EPCH आयोजित करेगा भारतीय हस्तकला उत्सव 2026, जीआई-टैग वाले प्रामाणिक भारतीय हस्तशिल्प पर रहेगा फोकस
23 मार्च 2026, कोलकाता: हस्तशिल्प निर्यात संवर्धन परिषद (ईपीसीएच) 26 से 29 मार्च 2026 तक कोलकाता के एक्रोपोलिस मॉल में भारतीय हस्तकला उत्सव 2026 का आयोजन कर रहा है । इस कार्यक्रम को खास तौर पर एक राष्ट्रीय मंच के रूप में तैयार किया गया है, ताकि जीआई (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) टैग वाले हस्तशिल्पों को बढ़ावा दिया जा सके और लोगों को भारत की पारंपरिक शिल्प कला विरासत और जीआई टैग वाले उत्पादों में मौजूद कहानियों के बारे में विस्तार से जागरूक किया जा सके । यह आयोजन एग्जीबिशन-कम-सेल के रूप में होगा, जहां आगंतुक वास्तविक भारतीय हस्तनिर्मित उत्पादों को देख और खरीद सकेंगे ।
यह भव्य आयोजन देशभर से जीआई-टैग वाले हस्तशिल्पों का एक खास कलेक्शन पेश करेगा । जीआई टैग एक तरह का बौद्धिक संपदा अधिकार होता है, जो किसी उत्पाद को उसके मूल जन्म स्थान, उसकी खासियत, पहचान या गुणवत्ता के साथ उसके जुड़ाव का प्रमाण देता है । साथ ही जीआई टैग यह बताता है कि वह उत्पाद उस खास जगह पर बनाया जाता है यही उसकी खासियत है ।
एक्सपो शुरू होने से पहले ईपीसीएच अध्यक्ष डॉ. नीरज खन्ना ने कहा, भारतीय हस्तकला उत्सव 2026 भारत की वास्तविक और क्षेत्र विशेष शिल्प कला का जश्न है, जहां हर एक जीआई-टैग उत्पाद अपने क्षेत्र विशेष की पहचान, वहां के समुदाय की कारीगरी और परंपरा के निर्वहन को साथ लेकर आ रहा है । बहुत बड़ी संख्या में आगंतुकों के आगमन वाले कोलकाता जैसे बड़े प्लेटफॉर्म पर जीआई टैग वाले उत्पादों के कारीगरों और पुरस्कार विजेता शिल्प गुरुओं को लाकर हमारा मकसद जागरूकता बढ़ाना, लोगों के बीच उनकी सराहना और सीधे बाजार से उन्हें जोड़ना है, ताकि कारीगरों की आजीविका को मजबूती मिले और लोग वास्तविक जीआई टैग वाले उत्पादों को खरीदने के लिए प्रेरित हों ।”
डॉ. खन्ना ने आगे कहा, “इस मेले में देशभर से आने वाले जीआई-टैग वाले हस्तशिल्पों का एक समृद्ध और विविध संग्रह देखने को मिलेगा । इसमें भाग लेने वालों में राष्ट्रीय पुरस्कार और शिल्प गुरु पुरस्कार विजेता जीआई टैग वाले उत्पादों के करीब 50 कारीगर शामिल हैं, जो अपने पारंपरिक उत्पाद प्रस्तुत करेंगे, जो भारत की जीवंत सांस्कृतिक विरासत, सामुदायिक ज्ञान व्यवस्था और दीर्घकालिक डिजाइन परंपरा को दर्शाते हैं ।”
ईपीसीएच के उपाध्यक्ष सागर मेहता ने कहा, “जीआई टैग वाले शिल्प केवल विरासत ही नहीं बल्कि मानवीय मूल्यों से जुड़े खास उत्पाद हैं, जिनकी जड़ें सदियों पुरानी हमारी कारीगरी से जुड़ी हैं । भारतीय हस्तकला उत्सव यहां आने वाले आगंतुकों, डिजाइनर्स और रिटेल खरीदारों को एक ही छत के नीचे जीआई टैग्स वाले उत्पादों को देखने का मौका देता है और कारीगरों को सीधे बाजार से जुड़ने का प्लेटफॉर्म भी मुहैया कराता है । हमारा खास ध्यान कारीगरों और उद्यमियों की मदद करना है ताकि वो अपनी बेहतरीन प्रस्तुतियों और स्टोरीटेलिंग से अपनी पहचान बनाते हुए खरीदारों से जुड़े और अपनी पहचान को मांग में बदल सकें ।”
ईपीसीएच की प्रशासनिक समिति (सीओए) के सदस्य और पूर्वी क्षेत्र के संयोजक ओ. पी. प्रहलादका ने कहा, “कोलकाता हमेशा से कला, शिल्प और विरासत से जुड़ा शहर रहा है, जहां हाथ से बने उत्पादों की कद्र रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है, चाहे वो पारंपरिक कपड़े हों, घर की सजावट हो या त्योहारों और लाइफस्टाइल से जुड़ी खरीदारी । भारतीय हस्तकला उत्सव हमें मौका देता है कि हम भारत के जीआई-टैग वाले शिल्प को एक जीवंत और ज्यादा लोगों तक पहुंचने वाली जगह पर लेकर आएं, ताकि परिवार, युवा खरीदार, डिजाइनर और कला प्रेमी असली और क्षेत्रीय उत्पादों को आसानी से देख सकें ।”
यह मेला चारों दिन सुबह 11 बजे से रात 9 बजे तक खुला रहेगा । मेले को बिजनेस-टू-कंज्यूमर (बी2सी) इवेंट के रूप में आयोजित किया जा रहा है । इसका मकसद मौके पर बिक्री को बढ़ावा देना है, साथ ही बड़े खरीदारों, रिटेल ग्राहकों और अन्य प्रोफेशनल्स के लिए भी अच्छे अवसर उपलब्ध कराना है ।
हस्तशिल्प निर्यात संवर्धन परिषद के कार्यकारी निदेशक राजेश रावत ने कहा, “ईपीसीएच लगातार जीआई टैग वाले शिल्प को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहा है और खास तौर पर छोटे और मझोले उद्यमियों, कारीगरों और शिल्पकारों के लिए प्रभावी मार्केटिंग प्लेटफॉर्म तैयार करता रहा है । यह प्रदर्शनी जीआई-टैग वाले उत्पादों की एक खूबसूरत और विविध रेंज पेश करेगी, जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों की खास कारीगरी और एक्सपोर्ट क्वालिटी के हस्तनिर्मित उत्पाद एक ही जगह मिलेंगे । यहां आने वाले लोगों को मधुबनी और मिथिला पेंटिंग, सुजनी कढ़ाई, बिहार की एप्लिक वर्क, पश्चिम बंगाल की पटचित्र और नक्शी कांथा, बिहार के भागलपुर की मंजूषा पेंटिंग, झारखंड की हाथ कढ़ाई और क्रोशिया, ओडिशा की आर्ट मेटलवेयर और इमिटेशन ज्वेलरी जैसे असली शिल्प को करीब से समझने और उन्हें बनाने वाले कारीगरों से सीधे मिलने का अनोखा मौका मिलेगा ।”
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