जेएनयू में फैसलों को लेकर बढ़ा विवाद, राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग

टेन न्यूज़ नेटवर्क

New Delhi News (29 April 2026): जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रशासनिक फैसलों को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन (JNUTA) ने विश्वविद्यालय की मौजूदा कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखा है। इस पत्र में कुलपति शांतिश्री धुलीपुडी पंडित के कई फैसलों को लेकर चिंता जताई गई है। संगठन का कहना है कि हालिया निर्णय विश्वविद्यालय की स्थापित परंपराओं और नियमों के खिलाफ हैं, जिससे शैक्षणिक माहौल प्रभावित हो रहा है।

JNUTA ने अपने पत्र में आरोप लगाया है कि कुलपति के नेतृत्व में लिए जा रहे फैसले न केवल पारदर्शिता की कमी दिखाते हैं, बल्कि विश्वविद्यालय की साख को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। संगठन का मानना है कि इन फैसलों का सीधा असर छात्रों, शिक्षकों और शोध के वातावरण पर पड़ रहा है। इसी वजह से उन्होंने राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि वह अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए मामले में हस्तक्षेप करें और स्थिति को सुधारने के लिए कदम उठाएं।

शिक्षक संघ ने यह भी स्पष्ट किया कि यह पहली बार नहीं है जब इस तरह की शिकायत की गई है। इससे पहले सितंबर और नवंबर 2025 में भी राष्ट्रपति को पत्र भेजे गए थे, जबकि मार्च 2026 में शिक्षा मंत्रालय से भी हस्तक्षेप की मांग की गई थी। बावजूद इसके, संगठन का दावा है कि अब तक कोई ठोस सुधार नहीं हुआ है, जिसके चलते उन्हें दोबारा यह मुद्दा उठाना पड़ा है।

एडमिशन नीति में बदलाव को लेकर भी विवाद गहराया है। हाल ही में कार्यकारी परिषद की बैठक में 5% सुपरन्यूमेरी सीटें शिक्षकों और गैर-शिक्षक कर्मचारियों के बच्चों के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव सामने आया, जिसका JNUTA ने विरोध किया है। संगठन का कहना है कि इससे समान अवसर की अवधारणा प्रभावित होगी। साथ ही, पीएचडी एडमिशन में पहले लागू डिप्रिवेशन प्वाइंट सिस्टम को हटाए जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं, जिससे सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, खासकर महिला छात्रों की संख्या में गिरावट की बात कही गई है।

भर्ती प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। JNUTA का कहना है कि “None Found Suitable (NFS)” नियम का गलत इस्तेमाल कर आरक्षित पदों को खाली रखा जा रहा है। कुछ मामलों में चयन प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद पदों को NFS घोषित कर दिया गया, जबकि अन्य मामलों में सिफारिशों को रोका गया। संगठन ने यह भी आरोप लगाया कि कार्यकारी परिषद की बैठकों में पर्याप्त चर्चा नहीं होती और कई निर्णय जल्दबाजी में लिए जाते हैं, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े हो रहे हैं।


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