POCSO कानून के गलत इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता, ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ जोड़ने की सलाह

टेन न्यूज नेटवर्क

National News (13/01/2026): भारत के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में चिंता जताई है कि पॉक्सो (POCSO) कानून का गलत इस्तेमाल हो रहा है। कोर्ट ने सरकार को सलाह दी है कि कानून में एक नया नियम जोड़ना चाहिए जिसे “रोमियो-जूलियट क्लॉज” कहा जा रहा है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि अगर दो टीनएजर्स अपनी मर्जी से किसी रिश्ते में हैं, तो उन्हें अपराधी न माना जाए। कोर्ट चाहता है कि कानून में ऐसी व्यवस्था हो जो मर्जी से बने आपसी रिश्तों और जबरदस्ती किए गए शोषण के बीच फर्क कर सके।

“रोमियो-जूलियट क्लॉज” का मतलब एक ऐसी कानूनी छूट से है, जो लगभग एक ही उम्र के टीनएजर्स के बीच आपसी मर्जी से बने शारीरिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखती है। फिलहाल भारत में कानून के मुताबिक सहमति की उम्र 18 साल है। इसका मतलब यह है कि अगर कोई 18 साल से कम उम्र का है, तो कानून उसकी “हाँ” को मान्य नहीं मानता और ऐसे किसी भी कृत्य को “बलात्कार” (Statutory Rape) की श्रेणी में रखा जाता है।

आपको यह जानकर हैरानी हो सकती है कि भारत में सहमति की उम्र हमेशा से 18 साल नहीं थी। साल 2013 से पहले, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 के तहत यह उम्र 16 साल हुआ करती थी। लेकिन 2013 में कानून में हुए एक बड़े बदलाव के बाद इसे बढ़ाकर 18 साल कर दिया गया, जिससे 16 से 18 साल के बीच के किशोरों के आपसी रिश्ते भी कानूनी तौर पर अपराध बन गए।

इस क्लॉज का समर्थन करने वालों का कहना है कि 16 से 18 साल की उम्र तक आते-आते टीनएजर्स में इतनी समझ आ जाती है कि वे अपने रिश्तों के बारे में फैसले ले सकें। उनका तर्क है कि POCSO कानून बच्चों को शोषण और शिकार होने से बचाने के लिए बना था, न कि उन किशोरों को सजा देने के लिए जो एक-दूसरे की पसंद से रिश्ते में हैं। दुनिया के कई देशों जैसे ब्रिटेन और कनाडा में भी सहमति की उम्र 16 साल ही है।

दूसरी ओर, कुछ लोग इस बदलाव को खतरनाक मानते हैं। आलोचकों का कहना है कि अगर उम्र की सीमा कम की गई, तो इससे बच्चों की तस्करी और यौन शोषण का खतरा बढ़ सकता है। साथ ही, अभी 18 साल की एक साफ कानूनी सीमा है, जिससे फैसला लेना आसान होता है। अगर नया नियम आता है, तो सब कुछ जज की निजी राय पर निर्भर हो जाएगा, जिससे अलग-अलग मामलों में फैसलों में पक्षपात या असमानता आ सकती है।

यह पूरी बात इस बात पर टिकी है कि बच्चों को बुरे लोगों और यौन शोषण से कैसे बचाया जाए, और साथ ही उन टीनएजर्स की मर्जी का सम्मान कैसे किया जाए जो अब काफी समझदार हो चुके हैं। यह एक संतुलन बनाने की कोशिश है ताकि सुरक्षा भी बनी रहे और युवाओं की आजादी भी न छिने। कानून के नजरिए से देखें तो यहाँ एक खास फर्क है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 यह कहती है कि अगर 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाए जाते हैं, तो उसे बलात्कार माना जाएगा, भले ही लड़की की मर्जी शामिल हो। दूसरी ओर, पॉक्सो (POCSO) कानून थोड़ा अलग है क्योंकि यह जेंडर-न्यूट्रल है, यानी यह लड़कों और लड़कियों दोनों पर एक समान लागू होता है।

डिस्क्लेमर: यह लेख / न्यूज आर्टिकल सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध जानकारी और प्रतिष्ठित / विश्वस्त मीडिया स्रोतों से मिली जानकारी पर आधारित है।यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। पाठक कृपया स्वयं इस की जांच कर सूचनाओं का उपयोग करे ॥


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