गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय में फीस घोटाला! पूर्व रजिस्ट्रार समेत कई लोगों पर FIR दर्ज

टेन न्यूज नेटवर्क

Greater Noida News (11 अप्रैल 2026): ग्रेटर नोएडा स्थित गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय (Gautam Buddha University) में 5 करोड़ रुपये से अधिक की छात्र फीस के कथित गबन (Fee Embezzlement) का बड़ा मामला सामने आया है। इस मामले में थाना इकोटेक-1 (Ecotech-1 Police Station) में तत्कालीन रजिस्ट्रार डॉ. विश्वास त्रिपाठी (Dr. Vishwas Tripathi), लेखा अनुभाग के अधिकारियों तथा अन्य अज्ञात सह-साजिशकर्ताओं के खिलाफ FIR दर्ज कर ली गई है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से दर्ज कराई गई शिकायत में बताया गया है कि डॉ. विश्वास त्रिपाठी ने 28 दिसंबर 2020 को रजिस्ट्रार का पदभार ग्रहण किया था और वे ड्रॉइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर (DDO) के रूप में विश्वविद्यालय के वित्तीय लेनदेन और लेखा अनुभाग की निगरानी के लिए जिम्मेदार थे।

बताया गया कि अप्रैल 2025 में कुलपति के निर्देश पर वित्तीय वर्ष 2024-25 का आंतरिक वित्तीय मिलान (Financial Reconciliation) किया गया। इस दौरान यह सामने आया कि छात्रों से एकत्र की गई 5 करोड़ रुपये से अधिक की फीस विश्वविद्यालय के शुल्क संग्रह सॉफ्टवेयर (Fee Collection Software) में दर्ज तो थी, लेकिन संबंधित राशि विश्वविद्यालय के आधिकारिक बैंक खातों (Official Bank Accounts) में जमा नहीं हुई।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि लेखा अनुभाग के कर्मचारियों ने आउटसोर्सिंग स्टाफ के साथ मिलकर सुनियोजित तरीके से छात्रों द्वारा जमा फीस का गबन किया। आरोप है कि नकली यूपीआई ट्रांजैक्शन आईडी (Fake UPI Transaction ID) और फर्जी रसीदें सॉफ्टवेयर में दर्ज कर दी गईं, जबकि वास्तविक धनराशि विश्वविद्यालय के खाते में जमा नहीं की गई।

टेन न्यूज नेटवर्क से बातचीत में डॉ. विश्वास त्रिपाठी ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि इस मामले में लोगों को भ्रमित किया जा रहा है और यह दुर्भावना से प्रेरित कार्रवाई है। फीस से संबंधित विषय रजिस्ट्रार के अधिकार क्षेत्र का विषय नहीं है और ना ही रजिस्ट्रार इसमें निर्णय लेने के लिए सक्षम है। माननीय लोकायुक्त द्वारा दिनांक 26 दिसंबर 2025 को कुलपति के विरुद्ध नियुक्तियो एवं फीस से संबंधित विषय में किए गए भ्रष्टाचार के शिकायत के एक प्रकरण में मुझे संबंधित अभिलेखों को उपलब्ध कराने के लिए कहा गया था। मेरे द्वारा लोकायुक्त के आदेश के अनुपालन में जब आदेश निकाले गए तभी से कुलपति मेरे विरुद्ध प्रतिशोध की भावना से कार्य कर रहे हैं। जैसे ही मेरे द्वारा उक्त आदेश निकाला गया कुलपति द्वारा प्रतिशोध की भावना से लगभग 2 घंटे बाद ही मुझे कार्य मुक्त कर दिया गया। कुलपति की इस कार्यवाही को मेरे द्वारा माननीय उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। माननीय उच्च न्यायालय द्वारा कुलपति की कार्यवाही को दुर्भावना से प्रेरित मानते हुए कुलपति के आदेश को खारिज कर दिया गया किंतु इसके बाद भी कुलपति द्वारा मुझे कार्यभार ग्रहण नहीं करने दिया गया। माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष विश्वविद्यालय अधिवक्ता द्वारा उच्च न्यायालय को यह आश्वासन दिया गया कि मुझे प्रताड़ित नहीं किया जाएगा।

मेरे द्वारा कुलपति के विरुद्ध मां. उच्च न्यायालय में न्यायालय के आदेश की अवमानना की याचिका दायर की गई है जिसमें दिनांक 6 अप्रैल को कुलपति से माननीय उच्च न्यायालय ने जवाब देने को कहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि उक्त से नाराज होकर प्रतिशोध की भावना से दिनांक 9 अप्रैल को कुलपति द्वारा एक ऐसे प्रकरण में जो रजिस्ट्रार के अधिकार क्षेत्र का विषय ही नहीं है, मुझे जबरदस्ती फंसाने का प्रयास किया जा रहा है। प्रारंभ से ही कुलपति द्वारा उन पर नियुक्तियों में लगे भ्रष्टाचार के आरोपो से ध्यान भटकाने के लिए इस प्रकार के प्रयास किया जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय नियमों में सभी के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) स्पष्ट रूप से निर्धारित होते हैं और फीस से संबंधित विषय रजिस्ट्रार के दायरे में नहीं आते। यह पूर्णतः वित्त विभाग का विषय है जो कुलपति के अंतर्गत कार्य करता है।

डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि वित्तीय मामलों का पूरा दायित्व फाइनेंस ऑफिसर (Finance Officer) और कुलपति (Vice Chancellor) के अधीन होता है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय अधिनियम के अनुसार विश्वविद्यालय में एक फाइनेंस कमेटी (Finance Committee) का गठन होता है, जिसके फाइनेंस ऑफिसर सचिव और कुलपति अध्यक्ष होते हैं तथा वित्तीय निर्णय उसी स्तर पर लिए जाते हैं। रजिस्ट्रार इस समिति का सदस्य नहीं होता। फीस अथवा वित्तीय आय एवं व्यय का पूरा लेखा-जोखा लेखाधिकारी,( Account officer) एवं वित्त अधिकारी द्वारा वित्त समिति ( Finance committee) को हर 6 महीने पर प्रस्तुत किया जाता है तथा कुलपति इसके अध्यक्ष होते हैं।

कुलपति द्वारा वित्त अधिकारी द्वारा प्रस्तुत किए गए रिपोर्ट को स्वीकार करने के उपरांत ही कोई भी वित्तीय निर्णय होते हैं। यदि ऐसी कोई गड़बड़ी हुई है तो वित्त समिति के अध्यक्ष होने के कारण कुलपति का उत्तरदायित्व बनता है। विश्वविद्यालय में फीस से संबंधित कोई भी निर्णय कुलपति के अनुमोदन के उपरांत ही लिया जा सकता है।रजिस्ट्रार इस समिति का सदस्य नहीं होता। अतः कुलपति द्वारा अपने को बचाने के लिए तथा अपने से ध्यान भटकाने के लिए यह सब किया जा रहा है। कुलपति द्वारा उक्त विषय में उच्च अधिकारियों एवं शासन को भी गुमराह करने का प्रयास किया जा रहा है।

पूर्व रजिस्टार ने आगे कहा कि फाइनेंस और अकाउंट्स (Finance and Accounts) उनका डोमेन नहीं है और इस पूरे मामले की जानकारी मिलने पर वह स्वयं भी आश्चर्यचकित (Surprised) हैं। उन्होंने कहा कि कुलपति द्वारा मुझे आधारहीन तथ्यों पर परेशान कर मेरे पर मानसिक दबाव बनाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप पूर्णत दुर्भावना से प्रेरित हैं।

वहीं गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति (Vice Chancellor, GBU) से भी प्रतिक्रिया लेने के लिए संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया।

वहीं इस मामले में डीसीपी ग्रेटर नोएडा (DCP Greater Noida) ने बताया कि शिकायत प्राप्त होने के बाद संबंधित धाराओं में अभियोग पंजीकृत कर लिया गया है और मामले में अन्य विधिक कार्यवाही (Legal Proceedings) प्रचलित है।


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