उपभोक्ता न्यायालयों में बढ़ती देरी: त्वरित न्याय की मंशा पर सवाल

रंजन अभिषेक ,संवाददाता, टेन न्यूज नेटवर्क

 

National News (15 January 2026): भारतीय उपभोक्ता संरक्षण कानून का मूल उद्देश्य उपभोक्ताओं को शोषण के खिलाफ एक सरल, सस्ता और समयबद्ध न्याय मंच उपलब्ध कराना था। लेकिन मौजूदा हालात इस उद्देश्य से काफी अलग नजर आ रहे हैं। जिस उपभोक्ता न्याय प्रणाली में 3 से 5 महीने के भीतर मामलों के निपटारे का प्रावधान है, वहां अब लगातार देरी देखने को मिल रही है।

भारत में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर त्रि-स्तरीय अर्ध-न्यायिक उपभोक्ता आयोगों की स्थापना की गई है। इस व्यवस्था के अंतर्गत सामान्य मामलों का निपटान 3 महीने और प्रयोगशाला परीक्षण से जुड़े मामलों का निपटान 5 महीने में किया जाना अनिवार्य है। इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को जटिल न्यायालयी प्रक्रियाओं से बचाकर शीघ्र राहत देना था।

हालांकि, वर्ष 2024-2025 के आंकड़े उपभोक्ता आयोगों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। जनवरी 2024 तक देशभर के उपभोक्ता आयोगों में 5.43 लाख से अधिक मामले लंबित पाए गए। वर्ष 2024 और 2025 के शुरुआती रुझानों से यह भी सामने आया है कि नए मामलों की संख्या, निपटाए गए मामलों से अधिक रही। अकेले वर्ष 2024 में लंबित मामलों में करीब 15 हजार नए मामले जुड़ गए।

देरी का एक बड़ा कारण आयोगों में रिक्त पदों की समस्या भी है। जिला और राज्य उपभोक्ता आयोगों में अध्यक्षों और सदस्यों के सैकड़ों पद खाली पड़े हैं। निर्णायक अधिकारियों की कमी का सीधा असर मामलों की सुनवाई और निपटारे की गति पर पड़ रहा है।

इसके अलावा बुनियादी ढांचे की कमी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। कई जिलों में पर्याप्त न्यायालय कक्ष, सहायक स्टाफ और आधुनिक डिजिटल सुविधाओं का अभाव है। प्रक्रिया को सरल बनाने के बावजूद नोटिस की तामील में देरी, बार-बार स्थगन और विशेषज्ञ साक्ष्यों की लंबी प्रक्रिया मामलों को लंबा खींच देती है। वहीं, जिला आयोगों के फैसलों के खिलाफ बढ़ती अपीलों की संख्या भी त्वरित न्याय के उद्देश्य को कमजोर कर रही है।

न्याय में हो रही देरी का सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। लंबे समय तक चलने वाले मामलों से उपभोक्ताओं का इस व्यवस्था से भरोसा कम होता जा रहा है। छोटे दावों के लिए लंबी कानूनी लड़ाई आर्थिक और मानसिक रूप से बोझिल साबित होती है, जिसका फायदा कई बार कंपनियां उठाकर जवाबदेही से बच निकलती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिति सुधारने के लिए ठोस कदम उठाने जरूरी हैं। आयोगों में रिक्त पदों को शीघ्र भरना, ई-दाखिल प्रणाली और वर्चुअल सुनवाई को प्रभावी ढंग से लागू करना तथा जटिल मामलों के लिए विशेषज्ञों का स्थायी पैनल बनाना समय की मांग है।

उपभोक्ता न्याय में देरी केवल न्याय न मिलने की समस्या नहीं है, बल्कि यह बाजार में अनुचित व्यापार प्रथाओं को भी बढ़ावा देती है। डिजिटल और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले भारत के लिए एक मजबूत, प्रभावी और त्वरित उपभोक्ता न्याय तंत्र का होना बेहद आवश्यक है।।


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