National News (13/01/2026): गुजरात के वेरावल में स्थित सोमनाथ मंदिर हिंदुओं के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है। इसे भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से सबसे पहला ज्योतिर्लिंग कहा जाता है। यह मंदिर एक बहुत ही खास जगह पर बना है जिसे “त्रिवेणी संगम” कहते हैं, जहाँ तीन नदियाँ कपिला, हिरण और सरस्वती आपस में मिलती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर को सबसे पहले खुद चंद्रमा ने बनवाया था। लेकिन अगर हम इतिहास और ज़मीन की खुदाई से मिले सबूतों को देखें, तो पता चलता है कि पिछले 1000 सालों में इस मंदिर को कई बार बनाया गया, कई बार हमलावरों ने इसे तोड़ा और फिर से इसका पुनर्निर्माण किया गया।
इतिहास के पन्नों में सोमनाथ मंदिर का जिक्र 9वीं शताब्दी से मिलता है, जब राजा नागभट्ट द्वितीय का शासन था। जमीन की खुदाई और ऐतिहासिक सबूतों से पता चलता है कि 10वीं शताब्दी तक यहाँ पत्थरों से बना एक शानदार मंदिर मौजूद था। माना जाता है कि चालुक्य राजा मूलराज ने इस मंदिर को बनवाया था या इसकी मरम्मत करवाई थी। उस समय से ही यह मंदिर अपनी भव्यता और समृद्धि के लिए पूरी दुनिया में मशहूर था।
अपनी अपार संपत्ति के कारण यह मंदिर कई विदेशी हमलावरों के निशाने पर रहा। साल 1026 में महमूद गजनी ने मंदिर पर हमला किया, यहाँ की मूर्तियों को नुकसान पहुँचाया और करीब 2 करोड़ दीनार की संपत्ति लूट ली। इसके बाद भी मंदिर पर हमलों का सिलसिला थमता नहीं रहा। राजा कुमारपाल ने इसे दोबारा बनवाया, लेकिन बाद के सालों में अलाउद्दीन खिलजी, जफर खान, महमूद बेगड़ा और अंत में मुगल शासक औरंगजेब ने भी इस मंदिर को भारी नुकसान पहुँचाया।
जब मुख्य मंदिर खंडहर बन गया, तब साल 1783 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने मूल मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर एक नया मंदिर बनवाया। इसे आज “पुराना सोमनाथ मंदिर” कहा जाता है। एक दिलचस्प किस्सा अंग्रेजों के समय का भी है; साल 1842 में एक ब्रिटिश गवर्नर ने अफगानिस्तान से कुछ दरवाजे वापस मंगवाए, यह सोचकर कि वे सोमनाथ के लूटे हुए चंदन के दरवाजे हैं। लेकिन बाद में पता चला कि वे दरवाजे सोमनाथ के थे ही नहीं, और आज भी वे आगरा के किले में रखे हुए हैं।
आज हम जिस भव्य सोमनाथ मंदिर को देखते हैं, उसका निर्माण भारत की आज़ादी के बाद हुआ। साल 1947 में जूनागढ़ के भारत में मिलने के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने मंदिर को फिर से बनाने का संकल्प लिया। महात्मा गांधी ने भी इसका समर्थन किया लेकिन उन्होंने कहा कि इसके लिए पैसा सरकार नहीं बल्कि जनता दान में दे। अंत में कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की देखरेख में काम पूरा हुआ और 11 मई 1951 को भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने यहाँ मूर्ति की स्थापना की।
सोमनाथ मंदिर का वास्तुशिल्प इतिहास हमें बताता है कि इस जगह पर इंसानों का बसेरा बहुत पुराना है, जो हड़प्पा सभ्यता से भी पहले के समय का है। आज हम जिस मंदिर को देखते हैं, उसका निर्माण 1951 में पूरा हुआ था। यह मंदिर उन सैकड़ों सालों की कोशिशों का नतीजा है, जिसमें विदेशी आक्रमणों के बाद इसे बार-बार फिर से खड़ा किया गया। आज यह न केवल एक बहुत बड़ा तीर्थ स्थल है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत और अटूट आस्था का प्रतीक भी बन चुका है। वर्तमान में सरकार भी इस पूरे इलाके को और बेहतर बनाने, पर्यटन को बढ़ावा देने और यहाँ की सुविधाओं को आधुनिक बनाने के लिए कई नई योजनाएँ चला रही है।
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