भगवान को भी परम भक्तों की अति आवश्यकता : गजानन माली, संस्थापक, टेन न्यूज़ नेटवर्क

टेन न्यूज़ नेटवर्क

नई दिल्ली, 3 जून 2026: “भगवान को भी परम भक्तों की अति आवश्यकता होती है” — प्रथम दृष्टया मेरा यह विचार विरोधाभासी प्रतीत हो सकता है, किंतु यदि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और उपासना-पद्धति का सूक्ष्मता से अवलोकन किया जाए, तो इसके गहन अर्थ उद्घाटित होते हैं। मंदिरों में प्रतिष्ठित देवमूर्तियों की पूजा-अर्चना, अभिषेक, श्रृंगार, नैवेद्य, आरती तथा दैनिक सेवा का संपूर्ण दायित्व परम भक्तों और पुजारियों द्वारा ही निभाया जाता है। इस प्रकार ईश्वर और मानव के मध्य एक अद्भुत, आत्मीय एवं पारस्परिक संबंध परिलक्षित होता है।

जिस प्रकार मंदिर में स्थापित मूर्ति स्वयं अपनी पूजा नहीं कर सकती और उसके लिए पुजारी अथवा परम भक्तों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी केवल अपने बल पर नहीं चलता। जन्म लेते ही सबसे पहले हमारे माता-पिता, जो निस्वार्थ भाव से हमारे सबसे बड़े हितैषी और प्रथम परम भक्त होते हैं, हमारी सेवा करते हैं। इसके पश्चात भाई-बहन, शिक्षक, मित्र, सहकर्मी और समाज के अनेक लोग हमारे जीवन से जुड़ते चले जाते हैं। जीवन के प्रत्येक पड़ाव पर कोई न कोई व्यक्ति हमें संवारने, संभालने और आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जीवन का वास्तविक आधार केवल धन, पद, नाम, प्रतिष्ठा या सम्मान नहीं है। जीवन का सबसे बड़ा धन वे इंसान हैं, जो आवश्यकता पड़ने पर हमारे लिए भगवान के समान खड़े रहते हैं। यदि हम बीमार पड़ जाएँ, असहाय हो जाएँ या किसी संकट में फँस जाएँ, तो उस समय हमें सेवा, प्रेम, त्याग और समर्पण की आवश्यकता होती है। ऐसे क्षणों में न तो पद काम आता है, न प्रतिष्ठा और न ही केवल धन।

धन देकर किसी से सेवा ली जा सकती है, लेकिन प्रेम, आत्मीयता और समर्पण नहीं खरीदा जा सकता। कोई व्यक्ति यदि सम्मान, अपनत्व, त्याग और समर्पण की भावना से आपकी सेवा करता है, तो उसका मूल्य किसी भी धनराशि से नहीं आँका जा सकता। ऐसा व्यक्ति आपको अपना मानता है, आपका सम्मान करता है, आपको प्रिय मित्र, गुरु, परिवार अथवा देवतुल्य समझता है। उसी भावना से वह आपके सुख-दुख में सहभागी बनता है।

इसलिए जीवन में केवल धन अर्जित करना ही पर्याप्त नहीं है। हमें ऐसे संबंध भी बनाने चाहिए जिनमें प्रेम, विश्वास और सेवा की भावना हो। कुछ ऐसे लोग हमारे जीवन में होने चाहिए जिनकी आवश्यकता पड़ने पर हम सेवा कर सकें, और कुछ ऐसे लोग भी होने चाहिए जो आवश्यकता पड़ने पर हमारी सेवा करने के लिए तत्पर रहें। यही स्वस्थ और सार्थक सामाजिक जीवन का आधार है।

मानव जीवन का वास्तविक सौंदर्य पारस्परिक सहयोग, प्रेम, त्याग और समर्पण में निहित है। मनुष्य को मनुष्य की आवश्यकता है, क्योंकि इंसान ही इंसान का सबसे बड़ा सहारा है।

अतः “भगवान को भी परम भक्तों की अति आवश्यकता होती है” और “इंसान को भी भगवान-स्वरूप परम भक्तों की अति आवश्यकता होती है” — इन दोनों कथनों का आशय यह नहीं है कि ईश्वर किसी पर आश्रित हैं, बल्कि यह कि ईश्वर और भक्त का संबंध प्रेम, श्रद्धा और सेवा के माध्यम से अभिव्यक्त होता है। उसी प्रकार मानव जीवन भी प्रेम, सहयोग और समर्पण से ही पूर्णता प्राप्त करता है।

अंततः यही अनुभूति हमें इस सत्य तक पहुँचाती है कि ईश्वर की खोज केवल मंदिरों और तीर्थों में ही नहीं, बल्कि मानव हृदय, मानवीय संवेदनाओं और निस्वार्थ मानव सेवा में भी की जानी चाहिए। जहाँ प्रेम है, सेवा है, त्याग है और करुणा है, वहीं ईश्वर का वास्तविक निवास है।


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