ट्रेड यूनियनों को बदनाम कर रही सरकार, उद्योग बंदी है असली वजह: सीटू गौतमबुद्ध नगर

टेन न्यूज नेटवर्क

Greater Noida News (20/05/2026): सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स (सीटू) गौतमबुद्ध नगर जिला कमेटी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उस बयान की तीखी आलोचना की है, जिसमें उन्होंने ट्रेड यूनियनों को उद्योगों के बंद होने और श्रमिकों की बदहाली के लिए जिम्मेदार बताया था। सीटू नेताओं ने मुख्यमंत्री के बयान को गैर-जिम्मेदाराना, असंवैधानिक और कॉर्पोरेट घरानों के हितों को संरक्षण देने वाला करार दिया है।

जिला कमेटी की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि ट्रेड यूनियन बनाना भारतीय संविधान के अनुच्छेद-19 के तहत श्रमिकों का मौलिक अधिकार है। ऐसे में ट्रेड यूनियनों को उद्योग बंदी के लिए जिम्मेदार ठहराना संविधान की भावना और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। संगठन का कहना है कि फैक्ट्रियां यूनियनों की वजह से नहीं, बल्कि सरकार की नवउदारवादी आर्थिक नीतियों, निजीकरण, नोटबंदी, त्रुटिपूर्ण जीएसटी व्यवस्था, निवेश की कमी और उद्योगों के कुप्रबंधन के कारण बंद हुई हैं।

सीटू नेताओं ने आरोप लगाया कि कानपुर की एनटीसी और बीआईसी जैसी मिलों को बड़े कॉर्पोरेट घरानों को बाजार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बंद किया गया। इसके बाद तत्कालीन सरकारों ने इन मिलों की जमीनों को रियल एस्टेट कारोबारियों के हाथों बेच दिया। संगठन ने कहा कि उद्योग बंद होने के पीछे श्रमिक संगठन नहीं, बल्कि सरकार और पूंजीपतियों की नीतियां जिम्मेदार हैं।

जिला सचिव गंगेश्वर दत्त शर्मा ने कहा कि प्रदेश सरकार उद्योगपतियों को सस्ती दरों पर जमीन, टैक्स में भारी छूट और अन्य सुविधाएं देती है। कुछ वर्षों बाद जब जमीनों की कीमत कई गुना बढ़ जाती है तो उद्योगपति फैक्ट्री बंद कर जमीन बेचकर मुनाफा कमाते हैं और फिर दूसरे क्षेत्रों में नई रियायतों का लाभ उठाते हैं। उन्होंने कहा कि कई बार जब फैक्ट्री बंद होने की स्थिति में पहुंच जाती है, तब मजदूर अपने वेतन, बकाया और अधिकारों की रक्षा के लिए यूनियन बनाते हैं, लेकिन बाद में यह प्रचारित किया जाता है कि यूनियन बनने से उद्योग बंद हुआ।

सीटू ने कहा कि ट्रेड यूनियनें हमेशा मजदूरों के सम्मानजनक वेतन, रोजगार सुरक्षा और श्रमिक अधिकारों की लड़ाई लड़ती रही हैं। कई मामलों में यूनियनों ने बीमार उद्योगों को बचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, क्योंकि सुरक्षित और संतुष्ट श्रमिक ही उत्पादन बढ़ाने में सक्षम होते हैं।

संगठन ने प्रदेश में श्रमिकों की स्थिति को भी चिंताजनक बताया। प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि मजदूर आधुनिक बंधुआ मजदूरी जैसी परिस्थितियों में काम करने को मजबूर हैं। कारखाना अधिनियम में संशोधन कर कार्य अवधि 12 घंटे तक बढ़ा दी गई है। नए लेबर कोड के जरिए न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा और सामूहिक सौदेबाजी जैसे अधिकार कमजोर किए जा रहे हैं। साथ ही पिछले 12 वर्षों से न्यूनतम मजदूरी का संशोधन नहीं किया गया है।

सीटू नेताओं ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री द्वारा नोएडा में वेज बोर्ड गठन, आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं के मानदेय में वृद्धि तथा आउटसोर्स कर्मचारियों के वेतन बढ़ाने की घोषणाएं अब तक लागू नहीं हुई हैं। संगठन ने मुख्यमंत्री से अपने बयान पर पुनर्विचार करने की मांग करते हुए कहा कि सरकार को कॉर्पोरेट हितों की बजाय प्रदेश के लाखों मजदूरों के हित में नीतियां बनानी चाहिए। सीटू का कहना है कि ट्रेड यूनियनों को दोषी ठहराकर सरकार अपनी आर्थिक और नीतिगत विफलताओं से जनता का ध्यान हटाने का प्रयास कर रही है।


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