दिल्ली की पंढरी: श्री विठ्ठल मंदिर में भक्ति, संस्कृति और सामाजिक एकता अनोखा संगम
लेखक: गजानन माली
टेन न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। भारत की राजधानी दिल्ली अपनी राजनीतिक और प्रशासनिक पहचान के साथ-साथ आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विविधता के लिए भी जानी जाती है। इन्हीं परंपराओं के बीच आर.के. पुरम स्थित श्री विठ्ठल मंदिर आज श्रद्धालुओं के लिए “दिल्ली की पंढरी” के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका है। यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि वारकरी परंपरा, मराठी संस्कृति, समाज सेवा और राष्ट्रीय एकता का जीवंत केंद्र बन गया है।
नाटक के मंच से शुरू हुई एक सांस्कृतिक यात्रा
वर्ष 1971 में दिल्ली में बसे मराठी समाज के कुछ उत्साही युवाओं ने एक मराठी नाटक के मंचन हेतु उपयुक्त स्थान की तलाश शुरू की। उस समय शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि एक छोटे से सांस्कृतिक प्रयास से शुरू हुई यह यात्रा आगे चलकर विठ्ठल भक्ति और सामाजिक समरसता के एक बड़े आंदोलन का रूप ले लेगी।
उसी वर्ष श्री बाजीराव पानसरे के नेतृत्व में श्री विठ्ठल मंदिर संस्थान की स्थापना की गई। इस पहल में श्री दिनकर लूले, श्रीमती मंदाकिनी उपाध्याय, श्री मनोहर उपाध्याय, श्री हरीश पालवनकर, श्री माधव खाडिलकर, श्री माधव नाइक, बाल परिवार, पंचभाई परिवार, काशीकर परिवार, श्री रवींद्र ओक सहित अनेक समाजसेवियों ने सक्रिय योगदान दिया।
महाशिवरात्रि 1971 के अवसर पर सर्वप्रथम भगवान शिव की मूर्ति स्थापित कर एक छोटे मंदिर का निर्माण किया गया। इसके पश्चात भगवान श्री विठ्ठल-रुक्मिणी, श्री गणेश एवं माता दुर्गा की मूर्तियों की स्थापना की गई। नाटक के अभ्यास से शुरू हुई यह पहल धीरे-धीरे हरिपाठ, अभंग गायन, नामस्मरण, कीर्तन, सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा समाज सेवा की गतिविधियों में परिवर्तित हो गई।

मई 1996: भव्य मूर्ति स्थापना का ऐतिहासिक क्षण
मई 1996 में मंदिर के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जुड़ा, जब महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी तथा पूज्य शंकराचार्य जी की गरिमामयी उपस्थिति एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शन में भगवान श्री विठ्ठल-रुक्मिणी की भव्य मूर्ति स्थापना संपन्न हुई।
मूर्ति स्थापना के उपरांत लगभग पाँच दिनों तक धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला आयोजित की गई, जिनमें हरिपाठ, अभंग, कीर्तन, प्रवचन तथा महाप्रसाद के आयोजन शामिल थे। हजारों श्रद्धालुओं की सहभागिता ने इस आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया।
तीन दशकों से सेवा और समर्पण की परंपरा
पिछले तीन दशकों में स्वर्गीय रामचंद्र खपकर, श्री माधव नाइक, श्रीमती मंदाकिनी उपाध्याय, श्री राजू चौहान तथा समर्पित व्यवस्थापन समिति के अथक प्रयासों ने मंदिर को वर्तमान भव्य स्वरूप प्रदान किया है।
आज मंदिर में प्रतिदिन पूजा, आरती, हरिपाठ, अभंग, भजन और सामूहिक नामस्मरण का आयोजन होता है। आषाढ़ी एवं कार्तिकी एकादशी के अवसर पर पूरा मंदिर परिसर “विठ्ठल-विठ्ठल, जय हरी विठ्ठल” के जयघोष से भक्तिमय हो उठता है। देशभर से आने वाले श्रद्धालु भगवान पांडुरंग की भक्ति में एकाकार होकर भारतीय संस्कृति की “विविधता में एकता” की भावना को साकार करते हैं।
श्रद्धालुओं के लिए आधुनिक सुविधाएँ
मंदिर परिसर में बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आवास की व्यवस्था, विशाल सभागार, धार्मिक एवं सामाजिक आयोजनों हेतु आधुनिक सुविधाएँ तथा सामुदायिक कार्यक्रमों के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध है। यही कारण है कि यह मंदिर आज केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक मिलन केंद्र भी बन चुका है।

आषाढ़ी एकादशी 2026 की भव्य तैयारियाँ
25 जुलाई 2026 को आयोजित होने वाले आषाढ़ी एकादशी महोत्सव की तैयारियाँ जोरों पर हैं। लगभग 3,000 श्रद्धालुओं के लिए महाप्रसाद, कीर्तन, भजन, सेवा, स्वयंसेवक प्रबंधन, मीडिया कवरेज तथा अन्य व्यवस्थाओं की व्यापक तैयारी की जा रही है।
मंदिर समिति ने सभी विठ्ठल भक्तों से आर्थिक सहयोग, सामग्री सेवा तथा स्वयंसेवक के रूप में सहभागिता का आग्रह किया है।
दिल्ली की पंढरी: आस्था और संस्कृति का संगम
दिल्ली की तेज़ रफ्तार जिंदगी के बीच श्री विठ्ठल मंदिर श्रद्धा, सेवा, संस्कृति और सामाजिक एकता का ऐसा केंद्र बन गया है, जहाँ प्रत्येक भक्त को पंढरपुर की आध्यात्मिक अनुभूति होती है। यही कारण है कि श्रद्धालु इसे स्नेहपूर्वक “दिल्ली की पंढरी” कहते हैं।
जय हरी विठ्ठल! पांडुरंग हरी!
श्री विठ्ठल मंदिर संस्थान (रजि.)
आर.के. पुरम, नई दिल्ली – 110022
📞 संपर्क
मंदिर कार्यालय: 9891515167
श्री राजू चौहान: 9871515167
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लेखक परिचय:
गजानन माली भारत सरकार के पूर्व अनुसंधान अधिकारी, डिजिटल मीडिया विशेषज्ञ तथा टेन न्यूज़ नेटवर्क के संस्थापक हैं। लेखक पिछले लगभग 30 वर्षों से श्री विठ्ठल मंदिर संस्थान के आजीवन सदस्य रहे हैं। प्रस्तुत लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं।
(लेखक श्री विट्ठल मंदिर के पिछले 30 सालों से आजीवन सदस्य है । भारत सरकार के पूर्व अनुसंधान अधिकारी रहे है ।लेखक के यह निजी विचार है )
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