ग्लोबल ब्रांड्स पर सवाल: क्या भारत ‘लो-क्वालिटी डंपिंग ग्राउंड’ बन चुका है?

टेन न्यूज नेटवर्क

National News (17/01/2026): अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स द्वारा भारत में कम गुणवत्ता वाले उत्पाद बेचने का आरोप लगातार गंभीर होता जा रहा है। हाल ही में उपभोक्ता रिपोर्ट्स और फूड टेस्टिंग डेटा में सामने आया है कि कई ग्लोबल कंपनियाँ भारत में वही उत्पाद सस्ते और कमजोर फॉर्मूले में बेच रही हैं, जिन्हें यूरोप और अमेरिका में उच्च मानकों के साथ उपलब्ध कराया जाता है। यह अंतर सिर्फ खाद्य पदार्थों में नहीं, बल्कि कारों, कॉस्मेटिक्स और पैकेज्ड फूड तक फैला हुआ है।

फूड कंपनियों पर सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं। लोकप्रिय प्रोडक्ट्स जैसे Dairy Milk, Lays, Nutella और Cerelac में भारत के लिए फॉर्मूला बदला जाता है। चॉकलेट्स में अधिक शुगर और सस्ते फैट, चिप्स में ज्यादा पाम ऑयल और कम पोटैटो कंटेंट, स्प्रेड में कम हेज़लनट और ज्यादा कृत्रिम सामग्री, और बेबी फूड में कम न्यूट्रिशन और अधिक एडिटिव्स पाए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कंपनियाँ भारतीय उपभोक्ताओं को “प्राइस-सेंसिटिव” मानकर क्वालिटी पर समझौता कर देती हैं।

ऑटोमोबाइल सेक्टर में भी स्थिति चिंताजनक है। कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत में उसी मॉडल का लो-सेफ्टी वर्ज़न लॉन्च करती हैं, जो विदेशों में 5-स्टार सुरक्षा रेटिंग प्राप्त करता है। भारत में एयरबैग की संख्या कम कर दी जाती है, बॉडी शेल कमजोर होती है, और कई अहम सुरक्षा फीचर हटा दिए जाते हैं। ग्लोबल NCAP की रिपोर्ट्स दिखाती हैं कि भारत में बिकने वाली कई कारें क्रैश टेस्ट में बुरी तरह फेल हुई हैं, जबकि उनके यूरोपीय वर्ज़न सुरक्षित माने जाते हैं।

यह सवाल सिर्फ ब्रांड्स की मंशा पर नहीं, बल्कि भारत की सिस्टम पर भी उठता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कमजोर रेगुलेशन, ढीली निगरानी और धीमी कानूनी प्रक्रिया विदेशी कंपनियों को यहां ढील देती है। उपभोक्ता जागरूकता भी कम है—लोग अक्सर पैकिंग, न्यूट्रिशन लेबल और सुरक्षा रेटिंग जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज कर देते हैं। नतीजा यह कि कंपनियाँ क्वालिटी कम करके भी आसानी से उत्पाद बेच लेती हैं।

भारत को “डंपिंग ग्राउंड” बनने से रोकने के लिए कड़े कदम जरूरी हैं। सरकार को सख्त स्टैंडर्ड लागू करने होंगे, फूड एवं कार सेफ्टी नियमों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लाना होगा और कंपनियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी होगी। उपभोक्ताओं को भी जागरूक होकर सवाल पूछने और क्वालिटी मांगने की जरूरत है। जब तक बाजार में पारदर्शिता नहीं बढ़ेगी और उपभोक्ता दबाव नहीं बनेगा, तब तक भारत में लो-क्वालिटी उत्पादों का सिलसिला जारी रहेगा।

डिस्क्लेमर: यह लेख / न्यूज आर्टिकल सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध जानकारी और प्रतिष्ठित / विश्वस्त मीडिया स्रोतों से मिली जानकारी पर आधारित है।यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। पाठक कृपया स्वयं इस की जांच कर सूचनाओं का उपयोग करे ॥


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