उत्तर भारत में 70 कत्ल करने वाला ‘कनपटी मार’ शंकारिया को मौत की सजा

टेन न्यूज नेटवर्क

National News (13/01/2026): 1970 के दशक की शुरुआत में राजस्थान, हरियाणा और पंजाब के इलाकों में एक रहस्यमयी कातिल का खौफ फैल गया था। लोग इस कातिल से इतना डरते थे कि सूरज ढलते ही घरों में दुबक जाते थे। इस कातिल को लोग “कनपटी मार” के नाम से जानते थे। उसे यह नाम उसके काम करने के खास तरीके की वजह से मिला था। वह रात के अंधेरे में सोते हुए लोगों पर हमला करता था और हथौड़े या लोहे की रॉड से उनके कान के ठीक नीचे यानी ‘कनपटी’ पे वार करता था। साल 1971 से 1973 के बीच उसने लगभग 70 लोगों की जान ले ली थी, जो भारत के इतिहास की सबसे खौफनाक आपराधिक घटनाओं में से एक मानी जाती है।

इस मामले में सबसे बड़ा मोड़ 9 सितंबर 1973 को आया, जब राजस्थान के सादुल शहर के एक गुरुद्वारे में सो रहे तीन सेवादारों पर हमला हुआ। इस हमले में दो लोगों की मौत हो गई, जबकि एक सेवादार जो देख नहीं सकते थे बच गए, लेकिन वे कातिल को पहचान नहीं पाए। जाँच के दौरान पुलिस को वहाँ चोरी के निशान मिले और सबसे महत्वपूर्ण सुराग एक लोहे के डिब्बे पर खून से सने उंगलियों और पैरों के निशान मिले। उस दौर में भारत में इस तरह के वैज्ञानिक सबूत फोरेंसिक एविडेंस मिलना बहुत बड़ी बात थी।

पुलिस की मेहनत तब रंग लाई जब उन्हें एक गवाह मिला, जिसने गुरुद्वारे में हुए कत्ल वाली सुबह एक अनजान शख्स को रेलवे ट्रैक के पास देखा था। पूछताछ में पता चला कि उस संदिग्ध ने पंजाब के बठिंडा की टिकट खरीदी थी। पुलिस ने हमले में बचे हुए लोगों से मिली जानकारी के आधार पर एक स्केच तैयार करवाया। यह स्केच रतन लाल नाम के एक आदमी से मेल खाता था, जिसे बाद में ‘शंकारिया’ के नाम से जाना गया। आखिरकार, 3 जुलाई 1974 को उसे बठिंडा रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया गया।

गिरफ्तारी के बाद शंकारिया ने एक-दो नहीं, बल्कि 72 कत्ल करने की बात कबूल कर ली। उसने बताया कि वह समाज और परिवार से ठुकराया हुआ था और छोटी-मोटी चोरियों से उसने अपराध की शुरुआत की थी। उसने एक बहुत ही डरावनी बात कही कि शुरू में उसने पैसों के लिए कत्ल किए, लेकिन बाद में उसे लोगों के चीखने की आवाजें पसंद आने लगीं और यह उसके लिए एक नशे जैसा बन गया। वह हर कत्ल के बाद अपने पाप धोने के लिए हरिद्वार जाकर गंगा में स्नान भी करता था।

शंकारिया का केस भारत के सबसे तेज चलने वाले मुकदमों में से एक था। पुख्ता सबूतों और उसके जुर्म कबूल करने के बाद उसे फांसी की सजा सुनाई गई। उसकी दया याचिकाएं भी खारिज कर दी गईं और 16 मई 1976 को उसे जयपुर जेल में फांसी दे दी गई। मरने से पहले उसके आखिरी शब्द थे कि उसने “बिना किसी वजह के कई मासूमों की जान ली है” और उसने अपील की कि कोई भी उसके जैसा रास्ता न चुने।

शंकारिया के खिलाफ चला मुकदमा भारतीय कानून के इतिहास में सबसे तेज़ मुकदमों में से एक माना जाता है। गुरुद्वारे से मिले वैज्ञानिक सबूतों और उसके खुद के गुनाह कबूल करने के बाद, 27 जून 1975 को श्रीगंगानगर की अदालत ने उसे फांसी की सजा सुनाई।
इसके बाद उसने सजा से बचने के लिए हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपील की, और यहाँ तक कि राष्ट्रपति को दया याचिका भी भेजी, लेकिन उसकी हर कोशिश नाकाम रही। आखिरकार, 16 मई 1976 को जयपुर सेंट्रल जेल में उसे फांसी दे दी गई। मरने से ठीक पहले उसके आखिरी शब्द बहुत भावुक थे। उसने लोगों से विनती की कि कोई भी उसके दिखाए गलत रास्ते पर न चले। उसने स्वीकार किया कि उसने “बिना किसी वजह के कई लोगों की जान ली थी” और उसे अपनी गलतियों पर पछतावा था।

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