उच्च न्यायपालिका में सामाजिक विविधता पर गंभीर सवाल, SC-ST-OBC की भागीदारी बेहद कम
टेन न्यूज नेटवर्क
National News (07 फरवरी 2026): संसद को गुरुवार 5 फरवरी को सूचित किया गया कि वर्ष 2021 से जनवरी 2026 के बीच देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में नियुक्त किए गए 593 न्यायाधीशों में से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से आने वाले न्यायाधीशों की संख्या बेहद कम है। यह जानकारी राज्यसभा में डीएमके सांसद पी. विल्सन के प्रश्न के लिखित उत्तर में संसदीय कार्य एवं कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने दी।
मंत्री ने बताया कि सिफारिशकर्ताओं द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार 1 जनवरी 2021 से जनवरी 2026 के बीच नियुक्त 593 न्यायाधीशों में से केवल 26 अनुसूचित जाति, 14 अनुसूचित जनजाति, 80 अन्य पिछड़ा वर्ग और 37 अल्पसंख्यक वर्ग से संबंधित हैं। इसी अवधि के दौरान देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में 96 महिलाओं को न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया।
न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सरकार का पक्ष रखते हुए अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि प्रक्रिया ज्ञापन के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के प्रस्ताव शुरू करने की जिम्मेदारी भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास होती है, जबकि उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के प्रस्ताव संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा आरंभ किए जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार न्यायपालिका में सामाजिक विविधता बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से लगातार अनुरोध करती रही है कि नियुक्तियों के लिए SC, ST, OBC, अल्पसंख्यक और महिला वर्ग के योग्य उम्मीदवारों पर उचित विचार किया जाए।
मंत्री के जवाब पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए डीएमके नेता और राज्यसभा सांसद पी. विल्सन ने उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में सामाजिक प्रतिनिधित्व की कमी को लेकर गहरी चिंता जताई। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए लिखा, “हमारे संविधान के 76वें वर्ष में प्रवेश करते हुए उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की संरचना में चिंताजनक रुझान बने हुए हैं, जहां समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व लगातार घट रहा है। उच्च न्यायालयों में विविधता की स्पष्ट कमी है, जो भारत जैसे अद्भुत रूप से विविध और बहुलवादी समाज को प्रतिबिंबित नहीं करती। कई सामाजिक समूह उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में कम प्रतिनिधित्व रखते हैं। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की भर्ती प्रक्रिया में स्पष्ट भेदभाव दिखाई देता है।
केंद्रीय कानून मंत्री @arjunrammeghwal द्वारा 2021–2026 के लिए विभिन्न उच्च न्यायालयों में न्यायाधीश पदों पर OBC, SC और ST समुदायों के बेहद कम प्रतिनिधित्व से जुड़े आंकड़े देखकर मैं गहराई से स्तब्ध और दुखी हूं। 01.01.2021 से 30.01.2026 के बीच नियुक्त 593 न्यायाधीशों में से केवल 26 अनुसूचित जाति, 14 अनुसूचित जनजाति और 80 अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित हैं।
प्रतिशत इस प्रकार हैं-
2021–2026 (कुल: 593)
SC: 4.38%
ST: 2.36%
OBC: 13.49%
अग्रणी/उच्च जाति: 79.76%
2018 से 30.10.2024 की अवधि में भी स्थिति उतनी ही निराशाजनक रही। यह दर्शाता है कि वंचित वर्गों के अधिकारों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं हो पा रही है। एक संकीर्ण और समरूप न्यायिक समूह समाज की विविध सोच, संस्कृति और पीढ़ीगत अंतर को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं कर सकता।
अधिक विविध न्यायपालिका अत्यंत आवश्यक है। ऐतिहासिक रूप से शोषित वर्गों के न्यायाधीशों की कमी योग्यता या उपलब्धता की कमी नहीं, बल्कि उन्हें न्यायपालिका से दूर रखने के एक ठोस निर्णय की ओर इशारा करती है।
वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली में कुछ वर्गों का अत्यधिक प्रतिनिधित्व इसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है। उच्च न्यायपालिका केवल उच्च जातियों का विशेषाधिकार नहीं है। माननीय प्रधानमंत्री @narendramodi से आग्रह है कि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में संवैधानिक संशोधन कर OBC, SC और ST को आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिया जाए, ताकि न्यायपालिका में वास्तविक सामाजिक विविधता सुनिश्चित हो सके।”
पी. विल्सन के इस बयान के बाद एक बार फिर देश की उच्च न्यायपालिका में सामाजिक संतुलन, प्रतिनिधित्व और कॉलेजियम प्रणाली की पारदर्शिता को लेकर बहस तेज हो गई है।।
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