय आवंटन पर आधारित है। लेकिन केवल वित्तीय संसाधनों का आवंटन ही पर्याप्त नहीं है। स्पष्ट लक्ष्य, समयबद्ध कार्ययोजना, मापनीय परिणाम (Key Performance Indicators), नियमित समीक्षा और संस्थागत जवाबदेही के बिना “विकसित भारत 2047” का लक्ष्य प्राप्त करना कठिन होगा।
आज आवश्यकता है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर Urban Village Redevelopment Policy, वैज्ञानिक Land Use Regulation, आधुनिक Parking Policy, Disaster Resilient Urban Planning तथा District Planning Committees को प्रभावी बनाएं। प्रत्येक शहर और जिले के लिए अगले 20–25 वर्षों का एकीकृत मास्टर प्लान स्थानीय समुदाय की भागीदारी से तैयार किया जाए, ताकि विकास टिकाऊ, सुरक्षित, समावेशी और नागरिक-केंद्रित बन सके।
विकसित भारत केवल ऊँची इमारतों, एक्सप्रेसवे और मेट्रो नेटवर्क से नहीं बनेगा, बल्कि सुव्यवस्थित, सुरक्षित, स्वच्छ, हरित और रहने योग्य शहरों से बनेगा। यदि आज भी अनियोजित शहरीकरण पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को “स्मार्ट सिटी” नहीं, बल्कि “अर्बन जंगल” विरासत में मिलेगा।
आपकी राय क्या है?
क्या भारत वास्तव में योजनाबद्ध शहरी विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है, या अनियोजित निर्माण भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है?
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(लेखक गजानन माली भारत सरकार में केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय से संबंधित विषयों तथा तत्कालीन योजना आयोग के आवास एवं शहरी विकास प्रभाग में अनुसंधान अधिकारी रहे हैं। उन्होंने लोकसभा सचिवालय, राज्यसभा सचिवालय, विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों तथा केंद्रीय मंत्रियों के कार्यालयों में भी अपनी सेवाएँ दी हैं। आवास, शहरी नियोजन, सुशासन एवं सार्वजनिक नीति के विषयों पर उनका दीर्घ प्रशासनिक एवं शोध अनुभव रहा है।)
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