“शिक्षक वोट दें, लेकिन चुनाव गैर-शिक्षक लड़ें? इस व्यवस्था को हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी”

डॉ. कुलदीप मलिक

मेरठ। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की वर्तमान व्यवस्था को लेकर शिक्षा जगत में एक बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया है। शिक्षक नेता एवं “शिक्षा पर चर्चा” कार्यक्रम के संस्थापक डॉ. कुलदीप मलिक तथा नॉर्थ इंडिया सेल्फ डिफेंस फेडरेशन के निदेशक दुष्यंत त्यागी के नेतृत्व में शिक्षक, प्रबंधक एवं शिक्षा हितैषियों द्वारा एक जनसमर्थन अभियान चलाया जा रहा है, जिसके आधार पर माननीय उच्च न्यायालय में जनहित याचिका (PIL) दायर करने की संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है।

डॉ. कुलदीप मलिक ने कहा कि आज शिक्षक समाज एक सरल लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न पूछ रहा है—जब शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में मतदान करने का अधिकार शिक्षक को है, तो चुनाव लड़ने के लिए शिक्षक होना आवश्यक क्यों नहीं है?

उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि यदि यही व्यवस्था उचित है, तो फिर कल डॉक्टरों के प्रतिनिधि गैर-डॉक्टर, वकीलों के प्रतिनिधि गैर-वकील और किसानों के प्रतिनिधि गैर-किसान भी चुने जा सकते हैं।

डॉ. मलिक ने कहा कि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का उद्देश्य शिक्षकों और शिक्षा जगत की समस्याओं को विधान परिषद तक पहुंचाना है, न कि इसे राजनीतिक प्रयोगशाला बनाना। उन्होंने सवाल उठाया कि जिस व्यक्ति ने कभी ब्लैकबोर्ड नहीं पकड़ा, कभी कक्षा में विद्यार्थियों को नहीं पढ़ाया और शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक चुनौतियों का सामना नहीं किया, वह शिक्षक समाज की आवाज कितनी प्रभावी ढंग से उठा सकता है?

नॉर्थ इंडिया सेल्फ डिफेंस फेडरेशन के निदेशक दुष्यंत त्यागी ने कहा कि यह अभियान किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि एक व्यवस्था पर सवाल उठाने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि शिक्षक समाज अब यह जानना चाहता है कि शिक्षक सीट पर शिक्षक होना अधिक महत्वपूर्ण है या केवल राजनीतिक समर्थन होना।

उन्होंने कहा कि यदि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र वास्तव में शिक्षकों के लिए बनाया गया है, तो उस सीट पर उम्मीदवार की न्यूनतम पात्रता भी शिक्षक होना स्वाभाविक और न्यायसंगत प्रतीत होती है।

अभियान के तहत शिक्षकों, विद्यालय प्रबंधकों एवं शिक्षा हितैषियों से समर्थन एवं सुझाव प्राप्त किए जा रहे हैं। प्राप्त जनमत और कानूनी राय के आधार पर इस विषय को माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष उठाने पर विचार किया जाएगा।

डॉ. कुलदीप मलिक ने शिक्षक समाज से आह्वान करते हुए कहा कि यह केवल एक चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि शिक्षक प्रतिनिधित्व, शिक्षा के सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा विषय है। यदि शिक्षक समाज अपनी आवाज स्वयं नहीं उठाएगा, तो उसके हितों की रक्षा कौन करेगा?


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